नबीला खान: स्केटिंग रिंक से इंटरनेशनल गोल्ड का सपना
Story by अर्सला खान | Published by onikamaheshwari | Date 02-10-2026
Nabila Khan: Dreaming of International Gold from the Skating Rink
अर्सला खान / नई दिल्ली
अलीगढ़ की नबीला खान महज चौदह-पंद्रह साल की उम्र में अपने बड़े सपनों को पूरा करने में जुट गई हैं। नबीला रोलर स्केटिंग खिलाड़ी हैं। खेल के मैदान में उनकी रफ्तार और फुर्ती देखकर सब हैरान रह जाते हैं। आवाज द वॉयस से खास बातचीत में नबीला कहती हैं,” उनका असली मकसद विश्व स्तर पर भारत का परचम लहराना है।” जिस कुशलता से वह रिंग में अपने विरोधियों को पछाड़ती हैं, उससे उनके कोच और परिजनों को पूरा यकीन है कि वह जल्द ही इंटरनेशनल लेवल पर देश का नाम रोशन करेंगी।
अगर किसी काम को करने का जुनून सच्चा हो तो रास्ते अपने आप बनते चले जाते हैं। अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी (AMU) की बीएससी बायोकेमिस्ट्री की छात्रा नबीला खान पर यह बात पूरी तरह सटीक बैठती है। महज पांच साल की छोटी सी उम्र में अपने बड़े भाई को स्केटिंग करते देखकर शुरू हुआ उनका यह सफर आज उन्हें नेशनल लेवल रोलर डर्बी तक ले आया है।
पांच साल की उम्र में शुरू हुआ सफर
नबीला के लिए स्केटिंग सिर्फ एक खेल या टाइमपास नहीं है। वह इसे अपनी सबसे बड़ी ताकत मानती हैं। यह खेल उन्हें जिंदगी में हर दिन आगे बढ़ने का हौसला देता है। जब वह पांच साल की थीं, तब उन्होंने पहली बार पैरों में स्केट पहनकर दौड़ना शुरू किया था। अपने बड़े भाई को स्केटिंग करते देख उनके मन में भी इसे सीखने की लालक जगी। धीरे-धीरे यह खेल उनका शौक बन गया और फिर यह शौक एक जुनून में बदल गया। शुरुआत में मिले छोटे-छोटे मेडल और ट्रॉफी ने उनका आत्मविश्वास काफी बढ़ाया। उन्हें लगने लगा कि वह इस खेल में बहुत आगे तक जा सकती हैं। नबीला बताती हैं कि उनके इस सफर में परिवार हर पल उनके साथ मजबूती से खड़ा रहा।
घर का माहौल और माता-पिता का साथ
नबीला की मां लंबे समय से सामाजिक कामों से जुड़ी हैं। वह साल 2014 से आशियाना वेलफेयर सोसाइटी नाम से एक एनजीओ चला रही हैं। नबीला के मुताबिक उनकी मां ने उनके खेल के जुनून को समझा और हमेशा उनका हौसला बढ़ाया। उनके पिता कुवैत में इंजीनियर रह चुके हैं और अब रिटायर होकर घर पर रहते हैं। परिवार में बड़े भाई भी उनके लिए प्रेरणा का जरिया रहे हैं। उनके भाई अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी में मास कम्युनिकेशन की पढ़ाई कर रहे हैं। घर में पढ़ाई और सपनों को पूरा करने का एक बेहतरीन माहौल मिला, जिसने नबीला को निडर होकर आगे बढ़ने का मौका दिया। स्पोर्ट्स की दुनिया में एक लड़की के लिए आगे बढ़ना हमेशा आसान नहीं होता। नबीला के रास्ते में भी कई रुकावटें आईं। लेकिन उनके माता-पिता ने कभी उनका हाथ नहीं छोड़ा। परिवार ने उनके खेल पर भरोसा बनाए रखा और उन्हें अपनी पसंद का रास्ता चुनने की आजादी दी।
अब्बा की शायरी से मिलता है हौसला
नबीला अपने पिता की बताई एक शायरी को अपना सबसे बड़ा मोटिवेशन मानती हैं। मशहूर शायर अहमद फ़राज़ की ये पंक्तियां उनके दिल के बेहद करीब हैं: "जो मेरे ज़ब्त का शीराज़ा मुंतशिर कर दे, मेरे सितम को भी अब ऐसा कोई सितमगर दे।" यह शायरी उन्हें मुश्किल से मुश्किल समय में भी शांत रहने और अपने काम पर ध्यान देने की सीख देती है।
मोहाली कैंप ने बदली खेल की दिशा
नबीला की मेहनत को बड़ा ब्रेक तब मिला जब उन्होंने मोहाली में हुए 10 दिनों के स्पेशल ट्रेनिंग कैंप में भाग लिया। वहां उनकी स्पीड और निरंतरता ने सेलेक्टर्स का ध्यान खींचा। इसके बाद उन्होंने उत्तर प्रदेश की टीम में अपनी जगह बनाई। नेशनल रोलर डर्बी में नबीला का प्रदर्शन शानदार रहा। वह अब तक नेशनल रोलर डर्बी में पांच मेडल अपने नाम कर चुकी हैं। इनमें तीन गोल्ड मेडल शामिल हैं।राजस्थान के बीकानेर में हुआ फेडरेशन कप रोलर स्केटिंग डर्बी चैंपियनशिप नबीला के करियर का सबसे यादगार मुकाबला रहा।
उत्तर प्रदेश की टीम से खेलते हुए नबीला ने मैदान पर गजब का तालमेल दिखाया। पूल स्टेज में उत्तर प्रदेश ने तमिलनाडु की मजबूत टीम को 44-11 से करारी शिकस्त दी। इसके बाद फाइनल मुकाबला मेजबान राजस्थान से हुआ। फाइनल मैच में उत्तर प्रदेश ने राजस्थान को 26-12 से हराकर गोल्ड मेडल पर कब्जा जमाया। इस ऐतिहासिक जीत में नबीला की स्पीड, सही टाइमिंग और रणनीति की सबसे अहम भूमिका रही।
टीम वर्क और रणनीति को मानती हैं असली ताकत
रोलर डर्बी के खेल में सिर्फ तेज दौड़ना काफी नहीं होता। इसमें टीम वर्क, सही टाइमिंग और सटीक रणनीति बहुत जरूरी होती है। नबीला बताती हैं कि वह मैच के दौरान अपनी साथियों के साथ तालमेल बनाए रखने पर सबसे ज्यादा जोर देती हैं। बीकानेर में भी इसी रणनीति की वजह से यूपी की टीम गोल्ड जीतने में कामयाब रही।
पढ़ाई और खेल में बेहतरीन बैलेंस
नबीला की कहानी की सबसे खास बात यह है कि वह खेल के साथ-साथ पढ़ाई में भी बेहद अव्वल हैं। वह AMU से बीएससी बायोकेमिस्ट्री की पढ़ाई कर रही हैं। स्केटिंग की प्रैक्टिस, टूर्नामेंट और कॉलेज की पढ़ाई के बीच तालमेल बैठाना आसान काम नहीं है। लेकिन नबीला का मानना है कि अगर आपका टाइम मैनेजमेंट सही हो तो आप पढ़ाई और खेल दोनों एक साथ संभाल सकते हैं।
इतना ही नहीं, नबीला दो बार नीट (NEET) की परीक्षा भी पास कर चुकी हैं। इससे पता चलता है कि उनका ध्यान सिर्फ खेल तक सीमित नहीं है, बल्कि वह पढ़ाई में भी उतनी ही गंभीर हैं। नबीला अपनी फिटनेस और स्टैमिना पर रोज मेहनत करती हैं। उनका मानना है कि एक एथलीट को हर दिन खुद को साबित करना होता है।
जेन जी के लिए खास सोच
आज की जनरेशन Z (Gen Z) का हिस्सा होने के नाते नबीला सोशल मीडिया पर भी एक्टिव रहती हैं। लेकिन उनके लिए सोशल मीडिया सिर्फ मनोरंजन का जरिया नहीं है। वह अपनी पीढ़ी को एक निडर जनरेशन मानती हैं जो अपनी पहचान खुद बनाना चाहती है। नबीला का मानना है कि आलोचकों की बातों से डरने के बजाय उसे अपनी ताकत बनाना चाहिए। अगर कोई आपके काम पर सवाल उठाता है तो उसे दबाव के रूप में लेने के बजाय मोटिवेशन की तरह लें। हालांकि वह युवाओं को सलाह देती हैं कि कोई भी काम किसी के दबाव में आकर न करें।
पांच साल की उम्र से शुरू हुआ नबीला का यह सफर आज एक मिसाल बन चुका है। उनके नाम कई नेशनल मेडल हैं, उत्तर प्रदेश के लिए वह गोल्ड जीत चुकी हैं और पढ़ाई में भी आगे हैं। लेकिन नबीला का सपना यहीं खत्म नहीं होता। पैरों में स्केट बांधकर तेजी से आगे बढ़ती यह युवा खिलाड़ी अब अंतरराष्ट्रीय मंच पर भारत के लिए गोल्ड मेडल जीतने की तैयारी कर रही हैं। परिवार का भरोसा, पिता की सीख, मां का प्यार और खुद की मेहनत के दम पर नबीला खान आज लाखों लड़कियों के लिए एक प्रेरणा बन चुकी हैं।