तेल का धर्म और पेट्रोल की राजनीति

Story by  हरजिंदर साहनी | Published by  [email protected] | Date 23-03-2026
The Religion of Oil and the Politics of Petrol
The Religion of Oil and the Politics of Petrol

 

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हरजिंदर

तेल का धर्म से भले ही कोई सीधा नाता न रहा हो लेकिन धार्मिक अनुष्ठानों में तेल एक बड़ी भूमिका निभाता रहा है। अगर हम भारत का ही उदाहरण लें तो मंदिरों के दियों के लिए तेल एक महत्वपूर्ण सामान है। गिरिजाघरों में भी तेल का ऐसा ही उपयोग होता है। दीपावली जैसे कुछ त्योहारों में तेल के दिए बड़ी भूमिका निभाते रहे हैं।

स्थानीय उपलब्धता के हिसाब से धार्मिक मान्यताओं में कुछ तेलों को सबसे पवित्र भी माना गया है। जैसे ईसाई धर्म में जैतून के तेल को। या हिंदू धर्म में तिल के तेल को और गाय के घी को।लेकिन इस तरह के सभी तेलों से अलग है- पेट्रोलियम। जिसे कोई पवित्र नहीं मानता। न कोई धर्म, न कोई देश। हालांकि वह दुनिया भर की उत्पादन अर्थव्यवस्था में एक महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है और इन नाते आज की दुनिया के बहुत से धार्मिक कार्यों के पीछे भी पेट्रोलियम की कोई न कोई भूमिका जरूरत होती है। इसके बावजूद उसे किसी पूजा का जरूरी हिस्सा नहीं बनाया जाता।

पेट्रोलियम सिर्फ एक ईंधन भर नहीं है वह एक बहुत बड़ी संपत्ति भी है। आज की भौतिकवादी दुनिया में संपत्ति के बहुत से मायने होते हैं इसलिए पेट्रोलियम की गिनती दुनिया की सबसे महत्वपूर्ण चीजों में होती है।ठीक यहीं पर हमें अमेरिका के एक जमाने के बहुत बड़े उद्योगपति रहे राॅकफेलर को याद करना होगा।

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वे पेट्रोलियम के दुनिया के बहुत बड़े कारोबारी थे और एक जमाने में उनकी कंपनी स्टैंडर्ड आॅयल की तूती पूरे विश्व में बोलती थी। राॅफेलर मानते थे कि पेट्रोलियम ईश्वर की दी गई नेमत है और इसलिए उसकी कमाई धार्मिक कार्यों में लगानी चाहिए। अपने समय में उन्होंने  कमाई का एक बड़ा हिस्सा ईसाई धर्म के प्रचार में लगाया भी था। राॅफेलर के अलावा अन्य लोगों ने भी यही किया और जो रुझान सामने आया उसे वाईल्डकैट क्रिश्चियनिटी कहा गया।

आगे जाकर पेट्रोलियम का जो भूगोल उभरा में उसमें वह बड़ी तादात में उस क्षेत्र में पाया गया जहां ज्यादातर देशों की आबादी इस्लाम मानने वालों की है।आगे जाकर 1970 के दशक में जब पेट्रोलियम निर्यात करने वाले देशों के ओपेक जैसे संगठन बने और इसकी कीमतें नए आसमान पर पहंुची तो ये देश ही थे जिन्हें इसका सबसे ज्यादा फायदा मिला।

उसी दौरान कुछ पश्चिमी टिप्पणीकारों ने एक नया जुल्मा गढ़ा - पेट्रो-इस्लाम। यह कहा जाने लगा कि पेट्रोलियम की कमाई का धर्म में निवेश किया जा रहा है। कुछ ने तो यह तक कहा कि पेट्रोलियम की कमाई के कारण ही इन देशों कट्टरता है जो लगातार बढ़ रही है।

हालांकि पिछली सदी बीतते-बीतते जब दुनिया नई तरह की हकीकतों से रूबरू होने लगी तो इस जुमले और इससे जुड़े तर्कों का इस्तेमाल कम होने लग गया।अब जब पूरे पश्चिम एशिया में जंग छिड़ी है तो कोई भी इसे मजहब की लड़ाई नहीं मान रहा। यह पूरी तरह से पेट्रोलियम की जंग हो चुकी है। इसके संसाधनों पर कब्जा करने की कोशिश में इसके संसाधनों को नष्ट करने का सिलसिला शुरू हो गया है।

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सच तो यह है कि पेट्रोल का कोई धर्म नहीं होता इसकी सिर्फ राजनीति होती है। इसे और अच्छी तरह समझना है तो हमें यह देखना होगा कि पिछले कुछ महीनों में अमेरिका ने पेट्रोलियम को लेकर भारत पर कितने तरह के दबाव बनाने की कोशिश की है।

( लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं)

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