ईरान संकट की आंच: चावल निर्यात से लेकर वैश्विक खाद्य श्रृंखला तक बढ़ता दबाव

Story by  मंजीत ठाकुर | Published by  [email protected] | Date 25-03-2026
The Heat of the Iran Crisis: Mounting Pressure—From Rice Exports to the Global Food Supply Chain
The Heat of the Iran Crisis: Mounting Pressure—From Rice Exports to the Global Food Supply Chain

 

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मंजीत ठाकुर

भारत का कृषि निर्यात, खासकर चावल, इन दिनों एक नए भू-राजनीतिक संकट की चपेट में है. पश्चिम एशिया में बढ़ते तनाव, खासतौर पर ईरान और उससे जुड़े समुद्री मार्गों पर अनिश्चितता ने भारतीय निर्यातकों के सामने ऐसी चुनौतियाँ खड़ी कर दी हैं, जिनका असर सिर्फ व्यापार तक सीमित नहीं, बल्कि घरेलू बाजार और वैश्विक खाद्य सुरक्षा तक फैल सकता है.

ईरान संकट के कारण भारत के चावल निर्यात कारोबार पर असर पड़ना शुरू हो गया है.न्यूज एजेंसी रॉयटर्स के मुताबिक, इस महीने के शुरुआत में ही, बंदरगाहों पर करीब 4लाख मीट्रिक टन बासमती चावल अटका हुआ है और ढुलाई का किराया दोगुने से भी अधिक हो चुका है.

गौरतलब है कि भारत एरोमेटिक बासमती चावल का सबसे बड़ा निर्यातक है और चावल के खरीदार पश्चिमी एशिया और खाड़ी देश हैं जिनमें से आधे से अधिक चावल का निर्यात सऊदी अरब, ईरान और यूएई जैसे देशों को होता है.

अंग्रेजी अखबार टाइम्स ऑफ इंडिया के मुताबिक, कर्नाटक से अरब इलाकों को होने वाला निर्यात पूरी तरह रुक गया है. और रायचूर के चावल मिलों ने आधी क्षमता से काम करना शुरू कर दिया है.असल में, सरकार ने चावल निर्यात में आई गिरावट का कोई प्रतिशत आंकड़ा अभी तक जारी नहीं किया है लेकिन यहां याद रखने लायक बात है कि भारत ने अप्रैल-नवंबर 2025-26के वित्त वर्ष की अवधि में ईरान को 5.99लाख टन बासमती चावल का निर्यात किया था जिसकी कीमत करीबन 468.10मिलियन डॉलर था.

इस युद्ध का असली असर चावल पर इसलिए दिख रहा है क्योंकि भारत से निर्यात होने वाले बासमती चावलों का सबसे बड़ा आयातक ईरान ही है. हालांकि, यह भी तथ्य है कि अमेरिका को निर्यात होने वाले चावल की मात्रा बढ़ी है.

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फिर भी, ईरान संकट के चलते कारोबार में आई कमी का असर घरेलू बाजार पर दिखने लगा है और बासमती चावल के घरेलू बाजार में कीमतों में कमी दिखने लगी है. जिसके चलते निर्यातकों ने सरकार से तत्काल हस्तक्षेप की मांग की है. भारतीय चावल निर्यातक संघ (आईआरईएफ) ने एग्रीकल्चरल एंड प्रोसेस्ड फूड प्रोडक्ट्स एक्सपोर्ट डेवलपमेंट अथॉरिटी (एपीडा) को एक ज्ञापन में प्रमुख समुद्री मार्गों पर अस्थिरता के कारण शिपिंग, लॉजिस्टिक्स और निर्यात संचालन में गंभीर व्यवधान की जानकारी दी, तब इस मामले की गंभीरता का जमीनी संकट महसूस होने लगा.

समुद्री रास्तों में संकट, व्यापार पर असर

भारत से पश्चिम एशियाई खासकर खाड़ी देशों को जाने वाला चावल निर्यात बड़े पैमाने पर समुद्री मार्गों पर निर्भर करता है. लेकिन हालिया संकट के कारण इन मार्गों पर अस्थिरता बढ़ गई है. जहाजों की आवाजाही प्रभावित हो रही है, कई शिपमेंट रद्द हो रहे हैं और सबसे बड़ी समस्या कंटेनरों की कमी,तेजी से उभरकर सामने आई है.

निर्यातकों के अनुसार, खाली कंटेनरों की उपलब्धता कम होने से माल लोड करना ही मुश्किल हो गया है. जो कंटेनर उपलब्ध हैं, उनके लिए भी लंबा इंतजार करना पड़ रहा है. इसका असर सिर्फ़ मध्य पूर्व के लिए होने वाले निर्यात पर नहीं, बल्कि अन्य देशों के लिए भेजे जाने वाले माल पर भी पड़ रहा है.

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मालभाड़ा और बीमा लागत में तेज उछाल

इस संकट का सबसे सीधा असर लागत पर पड़ा है. अंतरराष्ट्रीय शिपिंग दरों में अचानक उछाल आया है.जहाँ पहले एशिया से मध्य पूर्व तक एक कंटेनर भेजने की लागत 1200से 1800डॉलर के बीच होती थी, वहीं अब यह बढ़कर 3500से 4500डॉलर तक पहुंच गई है. यानी कुछ मामलों में लागत में 80से 150प्रतिशत तक की वृद्धि हुई है.

इसके अलावा जहाजों में इस्तेमाल होने वाले ईंधन यानी बंकर फ्यूल की कीमत भी तेजी से बढ़ी है. इससे शिपिंग कंपनियों का खर्च बढ़ा है, जिसका बोझ अंततः निर्यातकों पर आ रहा है.लेकिन सबसे बड़ा झटका बीमा लागत में आया है.

खाड़ी क्षेत्र से गुजरने वाले जहाजों के लिए युद्ध जोखिम बीमा का प्रीमियम कई गुना बढ़ गया है. बीमा लागत में लगभग दस गुना वृद्धि दर्ज की गई है.कुछ मामलों में निर्यातकों को प्रति कंटेनर 1000से 1500डॉलर तक अतिरिक्त शुल्क देना पड़ रहा है. इस बढ़ती लागत और देरी का असर सीधे निर्यात अनुबंधों पर पड़ रहा है.

कई निर्यातक पहले से तय कीमतों पर माल भेजने के लिए बाध्य हैं, लेकिन लागत बढ़ने से उनका लाभ मार्जिन लगभग खत्म हो गया है. दूसरी ओर, जहाजों के रद्द होने या मार्ग बदलने के कारण डिलीवरी में देरी हो रही है.निर्यातकों के लिए सबसे बड़ी चिंता वर्किंग कैपिटल (कार्यशील पूंजी) पर दबाव है. माल बंदरगाहों पर अटका है, भुगतान अटका है और खर्च लगातार बढ़ रहा है.

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फंस गई है सप्लाई चेन

मौजूदा स्थिति में चावल निर्यात की पूरी श्रृंखला प्रभावित है. कुछ माल लोडिंग पोर्ट पर ही अटका हुआ है तो कुछ शिपमेंट रास्ते में देरी का सामना कर रहे हैं. कुछ माल गंतव्य बंदरगाहों पर पहुंचकर भी क्लियर नहीं हो पा रहा.इस बीच भंडारण, डिमरेज और अन्य शुल्क लगातार बढ़ते जा रहे हैं. जहाँ पहले माल 25से 30दिनों में गंतव्य तक पहुंच जाता था, अब कई शिपमेंट को 40से 45दिन तक लग रहे हैं.

घरेलू बाजार में भी असर: बासमती कीमतों में गिरावट

यह संकट केवल निर्यात तक सीमित नहीं है. पिछले कुछ दिनों में भारत में बासमती चावल की कीमतों में 7से 10फीसद तक गिरावट दर्ज की गई है.जब निर्यात धीमा पड़ता है, तो घरेलू बाजार में सप्लाई बढ़ जाती है, जिससे कीमतों पर दबाव आता है. इससे किसानों और व्यापारियों दोनों की आय प्रभावित होती है.निर्यातकों का कहना है कि कोविड-19के दौरान जिस तरह राहत पैकेज दिया गया था, वैसी ही सहायता इस समय भी जरूरी है.

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सिर्फ चावल नहीं, पूरी कृषि अर्थव्यवस्था पर असर

ईरान संकट का असर सिर्फ़ चावल निर्यात तक सीमित नहीं है. यह वैश्विक कृषि आपूर्ति श्रृंखला के लिए भी गंभीर खतरा बनकर उभर रहा है.सबसे बड़ा कारण है होर्मुज जलडमरूमध्य, जो वैश्विक ऊर्जा और उर्वरक व्यापार का प्रमुख मार्ग है. दुनिया का लगभग 25प्रतिशत तेल और 20प्रतिशत एलएनजी इसी मार्ग से गुजरता है.

दुनियाभर में कच्चे तेल और गैस के साथ उर्वरकों के दाम भी तेजी से बढ़ रहे हैं. हालांकि, अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने 23मार्च को पांच दिनों तक आगे हमला न करने और बातचीत के सकारात्मक संकेत दिए हैं लेकिन बातचीत विफल रही और यह संकट लंबा खिंचता है तो इसका असर खाद्य उत्पादन, कीमतों और वैश्विक खाद्य सुरक्षा पर व्यापक रूप से पड़ सकता है. ऐसी हालत में कीटनाशक उत्पादन की लागत 20से 25प्रतिशत तक बढ़ सकती है.

गौरतलब है कि होर्मूज स्ट्रेट दुनिया के लगभग 25फीसद तेल और 20फीसद एलएनजी निर्यात का प्रमुख मार्ग है. इसके अलावा, यहां से यूरिया का करीब 35फीसद और अमोनिया का लगभग 30फीसद माल गुजरता है. मौजूदा हालात में शिपिंग बाधाएं और कुछ उत्पादन इकाइयों के बंद होने से उर्वरक कीमतों में तेज वृद्धि देखी जा रही है.

यह भी ध्यान देने वाली बात है कि रासायनिक उर्वरक पहले ही 30फीसद से अधिक महंगे हो चुके हैं.कई जानकारों के मुताबिक यह संकट 2022के यूक्रेन युद्ध से अलग है. उस समय असर सीधे अनाज निर्यात पर पड़ा था, जबकि इस बार असर ऊर्जा और उर्वरक लागत के माध्यम से उत्पादन पर पड़ रहा है.इसका मतलब है कि खाद्य महंगाई धीरे-धीरे बढ़ेगी, लेकिन उसका असर लंबे समय तक रहेगा.