मधुकर पांडेय | लखनऊ
नवाबों की नगरी लखनऊ में मुहर्रम का चांद नजर आते ही अकीदत, सम्मान और पुरानी रवायतों का रंग गहराने लगता है। लखनऊ का यह ऐतिहासिक मुहर्रम और यहां निकलने वाले शाही जुलूस सिर्फ एक मजहबी आयोजन नहीं हैं। यह यहां की साझी संस्कृति, गंगा जमुनी तहज़ीब, नवाबी विरासत और कर्बला के पैगाम को जिंदा रखने वाली एक सदियों पुरानी परंपरा है। हर साल लाखों लोग मजहब की दीवारों को भूलकर इन जुलूसों में शामिल होते हैं। वे हज़रत इमाम हुसैन की महान कुर्बानी, उनके इंसाफ, धैर्य और इंसानियत के संदेश को याद करते हैं।
लखनऊ के पुराने शहर के इलाकों जैसे बड़ा इमामबाड़ा, छोटा इमामबाड़ा और तालकटोरा कर्बला में इन दिनों अकीदत का एक अनोखा समंदर दिखाई देता है। मुहर्रम की पहली तारीख को ऐतिहासिक बड़े इमामबाड़े से पहला शाही जुलूस निकाला जाता है। इस जुलूस में शामिल होने के लिए देश-विदेश से लोग आते हैं।
ऊंट, हाथी, घोड़ों और पारंपरिक बैंड की मातमी धुनों के बीच जब यह जुलूस रात के सन्नाटे में आगे बढ़ता है, तो चारों तरफ 'या हुसैन' और 'लब्बैक या हुसैन' की सदाएं गूंजने लगती हैं। यह मंजर हर किसी की आंखें नम कर देता है।

हज़रत इमाम हुसैन और कर्बला के 72 शहीदों की याद में निकलने वाले इस ऐतिहासिक शाही जुलूस का नाता सीधा नवाबों के दौर से है। इतिहास के जानकार बताते हैं कि लखनऊ में मुहर्रम की यह भव्य रवायत अठारहवीं शताब्दी के अंत में शुरू हुई थी।
यह अवध के शिया नवाबों की एक ऐसी अनमोल विरासत है, जिन्होंने इसे एक राज्यस्तरीय परंपरा का रूप दिया। नवाब आसिफ उद दौला को लखनऊ को शिया संस्कृति और अज़ादारी का मुख्य केंद्र बनाने के लिए जाना जाता है।
उन्होंने साल 1784 में आलीशान बड़ा इमामबाड़ा बनवाया था। यही इमामबाड़ा आगे चलकर मुहर्रम की मजलिसों और जुलूसों का सबसे मुख्य गढ़ बना। जब नवाब ने अपनी राजधानी को फैजाबाद से लखनऊ बदला, तो अज़ादारी को एक नई पहचान मिली। खास बात यह थी कि नवाब खुद भी इन मातमों और मजलिसों में बहुत सादगी के साथ शामिल होते थे।
अवध के नवाब सराजुद्दौला की बहू बहू बेगम ने लगभग साढे तीन सौ साल पहले लखनऊ में ताजिया बनाने और उसे घरों में रखने की अनूठी रवायत की शुरुआत की थी। वे किसी वजह से इराक के कर्बला नहीं जा सकी थीं।
इसी वजह से उन्होंने अपने घरेलू स्तर पर ही इमाम हुसैन की याद में ताजिया रखने की परंपरा शुरू की। इसके बाद नवाब मुहम्मद अली शाह के शासनकाल में इस आयोजन को और अधिक शाही और भव्य रूप मिला। उन्होंने हुसैनाबाद ट्रस्ट की स्थापना की। यह ट्रस्ट आज भी मुहर्रम की तमाम पुरानी परंपराओं और शाही जरीह के जुलूसों का पूरा इंतजाम बहुत जिम्मेदारी से संभालता है। आज हम जुलूसों में जो बैंड बाजे, हाथी और शाही ठाट-बाट देखते हैं, वह इसी दौर की देन है।
भारत में वैसे तो अज़ादारी की शुरुआत मुगल काल या उससे भी पहले तैमूर लंग के समय से मानी जाती है। लेकिन लखनऊ में इसका जो विस्तृत, सांस्कृतिक और साझी संस्कृति वाला रूप हमें देखने को मिलता है, उसकी नींव नवाबों के शासनकाल में ही मजबूत हुई थी।

नवाबों के शिया होने के बावजूद इस गम में शहर के शिया, सुन्नी और हिंदू समाज के लोग बराबर शामिल होते आए हैं। लखनऊ का मुहर्रम आज भी पूरे 68 दिनों तक चलता है। यह अनोखी रवायत 29 जिल्हिज्जा से शुरू होकर 8 रबी उल अव्वल तक चलती है। इतने लंबे समय तक चलने वाला मुहर्रम पूरी दुनिया में सिर्फ लखनऊ में ही देखा जाता है। इस पूरे दौर में शहर के तमाम छोटे-बड़े इमामबाड़ों, मस्जिदों और घरों में मजलिसों का दौर चलता रहता है।
इन मजलिसों के दौरान कर्बला के शहीदों की याद में दर्दभरे मरसिए, नौहे और सोज़ख्वानी पढ़ी जाती है। महिलाएं भी अपने घरों में ज़नानी मजलिसों का आयोजन करती हैं और इमाम के गम को याद करती हैं। मुहर्रम की छठी तारीख को बड़े इमामबाड़े में होने वाले 'आग के मातम' को देखने और उसमें हिस्सा लेने के लिए लाखों की भीड़ उमड़ती है।

दहकते हुए अंगारों पर मातम करना आस्था की एक बड़ी मिसाल है। इसके साथ ही कारीगरों द्वारा बांस और रंगीन कागजों से बेहद खूबसूरत ताजिए बनाए जाते हैं। इन ताज़ियों को लोग अपने घरों के अज़ाखानों में सजाते हैं। मुहर्रम के आखिरी दिनों में इन ताज़ियों को बहुत ही गमगीन माहौल में कर्बला ले जाकर दफन या विसर्जित किया जाता है। लखनऊ का मुहर्रम आज भी अपनी उसी पुरानी सादगी, तहजीब और नवाबी गरिमा को समेटे हुए आगे बढ़ रहा है।