सैर सपाटे की दुनिया का बदलता चेहरा

Story by  हरजिंदर साहनी | Published by  [email protected] | Date 22-06-2026
The Changing Face of the World of Travel and Tourism
The Changing Face of the World of Travel and Tourism

 

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पिछले कुछ दशक में सबसे तेजी से बढ़ता हुआ कारोबार है पर्यटन का। सैर-सपाटे और दुनिया देखने की चाह हर जगह काफी तेजी से बढ़ रही है जिससे तकरीबन हर जगह ही इस व्यवसाय की व्यवस्थाएं बनने लगी हैं। सभी तरह के लोग दुनिया भर में सभी जगह घूम रहे हैं।लेकिन इस कारोबार के भीतर सबसे सबसे बड़ा रूझान इस समय क्या है?

‘डाटा इंटेलो‘ की रिपोर्ट को अगर मानें तो इस कारोबार में सबसे तेजी से जो चीज बढ़ रही है उसे कहा जाता है- हलाल टूरिज़्म। यानी दुनिया की सैर करने वाले मुसलमानों के लिए उनकी आस्थाओं के अनुकूल इंतजाम करने का कारोबार।
यह रिपोर्ट बताती है कि साल 2025 से 2034 के बीच यह कारोबार 9.1 फीसदी की दर से बढ़ सकता है। पिछले साल यह कारोबार 338 अरब डाॅलर का था जो 2034 में बढ़कर 742 अरब डाॅलर हो जाने का अनुमान है।

यह रिपोर्ट एक और दिलचस्प तथ्य बताती है। इसके अनुसार दुनिया घूमने वाला एक औसत मुसलमान सैलानी अपनी यात्रा पर 1800 से 2200 डाॅलर खर्च करता है। जबकि दुनिया के कुल सैलानियों द्वारा खर्च की जाने वाली रकम इससे कुछ कम ही है। सफर में ज्यादा खर्च करने वाले सैलानियों को यह कारोबार हमेशा ही हाथो-हाथ लेता रहा है।

ठीक यहीं पर पर्यटन कारोबार की पत्रिका टीटीजी एशिया ने जो आंकड़े दिए हैं उन पर नजर डालना भी जरूरी है। इस कारोबार में यात्रा को एराईवल से गिना जाता है। यानी कितने लोग आए। एक सैलानी अगर एक ही यात्रा के दौरान तीन अलग-अलग जगह जाता है इसे तीन एराईवल गिना जाएगा। पत्रिका का कहना है कि 2025 में दुनिया भर में मुस्लिम सैलानियों के 19.6 करोड़ एराईवल्स थे, जिनके 2030 तक बढ़कर 26.2 करोड़ एराईवल्स हो जाने का अनुमान है।

यह कारोबार किस तरह से बढ़ रहा है उसका अंदाज इस बात से ही लगाया जा सकता है कि इसे मापने के लिए बाकायदा एक ‘मास्टरकार्ड क्रीसेंट रेटिंग ग्लोबल मुस्लिम ट्रैवल इंडैक्स‘ बना दिया गया है। यह इंडैक्स सैलानियों की संख्या बदलने के साथ लगातार अपडेट होता रहता है।

यही सब वजह हैं कि अब बहुत से देश इस पर ध्यान दे रहे हैं। वे ऐसे इन्फ्रास्ट्रक्चर को तैयार कर रहे हैं जो मुस्लिम सैलानियों को भाता हो। इसमें उनकी आस्थाओं के हिसाब से खाने का इंतजाम। यह सबसे महत्वपूर्ण इसलिए है कि रिसर्च के अनुसार मुस्लिम सैलानी यात्रा के अपने कुल खर्च का 22 फीसदी से ज्यादा खाने-पीने पर ही खर्च करते हैं। उनके लिए रहने की ऐसी व्यवस्थाएं करना ताकि स्थानीय मस्जिद आसानी से उनकी पहंुच में हों।

मलेशिया, इंडोनेशिया, तुर्की, और पश्चिम एशिया के अन्य देश सैलानियों के ऐसे ठिकाने हैं जहां इस तरह के इंतजाम पहले से ही हैं और उनके लिए किसी खास कोशिश की जरूरत नहीं है। लेकिन अब दूसरे कईं देश भी इसकी खास व्यवस्था कर रहे हैं। खासकर जापान, आस्ट्रेलिया, पूर्वी और मध्य यूरोप के कईं देश।   

( लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं)

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