फारूक शेख : सादगी भरी अदाकारी, जो आज भी दिलों में जिंदा है

Story by  PTI | Published by  [email protected] | Date 25-03-2026
Farooq Sheikh Birthday: A simple act that still lives on in our hearts
Farooq Sheikh Birthday: A simple act that still lives on in our hearts

 

अर्सला खान/नई दिल्ली 

25 मार्च की सुबह हिंदी सिनेमा के एक ऐसे चेहरे को याद करने की वजह बनती है, जिसने बिना शोर किए, बिना चमक दिखाए, दर्शकों के दिलों में गहरी जगह बनाई। Farooq Sheikh उन कलाकारों में थे, जिनके लिए अभिनय सिर्फ पेशा नहीं, एक सच्चा अनुभव था।

उनका नाम लेते ही एक सहज मुस्कान याद आती है। आंखों में एक सादगी दिखती है। ऐसा लगता है जैसे वह पर्दे पर नहीं, हमारे आसपास के ही किसी इंसान की कहानी कह रहे हों। यही उनकी सबसे बड़ी ताकत थी। सत्तर और अस्सी का दशक हिंदी सिनेमा में बदलाव का दौर था। इसी दौर में Chashme Buddoor जैसी फिल्म आई। हल्की फुल्की कहानी। साधारण किरदार। लेकिन फारूक शेख ने इसे खास बना दिया। सेट पर भी उनका अंदाज अलग था। वह रिहर्सल के दौरान सीन को अपने तरीके से जीते थे। कई बार उनका इम्प्रोवाइजेशन इतना स्वाभाविक होता कि वही टेक फाइनल हो जाता।
 

फिर आई Katha। इस फिल्म में उनका किरदार एक सीधे सादे युवक का था। यह किरदार किसी बड़े हीरो जैसा नहीं था। न ही उसमें कोई दिखावा था। मगर यही सादगी दर्शकों को छू गई। फारूक शेख ने इस रोल के लिए कोई भारी तैयारी नहीं की। वह कहते थे कि सच्चे किरदार को बस महसूस करना होता है। शायद इसी वजह से उनका अभिनय बनावटी नहीं लगता था।
 

Umrao Jaan में उनकी मौजूदगी अलग रंग लेकर आई। फिल्म में Rekha का किरदार बेहद प्रभावशाली था। शुरुआत में फारूक शेख को लगा कि उनका रोल कहीं पीछे न छूट जाए। लेकिन उन्होंने इसे चुनौती की तरह लिया। कम संवादों में भी उन्होंने अपने किरदार को जीवंत बना दिया। यह उनकी अभिनय क्षमता का प्रमाण था।
 

Noorie की शूटिंग के दौरान कश्मीर की वादियों में उनका समय खास रहा। वहां के लोगों से उनका जुड़ाव इतना सहज था कि शूट खत्म होने के बाद भी वह रिश्ते बने रहे। यह बात उनके व्यक्तित्व को समझने के लिए काफी है। वह सिर्फ अभिनेता नहीं थे। वह लोगों के अपने थे।
 

फारूक शेख का सफर आसान नहीं था। उन्होंने ग्लैमर से दूरी बनाए रखी। उन्हें भीड़ से अलग खड़ा होने की जल्दी नहीं थी। वह अपने काम से पहचाने जाना चाहते थे। यही वजह है कि उन्होंने चुनिंदा फिल्में कीं, लेकिन हर किरदार यादगार बना।
 

टीवी पर भी उनकी मौजूदगी उतनी ही सशक्त रही। Jeena Isi Ka Naam Hai के जरिए उन्होंने कई कलाकारों की जिंदगी के अनकहे पहलुओं को सामने लाया। उनकी बातचीत में गर्मजोशी थी। मेहमान सहज हो जाते थे। यह हुनर हर किसी के पास नहीं होता।
 

आज जब सिनेमा में दिखावे का शोर ज्यादा सुनाई देता है, तब फारूक शेख की याद और गहरी हो जाती है। उनकी सादगी आज भी ताजा लगती है। उनके किरदार आज भी सच लगते हैं।
 

25 मार्च सिर्फ एक जन्मतिथि नहीं है। यह उस अभिनय की याद है, जो बिना शोर के दिलों तक पहुंचता है। फारूक शेख की यही पहचान थी। और यही उनकी सबसे बड़ी विरासत है।