इज़राइल का 'मिनी महाराष्ट्र': डिमोना की गलियों में धड़कता भारतीय दिल

Story by  मलिक असगर हाशमी | Published by  [email protected] | Date 25-03-2026
Israel's 'Mini Maharashtra': An Indian Heart Beats in the Streets of Dimona.Image Credit: Ilan Asayag, Haaretz
Israel's 'Mini Maharashtra': An Indian Heart Beats in the Streets of Dimona.Image Credit: Ilan Asayag, Haaretz

 

मलिक असगर हाशमी

जब हाल ही में ईरानी मिसाइलों के गिरने की खबरों ने इज़राइल के डिमोना शहर को सुर्खियों में ला दिया, तो दुनिया का ध्यान वहां के परमाणु संयंत्र पर गया। लेकिन बहुत कम लोग जानते हैं कि रेगिस्तान के बीच बसे इस शहर की रूह में 'मराठी' खुशबू बसी है। करीब चालीस हजार की आबादी वाले इस शहर में 8 हजार से ज्यादा लोग मराठी भाषी हैं। डिमोना की गलियों में घूमते हुए आपको यकीन ही नहीं होगा कि आप इज़राइल के किसी शहर में हैं। यहां के घरों से पोहा, वड़ा-पाव और जलेबी की महक आती है। शाम को पार्कों में क्रिकेट के चर्चे होते हैं और घरों के अंदर आज भी शुद्ध मराठी बोली जाती है। यह शहर इज़राइल के नक्शे पर एक 'छोटा भारत' जैसा नज़र आता है।

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डिमोना के बारे में आम धारणा यह है कि यह केवल इज़राइल के परमाणु कार्यक्रम का केंद्र है। हकीकत इससे कोसों दूर और कहीं ज्यादा दिलचस्प है। यह शहर उद्योगों का गढ़ है। 1980 के दशक में यहां 'डिमोना टेक्सटाइल्स लिमिटेड' जैसी बड़ी कंपनियों का राज था। आज भी शहर की एक-तिहाई आबादी पास के 'डेड सी' (मृत सागर) के केमिकल प्लांट्स, हाई-टेक कंपनियों और कपड़ा मिलों में काम करती है। नेगेव रेगिस्तान के इस शुष्क इलाके में बसा यह शहर 1955 में वजूद में आया था। यहां रहने वाले भारतीय मूल के यहूदी मुख्य रूप से 1960 के दशक में आकर बसे थे। इन्हें 'बेने इज़राइल' कहा जाता है।

साड़ियों और बॉलीवुड के बीच यहूदी रस्में

इज़राइल में रहने वाले इन भारतीय यहूदियों का इतिहास करीब दो हजार साल पुराना है। ये लोग सदियों तक भारत के महाराष्ट्र, केरल और कोलकाता जैसे इलाकों में बिना किसी भेदभाव के रहे। जब 1948 में इज़राइल एक स्वतंत्र देश बना, तो "अपनी मातृभूमि" लौटने के विचार ने इन्हें आकर्षित किया।

लेकिन ये अपने साथ भारत की यादें और संस्कृति भी ले गए। आज भी डिमोना में होने वाली शादियां किसी बॉलीवुड फिल्म के सेट जैसी लगती हैं। दुल्हन साड़ी पहनती है और हवा में हिंदी गानों की गूंज होती है। धार्मिक रस्में भले ही यहूदी हों, लेकिन उत्सव का रंग, स्वाद और संगीत पूरी तरह भारतीय होता है। दिवाली और ओणम जैसे त्योहार यहां उसी उत्साह से मनाए जाते हैं जैसे मुंबई या कोच्चि में।

भारत की मिट्टी और इज़राइल की पहचान

भारत में यहूदी समुदाय हमेशा से सम्मान के साथ फला-फूला। कोंकण तट के बेने इज़राइल मराठी संस्कृति में ऐसे रचे-बसे कि उन्होंने वहां की भाषा और खान-पान को पूरी तरह अपना लिया। केरल के कोचीन यहूदी और बगदादी यहूदियों ने भी भारत के सामाजिक और आर्थिक विकास में बड़ा योगदान दिया। भारतीय इतिहास के कई चमकदार सितारे इसी समुदाय से रहे हैं।

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1971 के युद्ध के नायक लेफ्टिनेंट जनरल जे.एफ.आर. जैकब हों, कवि निसिम इज़ीकील हों या हिंदी सिनेमा की मशहूर अदाकारा सुलोचना और अभिनेता डेविड अब्राहम,इन सबने भारत का नाम रोशन किया। एस्थर डेविड ने अपनी लेखनी से भारतीय यहूदियों की ज़िंदगी को दुनिया के सामने रखा, जिसके लिए उन्हें साहित्य अकादमी अवॉर्ड से नवाजा गया। मुंबई का मशहूर ससून हॉस्पिटल और कई स्कूल आज भी इस समुदाय की दरियादिली की गवाही देते हैं।

नेगेव का कठोर भूगोल और डिमोना का महत्व

डिमोना जिस नेगेव क्षेत्र में स्थित है, वह इज़राइल के दक्षिणी भाग का एक विशाल शुष्क इलाका है। यह पूरे इज़राइल के लगभग 60 प्रतिशत हिस्से को कवर करता है। भूवैज्ञानिक दृष्टि से यह क्षेत्र चूना पत्थर और ऊँची चट्टानों से घिरा है। यहां की एक अनोखी विशेषता 'मख्तेशिम' या अपरदन क्रेटर हैं। इनमें 'मख्तेश रामोन' सबसे विशाल है। यह इलाका जितना कठोर है, उतना ही रणनीतिक रूप से महत्वपूर्ण भी है। डिमोना इसी तपते रेगिस्तान के बीच एक औद्योगिक नखलिस्तान की तरह खड़ा है।

परमाणु युग और वैश्विक चिंताएं

डिमोना का नाम आते ही परमाणु संयंत्र की चर्चा लाज़मी है। परमाणु हथियार विकसित करने की तकनीक ने दुनिया को दो हिस्सों में बांट दिया है। 1945 में जापान के हिरोशिमा और नागासाकी पर गिरे बमों ने जो तबाही मचाई थी, उसकी यादें आज भी सरकारों को डराती हैं।

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उस विनाशकारी शक्ति ने ही दुनिया को परमाणु अप्रसार संधि (NPT) जैसे समझौतों की मेज पर लाया। परमाणु हथियार केवल बम नहीं हैं, वे एक ऐसी विनाशकारी शक्ति हैं जो पलक झपकते ही शहरों को राख कर सकते हैं। इज़राइल का डिमोना संयंत्र भी इसी संवेदनशील राजनीति का केंद्र रहा है।

बदलते दौर में नई उम्मीदें

आज इज़राइल में करीब 80 हजार से ज्यादा भारतीय मूल के यहूदी रहते हैं। वे केवल डिमोना में ही नहीं, बल्कि तेल अवीव, हाइफा और अश्दोद जैसे बड़े शहरों में भी फैले हुए हैं। कई लोग आईटी, बिजनेस और सर्विस सेक्टर में अपनी पहचान बना रहे हैं। इज़राइल सरकार अब 'बनी मेनाशे' समुदाय के बाकी सदस्यों को भी वापस लाने की योजना पर काम कर रही है। ये लोग उत्तर-पूर्व भारत से हैं और खुद को इज़राइल के खोए हुए कबीलों का वंशज मानते हैं।

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कुल मिलाकर, डिमोना की कहानी सिर्फ मिसाइलों या परमाणु रिएक्टरों की कहानी नहीं है। यह उन लोगों की कहानी है जिन्होंने सात समंदर पार जाकर भी अपनी जड़ों को नहीं भुलाया। यह उन मराठियों की कहानी है जो हिब्रू भाषा वाले देश में रहकर भी आज भी 'जय महाराष्ट्र' कहना और वड़ा-पाव खाना नहीं भूले। डिमोना हमें याद दिलाता है कि इंसान चाहे दुनिया के किसी भी कोने में बस जाए, उसके दिल का एक कोना हमेशा अपनी पुरानी मिट्टी के लिए धड़कता रहता है।