ईरान टकराव को ‘धर्मयुद्ध’ में बदलने की कोशिश

Story by  आवाज़ द वॉयस | Published by  [email protected] | Date 22-03-2026
Iran Attempts to Turn Conflict into a ‘Holy War’
Iran Attempts to Turn Conflict into a ‘Holy War’

 

 अब्दुल्लाह मंसूर

क्या यह संभव है कि दुनिया की सबसे आधुनिक सेनाएँ, जिनके पास परमाणु हथियार और आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस जैसी अभूतपूर्व तकनीकी शक्ति है, अपने संघर्ष/युद्ध को समझाने के लिए अब भी प्राचीन धार्मिक कल्पनाओं और भविष्यवाणियों की भाषा का सहारा ले रही हों? 2026 में ईरान, इजराइल और अमेरिका के बीच बढ़ता टकराव केवल भू-राजनीतिक हितों, सुरक्षा चिंताओं या संसाधनों की प्रतिस्पर्धा तक सीमित नहीं दिखता। हाल की कुछ घटनाएँ और बयान इस संघर्ष को एक व्यापक वैचारिक और धार्मिक संदर्भ में देखने की जरूरत का संकेत देते हैं।

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वाइट हाउस में 6मार्च को हुई सार्वजनिक प्रार्थना, इजराइली नेतृत्व द्वारा दिए गए ऐसे भाषण जिनमें संघर्ष को “प्रकाश और अंधकार” की लड़ाई के रूप में प्रस्तुत किया गया, और ‘अमालेक’ जैसे ऐतिहासिक-धार्मिक प्रतीकों का इस्तेमाल  ये सब मिलकर एक ऐसे नैरेटिव की ओर इशारा करते हैं जिसमें युद्ध को केवल रणनीतिक नहीं बल्कि नैतिक और आध्यात्मिक अर्थ भी दिए जा रहे हैं।

यह लेख इसी जटिल परत को समझने की कोशिश है कि कैसे आधुनिक शक्ति-राजनीति, धार्मिक विश्वासों और वैश्विक मीडिया के नैरेटिव एक दूसरे को प्रभावित करते हुए आज के संकट को आकार दे रहे हैं।

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'अमालेक' का संदर्भ और 'ग्रेटर इजराइल' का बिब्लिकल एजेंडा

इजराइल की मौजूदा सैन्य कार्रवाइयों को यदि आप केवल आत्मरक्षा समझेंगे, तो आप बड़ी भूल कर रहे हैं। इसके पीछे जो असली वैचारिक इंजन काम कर रहा है, उसे 'ग्रेटर इजराइल' का प्रोजेक्ट कहा जाता है। इसका आधार कोई आधुनिक संविधान या अंतरराष्ट्रीय कानून नहीं, बल्कि हजारों साल पुरानी बिब्लिकल मान्यताएँ हैं।

इस विचारधारा के समर्थकों का मानना है कि ईश्वर ने यहूदियों को जो जमीन देने का वादा किया था, वह मिस्र की नील नदी से लेकर इराक की फरात (Euphrates) नदी तक फैली हुई है। 12मार्च 2026को एक प्रेस कॉन्फ्रेंस में बेंजामिन नेतन्याहू ने जब ईरान और उसके सहयोगियों की तुलना प्राचीन बिब्लिकल जाति 'अमालेक' (Amalekites) से की, तो उन्होंने एक बहुत ही खतरनाक संदेश दिया।

धार्मिक ग्रंथों के अनुसार, 'अमालेक' वह कौम है जिसे जड़ से मिटाना खुदा का हुक्म माना गया है। जब एक आधुनिक राष्ट्र का प्रमुख अपने दुश्मन को 'इंसान' के बजाय 'ईश्वर का शत्रु' घोषित कर देता है, तो वहां दया, मानवाधिकार या युद्ध के नियमों के लिए कोई जगह नहीं बचती। आज गाजा से लेकर लेबनान तक जो तबाही दिख रही है, वह इसी 'अमलेकाइट्स' वाली मानसिकता का परिणाम है, जहाँ नागरिकों को मारना 'पुण्य' का काम समझा जा रहा है।

यह 'ग्रेटर इजराइल' का सपना अब केवल नक्शों तक सीमित नहीं रहा। नेतन्याहू ने मार्च 2026के अपने संबोधनों में स्पष्ट किया है कि वे एक "ऐतिहासिक और आध्यात्मिक मिशन" पर हैं। यह किसी लोकतांत्रिक नेता की भाषा नहीं, बल्कि एक 'मजहबी योद्धा' की हुंकार है।

इस एजेंडे का पहला चरण फिलिस्तीन का नामोनिशान मिटाना था, और अब दूसरा चरण पूरे क्षेत्र पर आधिपत्य स्थापित करना है। इजराइल का मानना है कि जब तक ईरान का शासन खत्म नहीं होता और उसके सहयोगी संगठन जड़ से नहीं मिटते, तब तक उनका यह 'ईश्वरीय वादा' अधूरा है।

विडंबना देखिए, यदि दुनिया का कोई भी मुस्लिम देश धर्म के नाम पर अपनी सीमाएं बढ़ाने की बात करता, तो उसे तुरंत 'जिहादी' और 'आतंकवादी' घोषित कर दिया जाता। लेकिन यहाँ दुनिया की सबसे बड़ी महाशक्ति (अमेरिका) खुलेआम धार्मिक अंधविश्वासों को अपनी विदेश नीति का आधार बना रही है और पूरी दुनिया इस दोहरे मापदंड पर खामोश तमाशा देख रही है।

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अमेरिकी राजनीति में 'अर्मागेडन' और मसीहाई कल्ट का संकट

इजराइल की इस आग को असली घी अमेरिका से मिल रहा है, और यहाँ का सच और भी ज्यादा डरावना है। अमेरिका, जो खुद को विज्ञान और लोकतंत्र का चैंपियन कहता है, आज 'डिस्पेंसेशनलिज्म' (Dispensationalism) नामक एक मजहबी सनक की गिरफ्त में है।

एक आम पाठक के लिए इसे समझना बहुत जरूरी है,यह एक ऐसा सिद्धांत है जो मानता है कि दुनिया के अंत का समय करीब है और ईसा मसीह का दोबारा आगमन तभी होगा जब कुछ शर्तें पूरी होंगी। पहली शर्त है कि यहूदी अपनी प्राचीन भूमि पर पूरी तरह लौटें और दूसरी यह कि यरूशलम की अल-अक्सा मस्जिद को ढहाकर वहां 'तीसरा मंदिर' बनाया जाए।

इस पूरी प्रक्रिया के दौरान होने वाले अंतिम भीषण युद्ध को वे 'अर्मागेडन' (Armageddon) कहते हैं। डरावनी बात यह है कि अमेरिका में 'CUFI' (Christians United for Israel) जैसे संगठनों के करोड़ों अनुयायी इस महाविनाश से डरते नहीं हैं, बल्कि वे इसका इंतजार कर रहे हैं। उनके लिए शांति का मतलब मसीह के आने में देरी है, इसलिए वे चाहते हैं कि युद्ध और तबाही और बढ़े।

यही कारण है कि अमेरिकी रक्षा सचिव पीटे हेगसेथ और मार्क रूकियो जैसे बड़े अधिकारी जब 'क्रूसेड' (धर्मयुद्ध) की भाषा बोलते हैं या अपनी वर्दी पर 'Deus Vult' (ईश्वर की इच्छा) जैसे नारे लिखते हैं, तो वे दुनिया को बचाने की नहीं बल्कि उसे खत्म करने की तैयारी कर रहे होते हैं।

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'मिलिट्री रिलिजियस फ्रीडम फाउंडेशन' (MRFF) को अमेरिकी सैनिकों से ईमेल के जरिए शिकायतें मिलीं। ईमेल लिखने वाले अधिकारी ने बताया कि उनके कमांडर ने अधिकारियों पर दबाव डाला कि वे अपने सैनिकों को बताएं कि यह युद्ध अर्मागेडन (Armageddon) का कारण बनने और ईसा मसीह की पृथ्वी पर वापसी को चिह्नित करने के लिए है।

यह एक तरह का 'सुसाइड कल्ट' है जिसने सत्ता पर कब्जा कर लिया है। आज का सबसे बड़ा संकट यह है कि कट्टरपंथ ने अपना स्वरूप बदल लिया है; अब यह 'सूट-बूट' पहनकर पेंटागन और इजराइली कैबिनेट में बैठा है। इनके पास एक तरफ परमाणु बम जैसे विनाशकारी हथियार हैं, लेकिन सोचने का तरीका 5वीं सदी के कबीलाई कबीलों जैसा है।

अंतरराष्ट्रीय संस्थाएं जैसे UN और ICJ इनके सामने बेबस हैं क्योंकि 'जिसकी लाठी उसकी भैंस' के नियम को अब धार्मिक पवित्रता का जामा पहना दिया गया है। अगर आम लोग इस 'पॉलिटिकल थियोलॉजी' के खेल को नहीं समझेंगे, तो वे हमेशा मीडिया के बनाए 'सुरक्षा' वाले झूठे नैरेटिव में उलझे रहेंगे।

इतिहास गवाह है कि सत्ता की भूख जब भी बेकाबू हुई है, उसने धर्म को अपनी ढाल बनाया है। 2026में इजराइल और ईरान के बीच छिड़ा यह 'धर्मयुद्ध' कोई पहली घटना नहीं है। इससे पहले 9/11के बाद जॉर्ज बुश ने इराक और अफगानिस्तान पर हमले को खुलेआम 'क्रूसेड' (Crusade) का नाम दिया था।

ठीक इसी तरह, जब पाकिस्तान भारत के खिलाफ अपनी नापाक साजिशें रचता है, तो वह उसे 'गजवा-ए-हिन्द' या 'जिहाद' के नाम पर पेश करता है ताकि वह अपने सैनिकों और जनता को गुमराह कर सके। हमने देखा कि जब ISIS का उदय हुआ, तो उन्होंने भी 'मेहदी' के आने और 'दबीक' के मैदान में होने वाले 'अंतिम युद्ध' की भविष्यवाणियों का सहारा लेकर दुनिया भर के युवाओं को तबाही के रास्ते पर धकेला। इन सभी उदाहरणों में एक बात समान है धर्म का उपयोग केवल 'नरसंहार' को 'पवित्र' साबित करने के लिए किया गया।

सच तो यह है कि 'अर्मागेडन' हो या 'जिहाद', ये शब्द कूटनीति की मेज पर हारी हुई मानवता के प्रतीक हैं। 2026का यह संकट हमें चेतावनी दे रहा है कि यदि हमने 'मजहबी जुनून' को आधुनिक तकनीक से अलग नहीं किया, तो हम एक ऐसे अंधे कुएं में गिरेंगे जहाँ से वापसी का कोई रास्ता नहीं होगा।

आज मानवता की मांग है कि हम इन 'स्वघोषित मसीहाओं' और उनकी 'स्व-निर्मित भविष्यवाणियों' को नकारें। शांति का रास्ता किसी प्राचीन ग्रंथ की विनाशकारी व्याख्या से नहीं, बल्कि तर्क, करुणा और अंतरराष्ट्रीय न्याय के सिद्धांतों से निकलेगा। हमें यह समझना होगा कि बम और मिसाइलें धर्म नहीं देखतीं, वे केवल जीवन को नष्ट करती हैं। असली 'धर्म' इंसानों को मारना नहीं, बल्कि इंसानियत को बचाना है। यदि हम आज इस बारीक खेल को नहीं समझेंगे, तो इतिहास हमें उन लोगों के रूप में याद रखेगा जिन्होंने अपनी धार्मिक सनक की वेदी पर एक पूरी सभ्यता की बलि चढ़ा दी।

( लेखक अब्दुल्लाह मंसूर, एक लेखक और पसमांदा बुद्धिजीवी हैं। वे 'पसमांदा दृष्टिकोण' से लिखते हैं।)