ग्लोबल वार्मिंग और हमारी तीर्थ यात्राएं

Story by  हरजिंदर साहनी | Published by  [email protected] | Date 01-06-2026
Global Warming and Our Pilgrimages
Global Warming and Our Pilgrimages

 

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हरजिंदर

तेरह साल पहले का वह समय याद कीजिए जब उत्तराखंड के केदारनाथ में खराब मौसम के कारण बादल फटा था और उन हजारों लोगों की जान चली गई थी जो तीर्थयात्रा करने के लिए वहां पहंुचे थे। कभी न भूली जाने वाली इस त्रासदी को दोष तब मौसम के बदलाव और ग्लोबल वार्मिंग के मत्थे मढ़ा गया था।

केदारनाथ चार धाम की यात्रा का एक पड़ाव है और ग्लोबल वार्मिंग जारी इसलिए हर बार जब यात्रा का समय आता है तो यह खतरा मंडराता रहता है।लेकिन  ग्लोबल वार्मिंग के ये खतरे सिर्फ हिमालय के पहाड़ों पर ही नहीं मंडरा रहे। दुनिया का तकरीबन हर कोना किसी न किसी तरह इससे जूझ रहा है।

मसलन हम मक्का को ही ले लें जो इस्लाम का सबसे पवित्र तीर्थ है। हर साल लाखों की संख्या में लोग वहां जाते हैं। हिमालय के पहाड़ों को कच्चा कहा जा सकता है और वहां मौसम की वजह से भौगोलिक बदलाव कोई नई बात नहीं है। लेकिन सउदी अरब जहां मक्का स्थित है उसके बारे में ऐसे बात नहीं कही जा सकती। वहां का ज्यादातर हिस्सा रेगिस्तानी है और उसमें मौसम की वजह से किसी बड़े भौगोलिक बदलाव की आशंका ज्यादा नहीं है।

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लेकिन फिर भी हज यात्रा ग्लोबल वार्मिंग के खतरों से जूझ रही है। याद कीजिए 2024 को जब मई महीने में हज के दौरान लोगों को भीषण गर्मी का सामना करना पड़ा था। कईं लोगों की जान भी गई थी।यह भी सच है कि सउदी अरब के लिए मई का महीना उतना गरम नहीं होता। वहां भीषण गर्मी का समय होता है जून से अगस्त तक। तब वहां तापमान 50 डिग्री सेल्शियस को छूने लगता है।

इस बार मई में फिर से तेज गर्मी हुई तो कहा जाने लगा कि यह देश भी ग्लोबल वार्मिंग से की पकड़ में पूरी तरह आ चुका है। यह जरूर है कि इस बार तैयारियां पूरी थीं इसलिए किसी हादसे की खबर नहीं आई।
वैज्ञानिकों का कहना है कि फाॅसिल्स फ्यूल के बढ़ते इस्तेमाल से जिस तरह से वातावरण में कार्बन की मात्रा बढ़ रही है उसके बाद तो यह होना ही है। साल में कुछ महीने ऐसे होते हैं जब मक्का में इस कदर गर्मी नहीं पड़ती और कुछ लोग इसी सीज़न में हज के लिए वहां जाना पसंद करते हैं।

वैज्ञानिक अब यह मानने लगे हैं कि वातावरण में अगर कार्बन इसी तरह बढ़ता रहा तो गर्मी के मामले में कोई भी महीना सुरक्षित नहीं रहेगा। सउदी सरकार हज के इंतजाम के लिए काफी संसाधन खर्च करती है इसलिए वह उम्मीद की जाती है कि वह हज यात्रियों को गर्मी से सुरक्षा देने में कोई कोर कसर नहीं छोड़ेगी।

लेकिन क्या ही अच्छा होता कि हम ग्लोबल वार्मिंग को कम करने की कोशिश करते जिससे हज ही नहीं दुनिया की सारी तीर्थ यात्राएं सुरक्षित हो जातीं।वैसे यहां यह जिक्र भी जरूरी है कि जो फासिल्स फ्यूल इस सब का दोषी है उसका सबसे बड़ा निर्यातक सउदी अरब ही है।

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यह बात अलग है कि वातावरण में जिस तरह से कार्बन की मात्रा बढ़ रही है उसमे इस देश को बहुत ज्यादा दोष नहीं दिया जा सकता। वैसे भी यह किसी एक देश का मामला नहीं है, ग्लोबल वार्मिंग के लिए दुनिया के सभी देशों को प्रयास करना होगा। फिलहाल तो यह कोशिश कोई नहीं कर रहा।

( लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं)

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