जब जलवायु छीन ले घर, इस्लाम क्या कहता है?

Story by  आवाज़ द वॉयस | Published by  [email protected] | Date 25-09-2026
When the climate takes away one's home, what does Islam say?
When the climate takes away one's home, what does Islam say?

 

ईमान सकीना

जब लोग 'शरणार्थी' (Refugee) शब्द सुनते हैं, तो अक्सर उनके ज़हन में किसी युद्ध, उत्पीड़न या राजनीतिक हिंसा से भागते हुए इंसान की तस्वीर उभरती है। लेकिन विस्थापित लोगों का एक और बढ़ता हुआ वर्ग भी है, जिनके आशियाने किसी ऐसी चीज़ के कारण छिन रहे हैं जो आंखों से दिखाई तो कम देती है, पर तबाही उतनी ही भयंकर मचाती है और वह है जलवायु परिवर्तन (Climate Change)।

बढ़ता हुआ समुद्र का जलस्तर, लंबा सूखा, विनाशकारी बाढ़, भीषण गर्मी और आजीविका के सिमटते साधन परिवारों को उन जगहों को छोड़ने पर मजबूर कर रहे हैं जहाँ उनकी पीढ़ियाँ बसती आई हैं। इन लोगों को 'जलवायु शरणार्थी' (Climate Refugees) कहा जाता है।

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इस्लाम की नज़र में, यह मामला केवल प्रवासन (Migration) या जलवायु परिवर्तन भर का नहीं है। यह इससे भी जुड़ा सवाल है कि जब बेबस और लाचार लोग हमारे दरवाज़े पर आ खड़े हों, तो हमारा नज़रिया और रवैया कैसा होना चाहिए।

क़ुरआन इंसान को बार-बार याद दिलाता है कि यह धरती अल्लाह की दी हुई एक ‘अमानत’ है। हम इसके मालिक नहीं हैं। अल्लाह फ़र्माता है: "और वही है जिसने तुम्हें ज़मीन में (अपना) नायाब/उत्तराधिकारी बनाया है।"— क़ुरआन 6:165

ज़मीन का निगहबान या रखवाला होने के नाते हमारे कंधों पर ज़िम्मेदारी भी आती है। जब पर्यावरण के विनाश की वजह से लोग बेघर हो जाते हैं, तो इसका असर सिर्फ़ प्रकृति पर ही नहीं पड़ता-यह न्याय, करुणा और मानवीय गरिमा से जुड़ा एक गंभीर सवाल बन जाता है।

क़ुरआन धरती पर फ़साद (अव्यवस्था) और विनाश फैलाने की कड़े शब्दों में निंदा करता है:  "और ज़मीन में उसकी सुधार के बाद बिगाड़/फ़साद पैदा न करो।" — क़ुरआन 7:56

जलवायु परिवर्तन के पीछे कई कारण हैं और इसे किसी एक व्यक्ति या समाज के सिर नहीं मढ़ा जा सकता। फिर भी, इस्लामी सिद्धांत पूरी तरह स्पष्ट है: इंसान को हर तरह के नुकसान पहुँचाने से बचना चाहिए और जो अमानत उसे सौंपी गई है, उसकी हिफ़ाज़त करनी चाहिए। लेकिन जब कोई अपना घर-बार पहले ही खो चुका हो, तब क्या?

इस्लाम में उन लोगों का दिल खोलकर स्वागत करने की एक लंबी और सुनहरी परंपरा रही है, जिन्हें अपना घर छोड़ने पर मजबूर होना पड़ा। पैगंबर मुहम्मद (सल्ल.) के मक्का से मदीना हिजरत (प्रवासन) करने की घटना में हमारे लिए एक बहुत बड़ा सबक़ छिपा है।

मक्का से हिजरत करके आए लोगों को ‘मुहाजिरून’ कहा गया, जबकि मदीना के जिन लोगों ने उनका स्वागत किया और हर कदम पर उनका साथ दिया, उन्हें ‘अंसार’ (मददगार) कहा गया। क़ुरआन अंसार की इस दरियादिली की तारीफ़ में फ़र्माता है:   "और वे दूसरों को अपने आप पर तरजीह (प्राथमिकता) देते हैं, चाहे वे खुद तंगी और ज़रूरत में ही क्यों न हों।" — क़ुरआन 59:9

यह आयत विस्थापित लोगों के प्रति एक असाधारण दृष्टिकोण को दर्शाती है। अंसार ने नए आने वालों को सिर्फ़ ऐसे अजनबी के रूप में नहीं देखा जो उनके खाने, मकान, नौकरी या साधनों में हिस्सा बाँटने आए हों। उन्होंने उन्हें मदद के ज़रूरतमंद इंसानों के तौर पर देखा।यह सीख आज के दौर में भी उतनी ही प्रासंगिक है।

बाढ़ के कारण बेघर हुआ कोई परिवार सिर्फ़ इसलिए किसी की माँ, बाप, बच्चा या दादा-दादी होना बंद नहीं कर देता कि उसने कोई सरहद पार कर ली है। सूखा पड़ने से अपनी ज़मीन गँवा देने वाला किसान अपनी गरिमा (खुददारी) नहीं खो देता।

और चढ़ते पानी के कारण अपना घर छोड़ने पर मजबूर हुआ बच्चा भी सुरक्षा, शिक्षा, भोजन और स्नेह का उतना ही हकदार है जितना कोई भी अन्य बच्चा। क़ुरआन मोमिनों (ईमान वालों) को इंसाफ़ पर कायम रहने का हुक्म देता है:   "बेशक अल्लाह इंसाफ़ और भलाई (इहसान) का हुक्म देता है।"— क़ुरआन 16:90

विस्थापितों को शरण देने का मतलब यह बिल्कुल नहीं है कि हर इंसान को किसी शरणार्थी परिवार को अपने घर में रखना ही पड़ेगा। सरकारें, समाज, चैरिटी संस्थाएँ, मस्जिदें और अंतर्राष्ट्रीय संगठन,सभी की अपनी-अपनी ज़िम्मेदारियाँ हैं। लेकिन आम मुसलमान भी बहुत कुछ योगदान दे सकते हैं: भोजन और कपड़े दान करके, आपातकालीन आश्रयों (Emergency Shelters) की मदद करके, बच्चों की पढ़ाई जारी रखने में हाथ बँटाकर, रोज़गार के अवसर देकर, जागरूकता बढ़ाकर, या कम से कम विस्थापितों को हकारत और शक की निगाह से न देखकर।

इस्लाम में मेहमाननवाज़ी सिर्फ़ खाने-पीने की चीज़ें पेश कर देना भर नहीं है; यह सामने वाले के इंसान होने का सम्मान करना है। जलवायु विस्थापन की यह चुनौती हमें यह भी याद दिलाती है कि हमदर्दी के साथ-साथ बचाव और रोकथाम भी ज़रूरी है।

हम जंगलों को काटना, पानी बर्बाद करना, नदियों को ज़हरीला बनाना और संसाधनों का बेधड़क इस्तेमाल जारी रखकर यह उम्मीद नहीं कर सकते कि इसका खमियाज़ा हमेशा कमज़ोर और बेबस तबका ही भुगतेगा। शरणार्थियों की देखभाल करना और हमारी ज़मीन की देखभाल करना,ये दोनों ज़िम्मेदारियाँ एक-दूसरे से गहराई से जुड़ी हुई हैं।

शायद सबसे बड़ा सबक़ यह है कि किसी इंसान की क़ीमत उसके पासपोर्ट पर लिखे पते से तय नहीं होती। इससे पहले कि वे प्रवासी हों, शरणार्थी हों, ग्रामीण हों, किसान हों या विदेशी हों—वे अल्लाह के बनाए इंसान हैं।

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क़ुरआन फ़र्माता है:  "और बेशक हमने आदम की औलाद (मानवता) को इज़्ज़त और सम्मान बख़्शा है।" — क़ुरआन 17:70

यह इज़्ज़त और सम्मान पूरी इंसानियत की साझी धरोहर है।इसलिए, जलवायु शरणार्थी हमें भूगोल और सरहदों से परे देखकर एक गहरा सवाल पूछने पर मजबूर करते हैं: जब किसी दूसरे का घर हमेशा के लिए मिट जाता है, तब हम खुद कैसे इंसान बनते हैं?

इस्लाम हमें रहमदिली, इंसाफ़, ज़िम्मेदारी और आदर-सत्कार का रास्ता दिखाता है। अगर जलवायु विस्थापन हमारे दौर के सबसे बड़े मानवीय संकटों में से एक बनने जा रहा है, तो ये सिद्धांत मुसलमानों को न केवल बेघर हुए लोगों का सहारा बनने में मार्गदर्शन कर सकते हैं, बल्कि इस साझी धरती के बेहतर रखवाले बनने की राह भी दिखा सकते हैं।

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