पुश्तैनी हुनर से संवरेगा युवाओं का भविष्य, जानें क्या है उस्ताद योजना

Story by  मलिक असगर हाशमी | Published by  [email protected] | Date 22-06-2026
Ancestral skills to shape the future of youth; find out what the 'Ustad' scheme is.
Ancestral skills to shape the future of youth; find out what the 'Ustad' scheme is.

 

मलिक असगर हाशमी

बढ़ती जनसंख्या और नौकरी के कम होते अवसरों के बीच आज के युवाओं के लिए सबसे बड़ी चुनौती एक सुरक्षित भविष्य तलाशना है। हर साल लाखों युवा डिग्री लेकर निकलते हैं लेकिन रोजगार के सीमित साधन उन्हें हताश कर देते हैं। ऐसे माहौल में सबसे बेहतर रास्ता यही है कि खुद का कुछ ऐसा कारोबार शुरू किया जाए जिससे न केवल अपना कल्याण हो बल्कि दूसरों के लिए भी रोजी-रोटी का जुगाड़ हो सके। इस तरह की सोच रखने वाले और पुश्तैनी हुनर से जुड़े युवाओं के लिए केंद्र सरकार की ‘उस्ताद’ योजना एक बेहतरीन मौका बनकर आई है।

 अगर आपके परिवार में कोई पारंपरिक कला, शिल्प या हुनर है तो यह सरकारी योजना आपके लिए किसी वरदान से कम नहीं है। इस योजना का लाभ उठाकर आप अपने पुश्तैनी धंधे को नई ऊंचाइयों पर ले जा सकते हैं और अपने कौशल को आधुनिक बाजार के हिसाब से अपग्रेड भी कर सकते हैं। यह योजना उन युवाओं के लिए रामबाण है जो शिल्पकारी, हस्तकला या बुनाई जैसे पारंपरिक कामों को एक सफल स्टार्टअप में बदलना चाहते हैं।

भारत सरकार के अल्पसंख्यक कार्य मंत्रालय ने देश की पारंपरिक कला और शिल्प की अनमोल विरासत को बचाने के लिए इस खास कार्यक्रम की शुरुआत की है। इस योजना का पूरा नाम 'अपग्रेडिंग द स्किल्स एंड ट्रेनिंग इन ट्रेडिशनल आर्ट्स/क्राफ्ट्स फॉर डेवलपमेंट' यानी उस्ताद (USTTAD) है।

इस योजना का सीधा मकसद अल्पसंख्यक समुदाय के कारीगरों और युवाओं की क्षमता को बढ़ाना है। बदलते वक्त और वैश्वीकरण के इस दौर में कई पुश्तैनी कलाएं धीरे-धीरे लुप्त हो रही हैं। नई पीढ़ी के युवा इन कामों से दूर हो रहे हैं क्योंकि उन्हें इसमें बेहतर भविष्य नहीं दिखता। सरकार इसी खाई को पाटना चाहती है। इस योजना के जरिए युवाओं को न केवल ट्रेनिंग दी जाती है बल्कि उनके हुनर को अंतरराष्ट्रीय बाजार से जोड़ने का रास्ता भी साफ किया जाता है।

उस्ताद योजना के तहत कई महत्वपूर्ण लक्ष्य तय किए गए हैं जो देश के युवा उद्यमियों के लिए बेहद मददगार हैं। इसका पहला बड़ा उद्देश्य युवाओं को ट्रेनिंग देकर कारीगरों और शिल्पकारों की क्षमता का विकास करना है। इसके साथ ही पारंपरिक शिल्पों की पहचान कर उनके डॉक्यूमेंटेशन के लिए खास स्टैंडर्ड बनाए जा रहे हैं।

सबसे बड़ी बात यह है कि इस योजना के माध्यम से पारंपरिक कौशल को ग्लोबल मार्केट से जोड़ा जा रहा है। इससे स्कूल छोड़ने वाले युवाओं और असंगठित क्षेत्र के कामगारों के लिए रोजगार पाने की संभावनाएं काफी बढ़ जाती हैं। यह योजना अल्पसंख्यक समुदायों को वैश्विक मंच पर अपने उत्पाद बेचने के मौके देती है जिससे समाज के सबसे कमजोर तबके के लिए भी सम्मानजनक आजीविका का निर्माण होता है।

इस योजना की एक और खूबसूरत बात यह है कि यह श्रम की गरिमा को सुनिश्चित करती है। पारंपरिक कला और शिल्प में नए डिजाइन और रिसर्च को बढ़ावा देने के लिए सरकार लगातार काम कर रही है। देश-विदेश में आयोजित होने वाली प्रदर्शनियों के जरिए पारंपरिक शिल्प और कला को दिखाने के लिए एक बड़ा प्लेटफॉर्म मिलता है।

gg

इसमें सिर्फ हाथ की कारीगरी ही नहीं बल्कि पारंपरिक खाना बनाने की कला यानी कुलीनरी स्किल्स को भी शामिल किया गया है। लुप्त होती कलाओं को बचाने और देश के प्रतिभावान मास्टर क्राफ्ट्समैन को एक नई पहचान दिलाना इस योजना का मुख्य एजेंडा है।

उस्ताद योजना के तहत मुख्य रूप से दो बड़े प्रोग्राम चलाए जा रहे हैं। पहला प्रोग्राम है विभिन्न संस्थानों के जरिए पारंपरिक कला या क्राफ्ट में स्किल और ट्रेनिंग का अपग्रेडेशन करना। इस काम को पूरा करने के लिए एक पूरा इंस्टीट्यूशनल फ्रेमवर्क तैयार किया गया है।

मंत्रालय इसके लिए प्रोजेक्ट इम्प्लीमेंटिंग एजेंसी यानी पीआईए (PIA) को जिम्मेदारी सौंपता है। ये एजेंसियां पारंपरिक कला और क्राफ्ट पर सर्टिफिकेट और डिप्लोमा कोर्स चलाती हैं। इन कोर्स को कौशल विकास और उद्यमिता मंत्रालय, डीसी हैंडीक्राफ्ट्स या सेक्टोरल एक्सपोर्ट प्रमोशन काउंसिल से मान्यता मिली होती है।

इस योजना के तहत ट्रेनिंग लेने के लिए कुछ जरूरी पात्रता शर्तें भी तय की गई हैं। ट्रेनिंग लेने वाला मुख्य रूप से अल्पसंख्यक समुदाय का होना चाहिए। हालांकि योजना को समावेशी बनाने के लिए 25प्रतिशत सीटें गैर-अल्पसंख्यक समुदाय के बीपीएल (गरीबी रेखा से नीचे) परिवारों के लिए भी रखी गई हैं।

इसके अलावा 3प्रतिशत सीटें अल्पसंख्यक समुदाय के दिव्यांग नागरिकों के लिए आरक्षित हैं। आवेदन करने वाले युवा की उम्र 14से 45साल के बीच होनी चाहिए। हालांकि दिव्यांग लोगों के लिए ऊपरी आयु सीमा में विशेष छूट दी गई है। इस कोर्स में शामिल होने के लिए न्यूनतम शैक्षणिक योग्यता सिर्फ पांचवीं पास रखी गई है और दिव्यांगों के लिए इसमें भी ढील दी गई है। अगर किसी परिवार में एक से अधिक सदस्य इन शर्तों को पूरा करते हैं तो उन्हें भी इस योजना का लाभ मिल सकता है।

योजना के तहत चलने वाले कोर्स की अवधि कम से कम दो महीने और अधिकतम एक साल की होती है। इसका पूरा करिकुलम और समय सीमा सरकारी विभागों के तय मॉड्यूल के अनुसार होती है। खास बात यह है कि इसमें सिर्फ पारंपरिक काम ही नहीं सिखाया जाता बल्कि आज के दौर के हिसाब से आईटी, सॉफ्ट स्किल्स और स्पोकन इंग्लिश की ट्रेनिंग भी दी जाती है। युवाओं को रोजाना कम से कम पांच घंटे की ट्रेनिंग दी जाती है। यह पूरी तरह से केंद्र सरकार द्वारा वित्त पोषित योजना है जिसका पूरा खर्च सरकार उठाती है।

योजना का दूसरा अहम हिस्सा है रिसर्च और डेवलपमेंट के लिए मिलने वाला उस्ताद अप्रेंटिसशिप स्टाइपेंड। इसके तहत पारंपरिक कला और क्राफ्ट के क्षेत्र में रिसर्च करने, नए प्रोडक्ट और डिजाइन तैयार करने तथा नई टेक्नोलॉजी के विकास के लिए सालाना स्टाइपेंड दिया जाता है। इसका सीधा फायदा मास्टर क्राफ्ट्समैन और युवा शोधकर्ताओं को मिलता है ताकि वे बाजार की मांग के अनुसार नए प्रयोग कर सकें।

इस पूरी योजना को जमीन पर उतारने में 'हुनर हाट' और 'शिल्प उत्सव' की सबसे बड़ी भूमिका है। अल्पसंख्यक कारीगरों और शिल्पकारों को उनके उत्पादों की मार्केटिंग में मदद करने के लिए देश के अलग-अलग शहरों में हुनर हाट का आयोजन किया जाता हैI

इसके आयोजन की जिम्मेदारी नेशनल माइनॉरिटीज डेवलपमेंट एंड फाइनेंस कॉर्पोरेशन (NMDFC), राज्य स्तरीय एजेंसियों, राज्य हस्तशिल्प निगमों और केंद्रीय हस्तशिल्प परिषदों को दी गई है। अल्पसंख्यक कार्य मंत्रालय इसके लिए शत-प्रतिशत फंड मुहैया कराता है।

इन प्रदर्शनियों में 50से 100स्टॉल लगाए जाते हैं और यह आयोजन एक से तीन सप्ताह तक चलता है। हुनर हाट अब देश का एक बड़ा ब्रैंड बन चुका है जिसने लाखों कारीगरों को सीधे रोजगार और नए खरीदार दिए हैं। डिजिटल इंडिया को बढ़ावा देते हुए अब हुनर हाट को ऑनलाइन प्लेटफॉर्म पर भी लाया जा चुका है जिससे कारीगर अपने सामान को सीधे वेबसाइट के जरिए बेच सकते हैं।

बेहतरीन काम करने वाले कारीगरों का हौसला बढ़ाने के लिए सरकार ने साल 2017में 'उस्ताद सम्मान' पुरस्कार की शुरुआत की थी। यह पुरस्कार उन शिल्पकारों को दिया जाता है जो अपनी कला में बेहतरीन कौशल और योगदान दिखाते हैं।

हर साल देश के दस बेहतरीन शिल्पकारों को इस पुरस्कार के लिए चुना जाता है। इस पुरस्कार के तहत विजेता को 1,00,000 रुपये का नकद इनाम, तांबे की पट्टिका और अंगवस्त्रम देकर सम्मानित किया जाता है। इसके लिए आवेदक की उम्र 30 साल से अधिक और शिल्प के क्षेत्र में कम से कम दस साल का अनुभव होना जरूरी है। केंद्रीय स्तर की चयन समिति आवेदकों के सैंपल्स और उनके काम के आधार पर विजेताओं का चुनाव करती है। इसमें लुप्त हो रहे शिल्पों को विशेष प्राथमिकता दी जाती है।

अगर आप भी इस योजना का लाभ उठाना चाहते हैं तो इसकी आवेदन प्रक्रिया बेहद सरल है। अल्पसंख्यक मंत्रालय समय-समय पर प्रमुख अखबारों और अपने ऑफिशियल डिजिटल पोर्टल पर विज्ञापन जारी करके प्रस्ताव आमंत्रित करता है।

तय मानदंडों के आधार पर आवेदनों की जांच की जाती है और योग्य उम्मीदवारों या संस्थाओं को मंजूरी दी जाती है। स्वरोजगार को बढ़ावा देने के लिए ट्रेनिंग पूरी होने के बाद युवाओं को विभिन्न बैंकों और वित्तीय संस्थानों के माध्यम से माइक्रोफाइनेंस या आसान लोन की सुविधा भी दी जाती है ताकि वे अपना खुद का स्टार्टअप बिना किसी आर्थिक तंगी के शुरू कर सकें। पुश्तैनी हुनर को आधुनिक बाजार से जोड़कर आत्मनिर्भर बनने का यह एक बेहतरीन और सुनहरा मौका है।