मंजीत ठाकुर
मिथिला का कोई गांव. अचानक, किसी के फूस के छाजन से भात पकने की एक आत्मा तक तर कर देने वाली खुशबू उठती है.पड़ोस की काकी मुस्कुराकर पूछती है, पाहुन आएल छथि की? (मेहमान आए हैं क्या?) वह चावल, जिसके पकने भर से गांव तक खबर पहुंच जाती थी कि घर में स्वागतयोग्य अतिथि आए हैं... और कुछ नहीं गोविंदभोग चावल है.
चावल भी ऐसा कि रसोई के किसी कोने में जब इसका डिब्बा खुलता है और पूरा घर एक मीठी, मादक और सौंधी खुशबू से भर जाता है. यह केवल एक अन्न नहीं, बल्कि मिथिला ही नहीं, भारतीय थाली का वह ‘अभिजात्य’ सदस्य है जिसने अपनी खुशबू से इतिहास और अध्यात्म दोनों को महकाया है. छोटे दाने, सफ़ेद चमक और मक्खन जैसी कोमलता, गोविंदभोग चावल को यदि ‘चावलों का राजकुमार’ कहा जाए, तो अतिशयोक्ति नहीं होगी.
नाम में छिपा अध्यात्म
गोविंदभोग का नाम ही इसकी नियति को स्पष्ट कर देता है. ‘गोविंद’ यानी भगवान कृष्ण और ‘भोग’ अर्थात नैवेद्य. माना जाता है कि बंगाल और पूर्वोत्तर भारत के वैष्णव मंदिरों में भगवान श्रीकृष्ण को अर्पित किए जाने वाले ‘भोग’ के लिए इसी विशेष चावल का चुनाव किया गया. इसकी खुशबू इतनी सात्विक और मनमोहक है कि इसे सीधे ईश्वर के चरणों से जोड़ दिया गया.
गोविंदभोग की पैदावार मुख्यतः पश्चिम बंगाल के बर्धमान, हुगली, नदिया और मुर्शिदाबाद जिलों में होती है. बिहार में मिथिला का बंगाल जैसी जलवायु वाला इलाका भी इसके लिए मुफीद है.लेकिन पश्चिम बंगाल के वर्धमान क्षेत्र को इसका मुख्य केंद्र माना जाता है, जहाँ की मिट्टी की वजह से चावल को वह विशिष्ट ‘जीआई टैग’ और पहचान मिली है.
वर्धमान जिले के गोविंदभोग चावल को अगस्त, 2017 में आधिकारिक तौर पर यह विशिष्ट दर्जा दिया गया था. यह टैग प्रमाणित करता है कि इस चावल की अनूठी सुगंध और गुणवत्ता यहाँ की विशेष मिट्टी और जलवायु
(विशेषकर गंगा के डेल्टा क्षेत्र की जलोढ़ मिट्टी) की देन है.
मिथिला से नाता: स्वाद और संस्कार का संगम
हालाँकि गोविंदभोग की जड़ें बंगाल की मिट्टी में गहरी हैं, लेकिन इसका सांस्कृतिक विस्तार पड़ोसी मिथिला (उत्तर बिहार) तक बहुत व्यापक है. मिथिला, जो अपनी मेहमानी, पाग और ‘माछ-मखान’ के लिए प्रसिद्ध है, वहाँ गोविंदभोग का एक अलग ही सम्मान है.
मिथिला के रीति-रिवाजों में भोजन केवल पेट भरने का साधन नहीं, बल्कि एक अनुष्ठान है. जब मिथिला में कोई विशिष्ट अतिथि आता है या जब बेटी के ससुराल ‘भार’ (उपहार) भेजा जाता है, तो उसमें गोविंदभोग चावल की मौजूदगी अनिवार्य मानी जाती है.
मिथिला की ‘खीर’ (पायस) के बिना कोई भी शुभ कार्य अधूरा है, और वह खीर यदि गोविंदभोग चावल की न हो, तो स्वाद में वह ‘अभिजात्यपन’ नहीं आता.मिथिला और मैथिल समाज में पूजा-अनुष्ठान के दौरान ‘अक्षत’ के रूप में भी अक्सर इसी चावल को प्राथमिकता दी जाती है. मिथिला की गीली मिट्टी और बाढ़ के पानी से सिंचित खेतों में भी इस प्रजाति के प्रति एक विशेष लगाव देखा गया है. वहां का ‘कतरनी’ चावल जितना लोकप्रिय है, गोविंदभोग उतना ही ‘पवित्र’ माना जाता है.
आप गोविंदभोग की खीर चखें, तो याद रखिएगा कि आप केवल चावल नहीं, बल्कि सदियों पुरानी एक खुशबूदार परंपरा का आनंद ले रहे हैं.यदि हम एक कृषि-वैज्ञानिक की दृष्टि से देखें, तो गोविंदभोग केवल ‘खुशबूदार चावल’ नहीं है, बल्कि इसकी अपनी विशिष्ट तकनीकी ‘प्रोफाइल’ है. यह ‘लघु दाना’ (शॉर्ट ग्रेन) और ‘सुगंधित गैर-बासमती’ (एरोमेटिक नॉन-बासमती) श्रेणी में आता है.
जहाँ बासमती अपनी लंबाई के लिए जाना जाता है, वहीं गोविंदभोग की पहचान इसके ‘अंडाकार’ और छोटे स्वरूप से होती है. इसकी विशिष्ट मादक सुगंध का मुख्य कारण इसमें मौजूद रासायनिक यौगिक 2-एसिटाइल-1-पायरोलिन (2-Acetyl-1-Pyrroline) है. यही रसायन बासमती में भी पाया जाता है, लेकिन गोविंदभोग में इसकी सांद्रता इसे एक अलग ‘मीठा’ अनुभव देती है.
इसमें एमाइलोज की मात्रा लगभग 18 फीसद से 20 फीसद (इस मात्रा को मध्यम स्तर का माना जाता है) होती है. कम एमाइलोज के कारण पकने के बाद यह चावल थोड़ा चिपचिपा और बहुत कोमल होता है, इसकी वजह से यह खीर और ‘भोग’ के लिए आदर्श माना जाता है.
गोविंदभोग को तैयार होने में कोई ज्यादा वक्त नहीं लगता. यह एक मध्यम अवधि वाली फसल है, जो बोने के लगभग 125-135 दिनों में तैयार होती है. इस चावल से जुड़ी एक दिलचस्प बात यह भी है कि चूँकि इस चावल की खेती में रासायनिक उर्वरकों का प्रयोग बहुत कम होता है (क्योंकि अधिक खाद से इसकी सुगंध कम हो सकती है), इसे स्वाभाविक रूप से ‘पर्यावरण-अनुकूल’ किस्म भी माना जाता है.
रसोई का जादू: खिचड़ी से पुलाव तक
गोविंदभोग की सबसे बड़ी विशेषता इसकी चिपचिपाहट और पकने के बाद इसकी कोमलता है. जहाँ बासमती चावल अपनी लंबाई के लिए जाना जाता है, वहीं गोविंदभोग अपने ‘छोटे कद’ और ‘गहरे स्वाद’ के लिए प्रसिद्ध है. दुर्गा पूजा की ‘भोग वाली खिचड़ी’ हो या शादियों का ‘बसन्ती पुलाव’ गोविंदभोग के बिना इनका स्वाद अधूरा है. घी में भुने हुए इस चावल के दाने जब पकते हैं, तो वे अपनी पूरी सुगंध वातावरण में छोड़ देते हैं, जो भूख को एक अलग ही स्तर पर ले जाती है.
आज के दौर में जब ‘ब्रांडेड’ और पॉलिश किए हुए चावलों की भीड़ है, गोविंदभोग अपनी मौलिकता को बचाए हुए है. यह चावल हमारे पूर्वजों की उस पसंद का प्रतीक है, जहाँ भोजन को पहले मन से, फिर नाक से और अंत में स्वाद ग्रंथियों से महसूस किया जाता था. यह बंगाल और मिथिला के बीच के उस सांस्कृतिक सेतु का नाम है, जो स्वाद की डोर से बंधा है.
आज के तेज़ी से बदलते खानपान के दौर में, जहां फास्ट फूड और इंस्टेंट मील्स का चलन बढ़ रहा है, गोविंदभोग चावल हमें अपनी जड़ों की याद दिलाता है. यह सिर्फ एक व्यंजन का कच्चा माल नहीं, बल्कि परंपरा, श्रद्धा और स्वाद का प्रतीक है. गोविंदभोग एक ऐसा अनुभव है, जो हर कौर में संस्कृति का स्पर्श कराता है.
(लेखक आवाज द वाॅयस के एवी संपादक हैं)