मलिक असगर हाशमी
अमेरिका, इजरायल और ईरान के बीच पूरे 111 दिनों तक चले भीषण संघर्ष के बाद आखिरकार एक समझौता हो गया है। इस समय पूरी दुनिया में इस समझौते के नफे नुकसान की समीक्षा की जा रही है। हर कोई यह समझने की कोशिश कर रहा है कि इस लंबे और विनाशकारी युद्ध से किसको क्या मिला। इसी बीच ईरान के मौजूदा सुप्रीम लीडर मुज्तबा अली खामेनेई ने अपने राष्ट्र के नाम एक विशेष संदेश जारी किया है।
इस संदेश को डिकोड करने और इसके गहरे अर्थ निकालने में दुनिया भर के बड़े रणनीतिकार जुट गए हैं। पहली दृष्टि में मुज्तबा खामेनेई के इस संदेश से जो सबसे बड़ा निहितार्थ निकलता है, वह यह है कि उनके लिए उनका देश और देश के लोग सबसे ऊपर हैं। उन्होंने अपने आधिकारिक संदेश में लिखा है कि इस क्षण से हम यानी आप, गौरवशाली राष्ट्र और यह विनम्र सेवक, उक्त शर्तों के पूरा होने की प्रतीक्षा करेंगे।
मुज्तबा खामेनेई के इस पत्र से यह साफ झलकता है कि उनके शासन का मूल आधार राष्ट्रवाद ही है। राष्ट्र के प्रति ऐसा समर्पण केवल ईरान में ही नहीं बल्कि दुनिया के अन्य कोनों में भी चर्चा का विषय बना हुआ है।
पतंजलि के सर्वेसर्वा बाबा रामदेव भी अपने एक हालिया पॉडकास्ट में ईरान और वहां के नागरिकों की तारीफ कर चुके हैं। उन्होंने ईरानियों के अपने देश के प्रति जुनून की हद तक प्रेम करने का विशेष जिक्र किया है। सच तो यह है कि हमें या दुनिया के किसी भी मुल्क को ईरान से यह सीखना चाहिए कि विपरीत परिस्थितियों में अपने देश से कैसे अटूट और अगाध प्रेम किया जाता है।
संकट में एकजुटता का असली महत्व
जब हमारे अपने देशों में छोटी सी मुसीबत आती है तो हम विचलित हो जाते हैं। अमेरिका और ईरान के बीच जब युद्ध चल रहा था, तब दुनिया भर में कुकिंग गैस और पेट्रोल का संकट महसूस किया गया था।
उस समय कई देशों के लोग परेशान हो उठे थे। लोग बिना सोचे समझे और बिना पूरी असलियत जाने सड़कों पर उतर आए थे। विपक्षी दलों के सियासी बहकावे में आकर लोगों ने सोशल मीडिया पर तरह तरह के बयान लिखने शुरू कर दिए थे। दुख की बात यह है कि संकट के समय कई देश अंदरूनी तौर पर एकजुट भी नहीं रह सके। ऐसे समाजों को ईरान के नागरिकों से बहुत कुछ सीखने की जरूरत है।
अमेरिका ने जब ईरान पर हमला किया था, तो उसकी नीयत बहुत अलग थी। अमेरिकी रणनीतिकारों का मानना था कि ईरान के बड़े नेताओं और शीर्ष सैन्य अधिकारियों के मारे जाने के बाद वहां की जनता विद्रोह कर देगी। उन्हें लगा था कि लोग बुनियादी सुविधाओं की कमी के कारण सड़कों पर सरकार के खिलाफ उतर आएंगे।
मगर ईरान के लोगों ने घरेलू राजनीति की जगह राष्ट्रवाद को चुना। वे इस भीषण मुसीबत में भी थोड़े से भी विचलित नहीं हुए। ईरानी नागरिक तब भी अडिग रहे जब वे लंबे समय तक तमाम तरह की आर्थिक बंदिशें झेल रहे थे। आर्थिक प्रतिबंधों के कारण ईरानी मुद्रा डॉलर के मुकाबले बिल्कुल जमींदोज हो चुकी थी। इसके बावजूद वहां की जनता अपने देश के नेतृत्व के साथ मजबूती से खड़ी रही।
युद्ध के मैदान से राष्ट्रवाद के जीवंत उदाहरण
इस भीषण जंग के दौरान इजरायल और अमेरिका ने ईरान पर भारी बमबारी की थी। हजारों टन बारूद ईरान की धरती पर उंडेल दिया गया था। इसके बावजूद वहां के लोगों के हौसले नहीं डिगे। एक बेहद दर्दनाक घटना में अमेरिका ने एक स्कूल पर बम गिराकर वहां पढ़ रही डेढ़ सौ से अधिक बच्चियों को मार डाला था।
इस भयानक त्रासदी के बाद भी ईरानियों ने सड़कों पर केवल खोखला गुस्सा दिखाने की बजाय अपना कूटनीतिक दमखम दिखाया। जब ईरानी अधिकारी समझौता वार्ता के लिए इस्लामाबाद गए, तो वे बमबारी में मारी गई उन मासूम बच्चियों को नहीं भूले।
वे अपनी साफ़्ट डिप्लोमेसी के तहत उन बच्चियों के स्कूल बैग को निशानी और सिंबल के तौर पर हवाई जहाज में अपने साथ ले गए। इसके अलावा ईरानी फुटबॉल टीम ने भी फीफा के मंच पर उन बच्चों को याद रखकर दुनिया को एक बड़ा संदेश दिया। इसे ही असल मायने में किसी देश की साफ़्ट डिप्लोमेसी कहा जाता है।
रणनीतिक तौर पर यह भी एक बहुत बड़ी सीखने वाली बात है कि इतनी भारी बमबारी और तबाही के बीच भी ईरान के स्कूलों में पढ़ाई जारी रही। देश का जीवन थमा नहीं। युद्ध के मैदान से ऐसी तस्वीरें भी आईं जहां ईरानी सैनिक दुश्मन पर मिसाइलें दागते हुए शांति से कॉफी पी रहे थे और सोशल मीडिया के लिए रील बना रहे थे।
यह दिखाता है कि संकट के चरम पर भी उनका मनोबल कितना ऊंचा था। हद तो तब हो गई जब एक अमेरिकी लड़ाकू विमान ईरान की सीमा में क्रैश हो गया। उस क्रैश हुए विमान के सवार सैनिक को बचाने के लिए जब दुश्मन देश के हथियारबंद सैनिक ईरान के रिहायशी इलाके में घुसे, तब वहां के आम और निहत्थे लोग उनसे सीधे भिड़ गए। यह बिना हथियारों के लड़ा जाने वाला वह राष्ट्रवाद है जो केवल देश प्रेम से पैदा होता है।

नेताओं का आचरण और जनता का भरोसा
इस पूरे संकट के दौरान ईरान के शीर्ष नेताओं का आचरण भी देखने लायक था। युद्ध के कठिन दिनों में ईरान के विदेश मंत्री पेजिशकियान आम आदमी की तरह साधारण होटलों में खाना खाते हुए दिखे। वे एक डॉक्टर के रूप में अस्पताल में मरीजों की सर्जरी करते हुए वीडियो में नजर आए।
दुनिया में ऐसा बहुत कम देखने को मिलता है कि जब देश पर बमबारी हो रही हो, तब सरकार के बड़े नुमाइंदे जमीन पर आम लोगों के बीच इस तरह सक्रिय हों। यही कारण है कि जब देश को बचाने की बात आई, तो लाखों लोग निहत्थे ही सड़कों पर एकजुटता दिखाने के लिए उतर आए।
ईरान के सुप्रीम लीडर मुज्तबा खामेनेई इसी अटूट भरोसे के दम पर अपने देशवासियों को संबोधित करते हुए कहते हैं कि यह पूरी तरह स्पष्ट है कि भविष्य में होने वाली आमने सामने की बातचीत का अर्थ दुश्मन के रुख को स्वीकार करना नहीं होगा।
हमें पूरी उम्मीद है कि हमारे इमाम की शुभ प्रार्थनाएँ ईरान के सम्मानित राष्ट्र के लिए हर तरह की जीत और सफलताएँ लेकर आएँगी। इतने बड़े और गहरे भरोसे के साथ देश का वही नेता लिख सकता है, जो यह अच्छी तरह जानता है कि मुसीबत की हर घड़ी में उसके देश की जनता उसके साथ खड़ी रहेगी।
"The respect that nations hold for Iran today is due to its true independence. This independence is rooted in a culture that learned from Imam Hussain to never surrender, and from Imam Mahdi to always remain hopeful." pic.twitter.com/9nUviG7mMS
— 🟩 ☫ 🟥رح (@dokhtare_zahra) June 19, 2026
क्षेत्रीय संतुलन और इजरायल का संकट
इस युद्ध के दौरान एक और दिलचस्प पहलू देखने को मिला। जब ईरान जवाबी कार्रवाई करते हुए यूएई, कतर, बहरीन और सऊदी अरब में स्थित अमेरिकी सैन्य ठिकानों पर मिसाइलें और ड्रोन दाग रहा था, तब उन देशों की सरकारों ने अपने नागरिकों को घरों में ही सीमित रहने का सख्त संदेश दिया था।
दूसरी तरफ इजरायल में स्थिति यह थी कि ईरान की भारी बमबारी के समय वहां के आम लोग बंकरों में दुबके हुए थे। ईरान के इस मिसाइल और ड्रोन हमले से इजरायल को बहुत भारी नुकसान पहुंचा है।
अब जो अमेरिका और ईरान के बीच समझौता हुआ है, उससे भी इजरायल को रणनीतिक तौर पर हानि ही पहुंची है। इस समझौते के बाद इजरायल के भीतर ही वहां की मौजूदा नेतन्याहू सरकार के खिलाफ बहुत बड़ा विरोध शुरू हो गया है।
इजरायल के बड़े सैन्य विशेषज्ञ साफ मान रहे हैं कि इस समझौते से उन्हें बहुत बड़ा सैन्य और रणनीतिक नुकसान उठाना पड़ेगा। यहां तक कि राजनीतिक गलियारों में यह कयास भी लगाया जा रहा है कि बेंजामिन नेतन्याहू की आने वाले चुनाव में सत्ता पूरी तरह खतरे में पड़ सकती है। इजरायल के लोग इस समय यह नहीं समझ पा रहे हैं कि मुसीबत की इस घड़ी में एक दूसरे पर तोहमत मढ़ने की जगह राष्ट्रीय एकजुटता दिखाने की जरूरत होती है, जैसी एकजुटता ईरान ने दिखाई है।
समझौते के पीछे की कूटनीति और भविष्य
ईरान के सुप्रीम लीडर मुज्तबा खामेनेई ने तमाम तरह की मुसीबतें झेलने के बाद भी अपने देश को बहुत ही संतुलित संदेश दिया है। उन्होंने अपने पत्र में स्पष्ट किया है कि जैसा कि आपको सूचित किया गया है, ईरान और अमेरिका के राष्ट्रपतियों के बीच एक समझौता ज्ञापन पर हस्ताक्षर किए गए हैं।
इस चरण तक पहुँचने की पूरी प्रक्रिया में जिम्मेदार अधिकारियों ने सच्ची चिंता और सद्भावना के साथ बहुत व्यापक प्रयास किए हैं। उन्होंने यह भी जोड़ा कि निश्चित रूप से अमेरिकी राष्ट्रपति ने ही हताशा में आकर इस समझौते को अंजाम देने के लिए हर तरह के दबाव और साधनों का इस्तेमाल किया था।
मुज्तबा खामेनेई ने यह स्वीकार करने में भी संकोच नहीं किया कि सिद्धांत रूप में उनकी खुद की राय इस समझौते को लेकर थोड़ी अलग थी। इसके बावजूद सर्वोच्च राष्ट्रीय सुरक्षा परिषद के प्रमुख के तौर पर देश के सम्मानित राष्ट्रपति ने ईरानी राष्ट्र और रेजिस्टेंस फ्रंट यानी प्रतिरोध मोर्चे के अधिकारों की रक्षा के संबंध में जो वचन दिया था, उसे देखते हुए उन्होंने अपनी अनुमति दे दी।
राष्ट्रपति ने स्पष्ट रूप से जिम्मेदारी ली थी कि यदि अमेरिकी पक्ष भविष्य में अत्यधिक और नाजायज मांगें रखता है, तो ईरान उनके आगे कभी नहीं झुकेगा। अपने देश की जनता के सामने इतनी पारदर्शिता और हिम्मत के साथ संदेश देने के लिए एक बहुत बड़े नेतृत्व और अदम्य साहस की आवश्यकता होती है। यही इस पूरे 111 दिनों के संघर्ष का सबसे बड़ा राजनीतिक और सामाजिक निचोड़ है।
( लेखक आवाज द वाॅया हिंदी के संपादक हैं)