Eid: A Festival of Joy, Love, and Brotherhood—A Message for the Needy
-डॉ. फ़िरदौस ख़ान
ईद का मक़सद ख़ुशियां बांटना है। ‘ईद’ अरबी भाषा का शब्द है, जिसका अर्थ है ख़ुशी। इसके नाम में ही ख़ुशी समायी हुई है, इसीलिए तो यह त्यौहार ख़ुशियों की सौग़ात लेकर आता है। दरअसल, दुनियाभर में अनेक तबक़ों के लोग रहते हैं। कुछ लोग बहुत अमीर हैं, जिनके पास दुनिया की हर शय मौजूद है। कुछ लोगों के पास बस ज़रूरत की ही चीज़ें हैं और वे मुश्किल से अपना गुज़ारा कर रहे हैं। बहुत से लोग ऐसे हैं, जिनके सिर पर न छत है और न पेटभर खाना। ऐसे ज़रूरतमंद लोगों की ज़िन्दगी को बेहतर बनाने का नाम ही ईद है। दीन-ए-इस्लाम में ग़रीबों का ख़ास ख़्याल रखा गया है।
ज़रूरतमंदों की मदद करना
ईद पर ज़कात, फ़ितरे और सदक़े के ज़रिये ज़रूरतमंद लोगों की मदद की जाती है। क़ुरआन करीम और मुख़तलिफ़ हदीसों में इसका ज़िक्र मिलता है। क़ुरआन पाक में अल्लाह तआला ने बार-बार ज़रूरतमंदों की मदद करने का हुक्म दिया है और ज़रूरतमंदों की मदद करने वाले लोगों को ‘सच्चा’ कहा है।
अल्लाह तआला ने फ़रमाया है- “नेकी सिर्फ़ यही नहीं है कि तुम अपना रुख़ मशरिक़ और मग़रिब की तरफ़ फेर लो, बल्कि असल नेकी तो ये है कि कोई शख़्स अल्लाह और क़यामत के दिन और फ़रिश्तों और अल्लाह की किताब और नबियों पर ईमान लाए और अल्लाह की मुहब्बत में अपना माल रिश्तेदारों और यतीमों और मिस्कीनों और मुसाफ़िरों और मांगने वालों पर और ग़ुलामों को आज़ाद कराने में ख़र्च करे और पाबंदी से नमाज़ पढ़े और ज़कात देता रहे और जब कोई वादा करे, तो उसे पूरा करे और तंगी और मुसीबत और जंग की सख़्ती के वक़्त सब्र करने वाला हो। यही लोग सच्चे हैं और यही लोग परहेज़गार हैं। (क़ुरआन 2:117)
क़ुरआन करीम में ज़रूरतमंद लोगों की मदद करने का हुक्म देने के साथ-साथ उन्हें इसके लिए प्रोत्साहित भी किया गया है। अल्लाह तआला ने फ़रमाया है- “जो लोग अपना माल अल्लाह की राह में ख़र्च करते हैं, उनके ख़र्च की मिसाल उस दाने की मानिन्द है जिससे सात बालियां निकलें और हर बाली में सौ दाने हों। और अल्लाह जिसके लिए चाहता है, इज़ाफ़ा कर देता है। और अल्लाह बड़ा वुसअत वाला बड़ा साहिबे इल्म है। (क़ुरआन 2: 261)
इसका मतलब ये है कि ज़रूरतमंदों की मदद के लिए वाले लोगों के माल में बढ़ोतरी होती रहती है। हज़रत अबू हुरैरा रज़ियल्लाहु अन्हु से रिवायत है कि अल्लाह के रसूल हज़रत मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने फ़रमाया- “अल्लाह तआला फ़रमाता है कि इब्ने आदम! तू ख़र्च कर, मैं तुझ पर ख़र्च करूंगा।“ (सही बुख़ारी : 5352, सही मुस्लिम : 993)
फ़ितरा ईद से पहले देना लाज़िमी है, ताकि ग़रीब भी ईद मना सकें। अल्लाह के रसूल हज़रत मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने फ़रमाया है- “जिसने ईद की नमाज़ के बाद फ़ितरा दिया, वह सिर्फ़ आम सदक़ा शुमार होगा।“(सुनन इब्ने माजा : 1827)
हज़रत इब्ने उमर रज़ियल्लाहु अन्हु हर उस ज़रूरतमंद को सदक़ा-ए- फ़ित्र दे दिया करते थे, जो उसे क़ुबूल करता था। लोग आमतौर पर ईद से एक-दो दिन पहले ही इसे अदा कर दिया करते थे। (सही बुख़ारी :1511)
आप सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने फ़रमाया है- “फ़ितरा हर आज़ाद, ग़ुलाम, मर्द, औरत, छोटे और बड़े मुसलमान पर फ़र्ज़ है।“ (सही बुख़ारी : 1504)
आप सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने फ़रमाया है- “जो शख़्स अल्लाह की राह में कोई चीज़ ख़र्च करे, तो उसके लिए वह चीज़ सात सौ गुना बढ़ाकर लिखी जाती है।“ (सुनन तिर्मिज़ी : 1625)
आप सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने फ़रमाया है- “ख़ैरात मत रोको, वरना तुम्हारा रिज़्क़ भी रोक लिया जाएगा।” (सही बुख़ारी : 1433)
आप सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने फ़रमाया है- “सदक़ा करके अपने और अपने परवरदिगार के दरम्यान ताल्लुक़ पैदा करो। तुम्हें रिज़्क़ दिया जाएगा, तुम्हारी मदद भी की जाएगी और तुम्हारे नुक़सान की भरपाई भी की जाएगी।” (सुनन इब्ने माजा : 1081)
सदक़े पर ज़्यादा से ज़्यादा ज़ोर दिया गया है, ताकि इससे ग़रीबों का भला हो सके। हर व्यक्ति को रोटी, कपड़ा और मकान जैसी बुनियादी सुविधाएं मिलनी ही चाहिए। ईद पर सदक़े के ज़रिये बदहाल लोगों की माली मदद की जाती है, ताकि वे भी आराम से ज़िन्दगी गुज़ार सकें। बहुत से लोग इन पैसों से ज़रूरतमंद लोगों को सालभर का ख़र्च दे देते हैं। कुछ लोग पैसा इकट्ठा करके किसी बेघर को मकान ख़रीदकर दे देते हैं। इस्लाम में सदक़ा बिना प्रचार के दिया जाता है यानी एक हाथ से कुछ दो, तो दूसरे हाथ को इसकी ख़बर तक न हो।
गिले-शिकवे दूर करके सुलह करना
ईद प्रेम, भाईचारे और आपसी सद्भाव का त्यौहार है। इस दिन लोग आपसी गिले-शिकवे भुलाकर गले मिल लेते हैं। शायर मुहम्मद असदुल्लाह की ज़ुबानी-
दिलों में प्यार जगाने को ईद आई है
हँसो कि हँसने हँसाने को ईद आई है
मसर्रतों के ख़ज़ाने दिए ख़ुदा ने हमें
तराने शुक्र के गाने को ईद आई है
महक उठी है फ़ज़ा पैरहन की ख़ुश्बू से
चमन दिलों का खिलाने को ईद आई है
ख़ोशा कि शीर-ओ-शकर हो गए गले मिलकर
ख़ुलूस-ए-दिल ही दिखाने को ईद आई है
उठा दो दोस्तो इस दुश्मनी को महफ़िल से
शिकायतों के भुलाने को ईद आई है
किया था अहद कि ख़ुशियां जहां में बांटेंगे
इसी तलब के निभाने को ईद आई है
रब का शुक्र अदा करना
ईद अपने रब का शुक्र अदा करने का त्यौहार है। बन्दा रमज़ान की नेअमतों के लिए अपने परवरदिगार का शुक्र अदा करता है। ईद से पहले रमज़ान में रोज़ों और दीगर इबादतों के ज़रिये वह अपने रब के और ज़्यादा क़रीब हो जाता है। उसके आत्म संयम और त्याग आदि के गुणों में भी बढ़ोतरी हो जाती है। इस दौरान मस्जिदें नमाज़ियों से भर जाती हैं यानी जो लोग आम दिनों में पाबंदी से नमाज़ अदा नहीं कर पाते, वे भी रमज़ान में नमाज़ के पाबंद हो जाते हैं।
सद्भावना का प्रतीक
ईद पर मुसलमानों की ख़ुशी में अन्य धर्मों के लोग भी शामिल होते हैं। वे अपने मुस्लिम दोस्तों से सेवियों की फ़रमाइश करते हैं। पिछले साल से ईद पर नमाज़ पढ़ रहे मुसलमानों पर हिन्दू और सिख भाइयों द्वारा फूल बरसाने के मामले भी सामने आ रहे हैं। देश के बहुत से शहरों में नमाज़ियों पर फूल बरसाए गए। मुम्बई में पुलिस और नमाज़ियों ने एक-दूसरे को गुलाब के फूल देकर ईद की मुबारकबाद दी थी। हाल ही में अलविदा जुमे की नमाज़ में भी हिन्दू भाइयों ने नमाज़ियों पर फूल बरसाए थे। बहरहाल, नफ़रतों के दौर में ये ख़बरें ख़ुशनुमा हवा के झोंके की तरह सुकून देने वाली हैं।