अंधेरी राहों पर कामयाबी का उजाला: इरफान लोन की ऐतिहासिक जीत

Story by  आवाज़ द वॉयस | Published by  [email protected] | Date 25-03-2026
The Light of Success on Dark Paths: Irfan Lone's Historic Victory
The Light of Success on Dark Paths: Irfan Lone's Historic Victory

 

दानिश अली | श्रीनगर

कहते हैं कि मंज़िलें उन्हीं को मिलती हैं जिनके सपनों में जान होती है, पंखों से कुछ नहीं होता हौसलों से उड़ान होती है। इस कहावत को कश्मीर के एक नौजवान ने सच कर दिखाया है। हाल ही में घोषित हुए यूपीएससी के नतीजों में एक ऐसा नाम उभरकर सामने आया है जिसने न केवल अपनी किस्मत को बदला, बल्कि समाज की सोच पर भी गहरी चोट की है। यह नाम है इरफान लोन का। इरफान कश्मीर के उस बांदीपोरा जिले से आते हैं जिसे अक्सर पिछड़ा और सीमावर्ती इलाका मानकर नजरअंदाज कर दिया जाता है। लेकिन इरफान की कामयाबी ने आज बांदीपोरा को पूरे देश के नक्शे पर चमका दिया है।

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इरफान की कहानी कोई आम कहानी नहीं है। यह कहानी है उस शख्स की जिसकी आँखों में दुनिया को देखने के लिए रोशनी तो नहीं है, लेकिन जिसके दिल में सितारों तक पहुँचने का अटूट संकल्प है। इरफान सौ प्रतिशत दृष्टिबाधित हैं। यानी उन्हें दोनों आँखों से कुछ भी दिखाई नहीं देता। बावजूद इसके, उन्होंने देश की सबसे कठिन मानी जाने वाली सिविल सेवा परीक्षा को पास कर लिया। उनकी यह जीत बताती है कि अगर इरादे फौलादी हों, तो जिस्मानी कमियां कभी भी कामयाबी का रास्ता नहीं रोक सकतीं।

इरफान के जीवन का संघर्ष तब शुरू हुआ जब वह महज पांच साल के थे। उस उम्र में जब बच्चे खिलौनों से खेलते हैं, इरफान एक हादसे का शिकार हो गए। इस हादसे ने उनकी एक आँख की रोशनी छीन ली। अभी परिवार इस सदमे से उबरा भी नहीं था कि एक दूसरे हादसे ने उनकी दूसरी आँख की रोशनी भी हमेशा के लिए खत्म कर दी। दुखों का पहाड़ यहीं नहीं थमा। इसी कठिन दौर में उनकी माँ का ब्रेन हेमरेज की वजह से इंतकाल हो गया। एक छोटा सा बच्चा, जिसकी दुनिया में अंधेरा छा चुका था और जिसके सिर से माँ का साया उठ गया था, उसके लिए जिंदगी किसी सजा से कम नहीं थी।

लेकिन यहाँ इरफान के पिता एक नायक की तरह खड़े हुए। उन्होंने हार नहीं मानी। उन्होंने अपने बेटे की आँखों की रोशनी तो नहीं लौटाई जा सकती थी, लेकिन उसके भविष्य को रोशन करने की ठान ली। इरफान को देहरादून के एक विशेष स्कूल में भेजा गया। यह स्कूल दृष्टिहीन बच्चों के लिए था। यहीं से इरफान के जीवन में बदलाव की शुरुआत हुई। उन्होंने ब्रेल लिपि सीखी और खुद को साबित करने की तैयारी शुरू की। साल 2016 में जब उन्होंने 12वीं की परीक्षा दी, तो उनके 91 प्रतिशत अंक आए। इस स्कोर ने सबको चौंका दिया। यह महज नंबर नहीं थे, यह इरफान के आत्मविश्वास की पहली बड़ी गूंज थी।

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इस शानदार प्रदर्शन के दम पर उन्हें दिल्ली विश्वविद्यालय के मशहूर हिंदू कॉलेज में दाखिला मिला। वहां से उन्होंने राजनीति विज्ञान में ग्रेजुएशन किया। इसके बाद वे दिल्ली की ही जवाहरलाल नेहरू यूनिवर्सिटी यानी जेएनयू पहुँचे, जहाँ से उन्होंने इंटरनेशनल रिलेशंस में अपनी मास्टर डिग्री पूरी की। जेएनयू के उस माहौल ने इरफान की सोच को और विस्तार दिया। वह समझ चुके थे कि शिक्षा ही वह हथियार है जिससे वे अपनी और अपने जैसे हज़ारों लोगों की तक़दीर बदल सकते हैं।

पढ़ाई के साथ-साथ घर की माली हालत सुधारना भी ज़रूरी था। इरफान ने अपनी मेहनत के दम पर पंजाब नेशनल बैंक में नौकरी हासिल की। इसके बाद वे एलआईसी में एएओ के पद पर चुने गए। सरकारी नौकरी मिलने के बाद अक्सर लोग संतुष्ट हो जाते हैं, लेकिन इरफान का सपना इससे कहीं बड़ा था। वे बैंक और ऑफिस की फाइलों के बीच भी यूपीएससी की किताबें और ऑडियो नोट्स सुनते रहते थे। नौकरी की थकान और पढ़ाई का बोझ, दोनों को उन्होंने बड़ी खूबसूरती से संभाला।

जब यूपीएससी का नतीजा आया, तो बांदीपोरा में जश्न का माहौल था। इरफान उस जिले के पहले व्यक्ति बने जिसने यह परीक्षा पास की। उनकी सफलता ने कश्मीर के उन तमाम युवाओं में एक नई रूह फूँक दी है जो मुश्किल हालात का रोना रोते हैं। इरफान का मानना है कि सफलता के लिए सिर्फ गधों जैसी मेहनत काफी नहीं है, बल्कि एक सही रणनीति की ज़रूरत होती है। वे आज के युवाओं को नसीहत देते हैं कि सोशल मीडिया की भूलभुलैया से बाहर निकलें। उनका कहना है कि अपने लक्ष्य पर ऐसा ध्यान लगाओ कि दुनिया की कोई भी चीज़ तुम्हें भटका न सके।

इरफान सिर्फ एक अधिकारी नहीं, बल्कि एक शायर दिल इंसान भी हैं। वे अक्सर अपनी बातों को शायरी के जरिए पेश करते हैं। उनका एक शेर उनकी पूरी जिंदगी का फलसफा बयान करता है कि अभी उन्हें थकना नहीं है, अभी तो मीलों चलना है। जिंदगी की तपती धूप हो या मुश्किलों की बारिश, उन्हें बस चलते रहना है। उनकी इस कामयाबी के पीछे उनके पिता की कुर्बानियां और भाई-बहनों का साथ एक मज़बूत दीवार की तरह रहा। उनके पिता ने अपनी इच्छाओं को मार दिया ताकि बेटा पढ़ सके।

आज इरफान लोन देश के लाखों युवाओं के लिए एक मशाल बन चुके हैं। वे कहते हैं कि ऊँचाइयों तक पहुँच जाना कोई बड़ी बात नहीं है, असली कमाल तो उस ऊँचाई पर खुद को टिकाए रखना है। उनकी कहानी हमें सिखाती है कि बाधाएं हमारे रास्ते में नहीं, बल्कि हमारे दिमाग में होती हैं। अगर मन साफ हो और कोशिश ईमानदार, तो कायनात खुद रास्ता बना देती है। बांदीपोरा के इस बेटे ने आज साबित कर दिया कि रोशनी आँखों में नहीं, इरादों में होनी चाहिए।