सबीहा फातिमा | बेंगलुरु
27 साल की उम्र में जब ज़्यादातर युवा अपने करियर में स्थिरता ढूंढ रहे होते हैं, एडवोकेट तुबा सनोबर मकसद की नई परिभाषा लिख रही हैं। वे किसी कमरे में खामोशी से दाखिल नहीं होतीं। ऐसा इसलिए नहीं कि वे शोर मचाती हैं, बल्कि इसलिए क्योंकि वे खुद को लेकर पूरी तरह स्पष्ट हैं। उन्हें पता है कि वे कौन हैं और किस हक के लिए खड़ी हैं। उनके लिए "अधिकार" महज़ कानूनी शब्द नहीं, बल्कि जीने के लिए ज़रूरी सांसों की तरह हैं।

मध्य प्रदेश के एक छोटे से शहर सिवनी में जन्मी तुबा की शुरुआत बेहद साधारण थी। उनके पिता रेलवे में थे। इस नौकरी का मतलब था बार-बार होने वाले तबादले और अस्थिर जीवन। उनकी मां एक गृहणी थीं, जिन्होंने हर बदलाव और समझौते के बीच परिवार को जोड़कर रखा। संघर्ष असली थे जैसे पैसों की तंगी, नए शहर और अनजाने स्कूल। लेकिन उनके माता-पिता का इरादा भी पक्का था कि उनके दोनों बच्चे अपनी परिस्थितियों से कहीं बड़े सपने देखें।
बचपन से ही तुबा भीड़ में अलग दिखती थीं। स्कूल का स्टेज उनका मैदान था। चाहे वाद-विवाद हो, गायन हो या भाषण, उनमें एक कुदरती खिंचाव था। गाना उनके लिए सिर्फ एक गतिविधि नहीं, बल्कि जज्बात जाहिर करने का ज़रिया था। स्कूल के दिनों में मिली तालियों ने उनके आत्मविश्वास को गढ़ा। उन्होंने कम उम्र में ही सीख लिया था कि अगर सही इस्तेमाल किया जाए, तो आवाज़ लोगों को हिला सकती है।
वे कभी पत्रकार बनना चाहती थीं। उन्हें कड़े सवाल पूछना और ज़रूरी कहानियाँ सुनाना पसंद था। लेकिन पत्रकारिता का रास्ता धुंधला और अनिश्चित लगा। पिता की सलाह पर वे न्याय व्यवस्था की ओर मुड़ीं क्योंकि यह पेशा सम्मान और स्थिरता की गारंटी देता था। उन्होंने पिता की बात मानी, लेकिन अपने आदर्शों को नहीं छोड़ा। वे अपनी इसी सोच को वकालत की पढ़ाई में ले आईं।
उन्होंने कानून की पढ़ाई पूरी गंभीरता से की। उस्मानिया यूनिवर्सिटी से क्रिमिनोलॉजी (अपराध शास्त्र) में एलएलएम किया। उनके लिए आपराधिक न्याय सिर्फ सिलेबस नहीं था। वे सोचती थीं कि कुछ खास समुदायों को ही ज़्यादा क्यों भुगतना पड़ता है? कुछ के लिए न्याय धीमा और कुछ के लिए तेज़ क्यों होता है? क्रिमिनोलॉजी उनका पसंदीदा विषय बना क्योंकि इसने उन्हें सिर्फ कानून नहीं, बल्कि व्यवस्थाओं को पढ़ने का मौका दिया।
दिलचस्प बात यह है कि वकालत के तीसरे साल तक उनके पास खुद का मोबाइल फोन भी नहीं था। स्क्रीन की दुनिया में डूबी इस पीढ़ी के बीच वे बिना फोन के कानून पढ़ रही थीं। शायद इसी दूरी ने उन्हें चीज़ों को बेहतर समझने की स्पष्टता दी। अपनी मास्टर डिग्री के दौरान उन्होंने डेटा प्राइवेसी और साइबर कानून में गहरी रुचि दिखाई। वे सवाल करने लगीं कि बड़ी कंपनियाँ लोगों का निजी डेटा कैसे जुटाती हैं और एआई (AI) और डीपफेक सच्चाई के लिए कितना बड़ा खतरा हैं।

तुबा मानती हैं कि डेटा सिर्फ जानकारी नहीं है, बल्कि यह आपकी पहचान है। वे अक्सर कहती हैं कि तकनीक कुदरत की तरह है जो सरहदों को नहीं मानती, लेकिन कानून सीमाओं में कैद रहते हैं। उनके अनुसार भारत को डेटा सुरक्षा के लिए और भी सख्त और लोगों पर केंद्रित कानूनों की ज़रूरत है।
लेकिन तुबा सिर्फ किताबों तक सीमित नहीं रहीं। सीएए विरोधी प्रदर्शनों के दौरान उनकी सक्रियता को एक नई लय मिली। स्कूल के स्टेज पर फिल्मी गाने गाने वाली वह लड़की अब भीड़ के सामने फैज़ अहमद फैज़ की "हम देखेंगे" और हबीब जालिब का "दस्तूर" गा रही थी। कलाकार से क्रांतिकारी बनने का यह सफर बहुत स्वाभाविक था। वे कहती हैं, "जब मैं स्टेज पर होती हूँ, तो मैं एक कलाकार होती हूँ, लेकिन मेरी कला में ज़मीर का होना ज़रूरी है।"
बेंगलुरु के कॉर्पोरेट जगत में काम करते हुए उन्होंने कंपनियों के कामकाज को समझा। नौकरी अच्छी थी और पैसा भी सुरक्षित था। कई लोगों के लिए यही मंज़िल होती, लेकिन उनके लिए यह सिर्फ सीखने का एक पड़ाव था। उन्होंने देखा कि कंपनियाँ डेटा को अपनी संपत्ति मानती हैं, लेकिन उस डेटा के पीछे के इंसान को भूल जाती हैं।
कॉर्पोरेट जीवन ने उन्हें अपनी पहचान को लेकर एक नया आत्मविश्वास भी दिया। एक मुस्लिम महिला के तौर पर, जो हिजाब पहनती है और समय पर नमाज़ पढ़ती है, उन्होंने खुद को दूसरों के सांचे में ढालने से इनकार कर दिया। शुरुआत में कोर्ट में उन्हें लगा कि लोग उन्हें शक की निगाह से देखते हैं। उन्हें लगता था कि हिजाब वाली महिला क्या बहस करेगी। लेकिन तुबा ने जल्द ही साबित कर दिया कि तथ्यों और दलीलों का कोई ड्रेस कोड नहीं होता। कानून और तर्क की उनकी आवाज़ के सामने सारी धारणाएं टूट गईं।

उनका मानना है कि पेशेवर जगहों पर मुस्लिम महिलाओं का दिखना ज़रूरी है। यह सिर्फ प्रतीकात्मक नहीं है, बल्कि इसे सामान्य बनाना ज़रूरी है।
जल्द ही उन्हें महसूस हुआ कि कॉर्पोरेट की आरामदायक ज़िंदगी उनके लिए नहीं है। उन्होंने नौकरी छोड़ दी और 'एसोसिएशन फॉर प्रोटेक्शन ऑफ सिविल राइट्स' (APCR) से जुड़ गईं। स्थिरता को छोड़ना आसान नहीं था, लेकिन उन्होंने अपने मकसद को चुना।
उनका मुख्य एजेंडा हमेशा से अधिकार रहा है, खासकर महिलाओं और अल्पसंख्यकों के लिए। उनकी एक खास पहल 'SOZ' प्रोग्राम है, जो घरेलू हिंसा की शिकार महिलाओं की मदद करता है। वे बेंगलुरु में महिलाओं को कानूनी रूप से जागरूक करने का अभियान चला रही हैं। वे मानती हैं कि महिलाओं को निजी तौर पर दुख सहने के बजाय अपने अधिकारों के लिए बाहर आना चाहिए।
महामारी के बाद वे 'मुस्लिम वीमेन स्टडी सर्कल' से जुड़ीं। यहाँ से 'मस्जिद प्रोजेक्ट' का विचार निकला। उनका मानना है कि मस्जिदों को सिर्फ इबादत की जगह नहीं, बल्कि कम्युनिटी सेंटर के तौर पर काम करना चाहिए, जहाँ महिलाओं के लिए भी जगह हो।

तुबा भविष्य में राजनीति में आने की इच्छा भी रखती हैं। वे सत्ता के लिए नहीं, बल्कि सुधार के लिए राजनीति करना चाहती हैं। उनका मानना है कि नेतृत्व ज़मीनी हकीकत से निकलना चाहिए। पॉडकास्ट और अन्य मंचों पर वे अक्सर युवाओं को ज़िम्मेदारी के साथ जीने का संदेश देती हैं।
27 की उम्र में एडवोकेट तुबा सनोबर अब तालियों के पीछे नहीं भाग रही हैं। वे बदलाव के पीछे भाग रही हैं। मध्य प्रदेश के एक छोटे शहर से बेंगलुरु तक के सफर में वे अपने माता-पिता के संघर्ष और अपने विश्वास की ताकत लेकर आई हैं। वे अब मनोरंजन के लिए नहीं, बल्कि समाज को जगाने के लिए गाती हैं।
वे अपनी पहचान को ढाल की तरह नहीं, बल्कि एक बयान (Statement) की तरह पहनती हैं।उनकी कहानी सिखाती है कि युवा होना हिचकिचाहट का बहाना नहीं है, बल्कि यह बदलाव लाने का एक अवसर है।