प्रमोद जोशी
ईरान-युद्ध शुरू होने के पहले से ही कहा जा रहा था कि लड़ाई शुरू हो गई, तो उसे खत्म करना मुश्किल हो जाएगा. यह बात अब सच साबित हो रही है. अब ट्रंप अपनी योजनाओं को लेकर किंतु-परंतु करने लगे हैं‘न्यूयॉर्क टाइम्स’ ने लिखा है कि जब से राष्ट्रपति ट्रंप ने ईरान-युद्ध में ‘प्रवेश’ किया है, तब से वे इस सवाल से रूबरू हैं कि इसे समाप्त कब करेंगे? सच यह है कि युद्ध के उनके कई घोषित लक्ष्य अब भी अधूरे हैं.
ट्रंप ने ईरान-युद्ध के लिए ‘भ्रमण’ शब्द का प्रयोग करना शुरू कर दिया है, ताकि लगे कि कोई बड़ी परेशानी की बात नहीं है, लेकिन व्यावहारिक रूप से लगता है कि वे फँस गए हैं.अब वे परेशान हैं. पिछले शुक्रवार शाम को जब ट्रंप फ्लोरिडा के लिए रवाना हुए, तो ऐसा लग रहा था कि वे शायद लड़ाई को कोई मोड़ देकर ‘एक्ज़िट’ यानी हाथ खींचने की घोषणा करेंगे.
बहरहाल अभी तक ऐसा कुछ नहीं हुआ है. दूसरी तरफ उनकी और वैश्विक अर्थव्यवस्था की परेशानियाँ बढ़ती जा रही हैं. पेट्रोल की औसत कीमतें आसमान छूने की तैयारी कर रही है. फारस की खाड़ी में बुनियादी ढाँचा खंडहर में तब्दील हो चुका है, वहीं ईरान की ‘कमजोर’ धार्मिक सत्ता की पकड़ मजबूत होती जा रही है.

ऊर्जा संकट
समाचार एजेंसी ‘रायटर्स’ की एक रिपोर्ट के अनुसार ऊर्जा संकट बढ़ा, तो यूरोप के औद्योगिक देशों और जापान तथा भारत जैसे देशों को भारी नुकसान होगा. ‘इकोनॉमिस्ट’ के अनुसार होर्मुज जलसंधि मार्ग लगातार बंद रहता है, जिससे विश्व के तेल और तरल प्राकृतिक गैस (एलएनजी) उत्पादन का लगभग पाँचवाँ हिस्सा फँसा हुआ है.
जैसे-जैसे व्यापारी इस बात का अनुमान लगा रहे हैं कि पूरे वर्ष के लिए कितनी आपूर्ति बाधित हुई है, वैसे-वैसे ऊर्जा की कीमतें भी बढ़ रही हैं. अभी तक कीमतों में बहुत ज्यादा वृद्धि न होने की वजह यह है कि निवेशक जल्द ही फिर से आपूर्ति शुरू होने की उम्मीद कर रहे हैं. उन्हें मई तक सामान्य स्थिति होने की उम्मीद है.
‘इकोनॉमिस्ट’ ने गणना की कि यदि युद्ध आज समाप्त हो जाए, तब भी महीनों तक आपूर्ति कम रहेगी. इससे वैश्विक अर्थव्यवस्था को नुकसान होगा.
ऊर्जा केंद्रों पर हमले
अमेरिका के सहयोगी देशों ने पहले तो समुद्री गश्त करने की ट्रंप की माँग को ठुकराया और अब कह रहे हैं कि पहले युद्धविराम होना चाहिए. अब एक तरफ ऊर्जा का संकट पैदा होने का खतरा है, वहीं डॉनल्ड ट्रंप और ईरान ने खाड़ी में ऊर्जा केंद्रों हमला करके लड़ाई के विस्तार की धमकी दी है.
पिछले रविवार की सुबह से ही पूरे इसराइल में हवाई हमले के सायरन बजने लगे, जो मिसाइलों की चेतावनी दे रहे थे. यह चेतावनी दक्षिणी इसराइल के शहरों अराद और दिमोना में रात में हुए दो अलग-अलग हमलों में दर्जनों लोगों के घायल होने के बाद दी गई.
ट्रंप के आलोचक मानते हैं कि उन्होंने बिना किसी रणनीति के इस संघर्ष में प्रवेश किया है, जबकि उनके समर्थक इसे रणनीतिक अस्पष्टता बताकर इसकी सराहना करते हैं. शुक्रवार को ट्रंप ने पत्रकारों से कहा कि उन्हें युद्धविराम में कोई दिलचस्पी नहीं है, क्योंकि हम ईरान के मिसाइल भंडार, नौसेना, वायुसेना और रक्षा औद्योगिक आधार को ‘नष्ट’ कर रहे हैं.
कुछ घंटों बाद, शायद राजनीतिक दबावों के बरक्स उन्होंने अपनी सोशल मीडिया साइट पर पोस्ट किया कि ‘पश्चिम एशिया में अपने महान सैन्य प्रयासों को समाप्त करने पर विचार करते हुए, हम अपने उद्देश्यों को पूरा करने के बहुत करीब पहुँच रहे हैं.’
बदलता गणित
अपने उद्देश्यों की नवीनतम सूची में उन्होंने अपने कुछ पुराने लक्ष्यों को छोड़ दिया और कुछ को कमज़ोर कर दिया. उन्होंने इस्लामिक रिवॉल्यूशनरी गार्ड्स कोर को हराने का कोई ज़िक्र नहीं किया, जो मोज़्तबा खामनेई के साथ मजबूती से खड़े हैं.
ट्रंप ने ईरानी जनता को भी कोई संदेश नहीं दिया, जिनसे उन्होंने केवल तीन सप्ताह पहले कहा था: ‘जब हमारा काम पूरा हो जाए, तो अपनी सरकार पर कब्ज़ा कर लेना. यह तुम्हारी ही होगी.’
लड़ाई से पहले की वार्ताओं में अमेरिका ने इस बात पर जोर दिया था कि ईरान को अपनी सारी नाभिकीय सामग्री देश से बाहर निकालनी होगी, जिसमें बम बनाने की क्षमता का करीब 970पाउंड समृद्ध यूरेनियम भी शामिल है.

नाभिकीय रोक
अब ट्रंप कह रहे हैं कि ‘ईरान को परमाणु क्षमता के करीब भी न पहुँचने देना और हमेशा ऐसी स्थिति में रहना, जिसमें अमेरिका तुरंत और प्रभावी कार्रवाई कर सके.’पिछले साल जून में ईरान के नाभिकीय कार्यक्रम को नष्ट करने के बाद अमेरिका की यह स्थिति बन चुकी थी. ये केंद्र अमेरिकी जासूसी उपग्रहों की कड़ी निगरानी में आ चुके हैं.
ट्रंप ने अपनी पोस्ट का अंत एक नई माँग के साथ किया. उन्होंने लिखा, ‘होर्मुज जलसंधि की सुरक्षा और निगरानी, आवश्यकतानुसार, इसका उपयोग करने वाले अन्य देशों द्वारा की जानी चाहिए. अमेरिका इसका उपयोग नहीं करता है!’ उन्होंने आगे लेखा कि अमेरिकी सेना इसमें मदद करेगी.
रुख में बदलाव
शनिवार शाम तक ट्रंप अपना रुख बदलते रहे. कुछ दिन पहले, उन्होंने इसराइल से ईरानी ऊर्जा केंद्रों को निशाना बनाने से बचने का आग्रह किया था, क्योंकि उन्हें डर था कि इससे खाड़ी क्षेत्र में जवाबी हमलों का सिलसिला और बढ़ सकता है.अब शनिवार को, उन्होंने ईरान को धमकी दी कि यदि उसने 48घंटों के भीतर ‘बिना होर्मुज को पूरी तरह से नहीं खोला’ तो उसके ऊर्जा संयंत्रों पर हमला किया जाएगा.
उन्होंने कहा कि अमेरिकी हमले ईरान के परमाणु संयंत्रों पर ‘सबसे पहले सबसे बड़े संयंत्र’ से शुरू होंगे. ईरान का सबसे बड़ा परमाणु संयंत्र बुशहर में है. दुनिया में स्पष्ट खतरों के कारण परमाणु ऊर्जा संयंत्रों पर हमलों को वर्जित माना जाता है.

वैश्विक-संकट
अंतरराष्ट्रीय ऊर्जा एजेंसी ने वर्तमान संकट को ‘वैश्विक तेल बाज़ार के इतिहास में सबसे बड़ा आपूर्ति व्यवधान’ बताया है. उधर ट्रंप और उनके सहयोगियों ने सामरिक पेट्रोलियम भंडार से तेल छोड़ने का वादा किया है, जो पहले से ही केवल 60प्रतिशत भरा हुआ है.
इस बात से समझ में आता है कि लड़ाई की योजना बगैर सोचे-समझे बनाई गई है. पिछले हफ्ते अमेरिका ने समुद्र में मौजूद रूसी और ईरानी तेल की आपूर्ति के लिए लाइसेंस जारी कर दिए.दूसरे शब्दों में, बाज़ारों को शांत करने के लिए, राष्ट्रपति ने एक तरफ रूस को समृद्ध करने की मंजूरी दी है, जो यूक्रेन के साथ युद्ध में है और दूसरी तरफ ईरान की सहायता की है, जो अमेरिका के साथ युद्ध में है.
अभी तक इस कदम के प्रभाव नगण्य हैं. गोल्डमैन सैक्स ने पिछले गुरुवार को चेतावनी दी कि यदि होर्मुज से टैंकरों को गुजरने में रुकावट लगी रही, तो 2027तक कीमतें ऊँची बनी रह सकती हैं.
ईरान का हथियार
ईरान को यह बात अच्छी तरह समझ आ गई है कि बाज़ार में अराजकता ही उनका एकमात्र बचा हुआ हथियार है. शनिवार को उसने चेतावनी दी कि वह पश्चिम एशिया के दूसरे ठिकानों को भी आग लगा सकता है.
मीडिया रिपोर्टों के अनुसार ट्रंप के संपर्क वाले विदेशी नेताओं, राजनयिकों और अमेरिकी अधिकारियों के अनुसार ट्रंप ने लड़ाई के पहले हफ्ते में ईरान के आत्मसमर्पण की उम्मीद जताई थी. 6मार्च को उन्होंने ईरान के ‘बिना शर्त आत्मसमर्पण’ की माँग साफ-साफ की थी.
वाइट हाउस ने बाद में कहा कि राष्ट्रपति को ईरान से आत्मसमर्पण की घोषणा की उम्मीद नहीं है. अलबत्ता ईरान के ‘हार न मानने’ से ट्रंप को हैरत है. उनके लिए हैरानी की बात यह भी है कि रिवॉल्यूशनरी गार्ड्स या आम ईरानियों ने बगावत नहीं की. ट्रंप अब ईरान की जनता के नाम कोई संदेश नहीं दे रहे हैं.

हैरत में ट्रंप
ट्रंप के लिए दूसरी हैरत की बात यह है कि उनके मित्रों ने ही हाथ खींच लिए हैं. संघर्ष की शुरुआत में उन्होंने इसकी कल्पना भी नहीं की थी, क्योंकि उन्हें लगा था कि युद्ध काफी छोटा होगा.वेनेजुएला के निकोलस मादुरो को उनके बिस्तर से उठा लिया गया. फिर भी वहाँ की सरकार ने ट्रंप से सहयोग करना स्वीकार किया. शायद इस बात से ट्रंप को यह भरोसा हो गया कि अमेरिकी सेना सर्वशक्तिमान है, और ईरानी प्रशासन ध्वस्त हो जाएगा.
अरब देशों का रुख
सच यह भी है कि कोई भी मुस्लिम बहुल देश ईरान की मदद के लिए आगे नहीं आया है, और कई देश तो उसे खतरा मान रहे हैं. यह बात मुस्लिम देशों की 'अखिल मुस्लिम' या व्यापक मुस्लिम एकजुटता के विपरीत भी है.
ईरान ने लंबे समय से इस्लामी एकता के रक्षक और सभी मुसलमानों के लिए मानवीय संदेशवाहक के रूप में खुद को पेश किया है. लेकिन इस बार रमज़ान के महीने में ही ईरान ने अरब देशों पर हमले किए हैं.इसकी मोटी वजह यह समझ में आती है कि मुस्लिम जगत कोई एकल या एक समान इकाई नहीं है. हरेक मुस्लिम देश (जिनमें से ज्यादातर अरब हैं) मुख्य रूप से अपने राजनीतिक और आर्थिक हितों की चिंता करता है.
इसके अलावा ईरान, भौगोलिक और सांस्कृतिक दृष्टि से अरब देशों से अलग है. वहाँ के लोग अलग भाषा फारसी बोलते हैं, और उसकी ज्यादातर आबादी शिया है. मौजूदा युद्ध का हलाँकि धर्म से बहुत कम संबंध है, लेकिन सांप्रदायिक विभाजन ने ऐतिहासिक रूप से पश्चिम एशिया में शक्ति संतुलन निर्धारित करने में प्रमुख भूमिका निभाई है.
सऊदी अरब के साथ ईरान की तनातनी को 2023में चीन की मध्यस्थता से रोकने की कोशिश भी हुई, जो लगता है कि अब टूट गई है. अरब देशों की सरकारों का रुख जो भी हो, पर यह भी देखा गया है कि आमतौर पर मुसलमान, अमेरिका और इसराइल को नापसंद करते हैं.फारस की खाड़ी के देशों ने लंबे समय से अमेरिका के साथ घनिष्ठ संबंध बनाकर रखे हैं, इसलिए क्षेत्रीय शक्ति बनने की ईरान की महत्वाकांक्षाएँ सीधे तौर पर उनके अपने हितों से टकराती हैं.
( लेखक हिंदी दैनिक हिन्दुस्तान के संपादक रहे हैं)
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