शेख सलीम चिश्ती का 456वां उर्स: 'सुलह-ए-कुल' की रूहानी वापसी

Story by  आवाज़ द वॉयस | Published by  [email protected] | Date 24-03-2026
The 456th Urs of Sheikh Salim Chishti: A Spiritual Return to 'Sulh-e-Kul'
The 456th Urs of Sheikh Salim Chishti: A Spiritual Return to 'Sulh-e-Kul'

 

fगुलाम रसूल देहलवी

फतेहपुर सीकरी में हज़रत शेख सलीम चिश्ती की दरगाह पर आज हजारों लोग जमा हैं। मैं वहीं से यह लेख लिख रहा हूँ। यहाँ आए जायरीन न केवल एक महान सूफी संत को याद कर रहे हैं, बल्कि सदियों पुरानी उस परंपरा का हिस्सा भी बन रहे हैं जिसे हम 'सुलह-ए-कुल' कहते हैं। यह परंपरा आपसी भाईचारे, राष्ट्रीय एकता, विश्व शांति और समावेशी संस्कृति का प्रतीक है।

भारत में इस्लाम का आगमन सत्ता पाने की किसी राजनीतिक विचारधारा के रूप में नहीं हुआ। यह रूहानी सुकून और मोक्ष का एक आध्यात्मिक मार्ग था। यह जमीन को जीतने के लिए नहीं, बल्कि दिलों को जीतने के लिए इस उपमहाद्वीप में पहुंचा। चिश्ती और नक्शबंदी जैसे सूफी सिलसिलों ने मध्य एशिया, ईरान और अफगानिस्तान से भारत आकर रूहानी ज्ञान और साहित्य का प्रसार किया। इन सूफी संतों ने भारत के ऐतिहासिक और सांस्कृतिक रिश्तों को अरब और मध्य एशिया के साथ और मजबूत किया। भारत के ज्यादातर बड़े सूफी संत इसी महान चिश्ती परंपरा से जुड़े थे।

इसी परंपरा के एक चमकदार सितारे हज़रत शेख सलीम चिश्ती (1478-1572) थे। मुगल काल के दौरान उनका आध्यात्मिक मार्गदर्शन बहुत अहम माना जाता था। उन्होंने फतेहपुर सीकरी में अपना ठिकाना बनाया। उनकी सफेद संगमरमर की मजार आज पूरी दुनिया के लिए एक बड़ा तीर्थ स्थल है। उन्होंने ही सम्राट अकबर के बेटे जहाँगीर के जन्म की भविष्यवाणी की थी। इसीलिए अकबर ने अपने बेटे का नाम उनके सम्मान में 'सलीम' रखा था। तब से यह दरगाह हर धर्म और जाति के लोगों के लिए एकता और शांति का केंद्र बनी हुई है।

आज जब समाज में पहचान और भेदभाव की बातें हावी होने लगी हैं, तब चिश्ती सूफियों की विरासत हमें साथ रहने का रास्ता दिखाती है। हज़रत सलीम चिश्ती ने 'सुलह-ए-कुल' के विचार को जिया। इसका सरल अर्थ है—सबके साथ शांति और मेल-मिलाप। फतेहपुर सीकरी में चल रहा यह 456वां उर्स इसी विरासत की एक जीती-जागती मिसाल है।

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सार्वभौमिक शांति और सलीम चिश्ती

हज़रत सलीम चिश्ती ने इंसानियत से बिना शर्त मोहब्बत और विनम्रता के सूफी मूल्यों को अपनाया। उनकी खानकाह हर उस शख्स के लिए खुली थी जिसे सुकून की तलाश थी। हालांकि 'सुलह-ए-कुल' का सिद्धांत अक्सर अकबर के शासन से जोड़ा जाता है, लेकिन इसकी असली प्रेरणा सलीम चिश्ती जैसे संतों की सोच में थी। चिश्ती संतों की तरह उन्होंने खुद को राजनीति से दूर रखा। फिर भी उनकी आध्यात्मिक शक्ति ने ऐसा माहौल बनाया जहाँ अलग-अलग धर्मों के बीच संवाद और सहिष्णुता पनप सकी। उन्होंने दिखाया कि समाज को बल से नहीं, बल्कि सेवा और उदाहरण से बदला जा सकता है।

उर्स मुबारक: एक जीवंत परंपरा

हज़रत सलीम चिश्ती फाउंडेशन के तत्वावधान में 10 मार्च से 25 मार्च 2026 तक यह उर्स मनाया जा रहा है। यह सिर्फ एक रस्म नहीं है। यह एक रूहानी जमावड़ा है जिसमें भारत के कोने-कोने से चार लाख से ज्यादा जायरीन शामिल हो रहे हैं। यह इस बात का सबूत है कि सूफी मूल्य आज भी हमारे समाज में कितने जरूरी हैं। यह उर्स सांस्कृतिक और धार्मिक सीमाओं को मिटाकर लोगों को एक सूत्र में पिरोता है।

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रंग-ए-सूफियाना: साझा संस्कृति का जश्न

इस उर्स के समापन पर 24 और 25 मार्च को दरगाह परिसर में 'रंग-ए-सूफियाना' (भक्ति के रंग) नामक एक सांस्कृतिक उत्सव आयोजित किया जा रहा है। इसमें सूफी और भक्ति परंपराओं का संगम दिखेगा। संगीत, साहित्य और कला के जरिए भारत की साझा विरासत का जश्न मनाया जाएगा। इसमें विद्वान, इतिहासकार, लेखक और संगीतकार शामिल होंगे। कव्वाली और कविताओं के जरिए यह संदेश दिया जाएगा कि आध्यात्मिकता और संस्कृति लोगों को जोड़ने का काम करती हैं, बांटने का नहीं।

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आज के दौर में इसकी अहमियत

धार्मिक ध्रुवीकरण के इस दौर में हज़रत सलीम चिश्ती का संदेश बहुत कीमती है। यह उर्स हमें याद दिलाता है कि भारत की असली ताकत उसकी विविधता और सूफी परंपराओं में है। चिश्ती संतों का 'सुलह-ए-कुल' का विचार कोई पुरानी ऐतिहासिक बात नहीं है। यह एक जीता-जागता सिद्धांत है जो सामाजिक एकता की प्रेरणा देता है। फतेहपुर सीकरी के इस उर्स जैसे आयोजनों से एक ऐसे समाज की उम्मीद जगती है जो दया, संवाद और आपसी सम्मान पर टिका हो।

हज़रत सलीम चिश्ती का जीवन हमें सिखाता है कि सच्ची आध्यात्मिकता सीमाओं को पार करती है और दिलों को जोड़ती है। मशहूर सूफी कवि जलालुद्दीन रूमी ने फारसी में लिखा था:"तू बरा-ए-वस्ल करदन आमदी, नेह बरा-ए-फस्ल करदन आमदी"

इसका अर्थ है: तुम्हें इस दुनिया में दिलों को जोड़ने और मिलाने के लिए भेजा गया है, बांटने या अलग करने के लिए नहीं।

आज जब मैं इस उर्स के मौके पर हजारों लोगों को इकट्ठा देखता हूँ, तो भरोसा जागता है। यहाँ आए लोग न केवल संत का सम्मान कर रहे हैं, बल्कि मेल-मिलाप और राष्ट्रीय एकता की सदियों पुरानी परंपरा को आगे बढ़ा रहे हैं। हम भारतीयों के लिए, चाहे हम मुस्लिम हों या गैर-मुस्लिम,आगे बढ़ने का रास्ता इसी बिना शर्त मोहब्बत और एकता में छिपा है।


गुलाम रसूल देहलवी (इंडो-इस्लामिक स्कॉलर और लेखक)