सड़कों पर नमाज़ से बचना शरीअत के अनुरूप

Story by  आवाज़ द वॉयस | Published by  [email protected] | Date 28-05-2026
Refraining from offering Namaz on roads is in accordance with Sharia.
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डॉ. रेहान अख्तर

भारत अपनी सांस्कृतिक विविधता, धार्मिक बहुलता और साझा सामाजिक परंपराओं के कारण विश्व के प्रमुख देशों में गिना जाता है। यहाँ विभिन्न धर्मों, भाषाओं, संस्कृतियों और सभ्यताओं के मानने वाले लोग सदियों से एक साथ रहते आए हैं। इसी साझा वातावरण में भारतीय मुसलमानों ने भी हमेशा अपनी धार्मिक पहचान, इस्लामी मूल्यों और धार्मिक प्रतीकों को सुरक्षित रखा तथा साथ ही देश की सामूहिक व्यवस्था, सामाजिक सौहार्द और राष्ट्रीय एकता को भी महत्व दिया है।

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भारतीय मुसलमानों का इतिहास इस बात का साक्षी है कि उन्होंने हमेशा दीन और दुनिया के बीच संतुलन, संयम और विवेक का मार्ग अपनाया है। यही कारण है कि भारत जैसे बहुधार्मिक समाज में मुसलमानों का धार्मिक जीवन केवल इबादत तक सीमित नहीं रहा, बल्कि उसमें सामाजिक उत्तरदायित्व, नैतिक चरित्र, कानून का सम्मान और मानवीय गरिमा भी स्पष्ट रूप से सम्मिलित रही है।

“नमाज़-ए-जुमा” और “नमाज़-ए-ईदैन” इस्लाम के महान धार्मिक प्रतीकों में गिनी जाती हैं। ये केवल उपासना के कर्म नहीं, बल्कि मुसलमानों के सामूहिक जीवन, आध्यात्मिक संबंध और धार्मिक एकता की पहचान हैं। जुमा का दिन मुसलमानों के लिए साप्ताहिक आध्यात्मिक सभा, धार्मिक शिक्षा और उम्मत की एकता का प्रतीक है।

इसी कारण पवित्र कुरआन में जुमा के दिन अल्लाह की याद और नमाज़ की ओर बढ़ने का आदेश दिया गया है। (सूरह अल-जुमुआ:9) कुरआन करीम सामान्य रूप से नमाज़ को बंदे और अल्लाह के बीच संबंध की मजबूत नींव, आध्यात्मिक शुद्धता का माध्यम और सफलता का मार्ग बताता है।

इसी प्रकार ईदैन के संबंध में भी कुरआन में अल्लाह की नेमतों पर शुक्र अदा करने, तकबीर कहने और सामूहिक प्रसन्नता व्यक्त करने का संकेत मिलता है। अर्थात इस्लाम में ईद केवल एक त्योहार नहीं, बल्कि आध्यात्मिक कृतज्ञता, धार्मिक चेतना, सामाजिक समानता और उम्मत की एकता का महान प्रतीक है।

हदीसों में भी “नमाज़-ए-जुमा” और “ईदैन” की विशेष महत्ता वर्णित की गई है। पैग़म्बर मुहम्मद ने जुमा के दिन को मुसलमानों के लिए सबसे श्रेष्ठ दिन बताया है। (सुनन इब्ने माजा) एक रिवायत में यह भी उल्लेख मिलता है कि जब मुसलमान जुमा के लिए मस्जिद की ओर जाते हैं तो फ़रिश्ते उनके नाम लिखते रहते हैं और खुतबा शुरू होने के बाद अपने रजिस्टर बंद कर देते हैं। (सहीह बुख़ारी) इससे स्पष्ट होता है कि जुमा केवल एक नमाज़ नहीं बल्कि एक आध्यात्मिक सम्मेलन है, जिसमें मुसलमानों की धार्मिक चेतना, सामूहिकता और अल्लाह से संबंध का नवीनीकरण होता है।

इस्लाम की यही शिक्षाएँ मुसलमानों के भीतर इबादत का उत्साह, सामूहिकता की भावना और धार्मिक प्रतीकों के प्रति गहरा प्रेम उत्पन्न करती हैं। यही कारण है कि भारत के विभिन्न शहरों, कस्बों और गाँवों में मुसलमान विशेष रूप से जुमा और ईदैन के अवसर पर बड़ी जामा मस्जिदों और केंद्रीय ईदगाहों में नमाज़ अदा करना सौभाग्य समझते हैं।

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लोग दूर-दराज़ इलाकों से बड़ी मस्जिदों का रुख़ करते हैं ताकि बड़े धार्मिक जमावड़े में सम्मिलित हो सकें, उलमा के भाषण सुन सकें, धार्मिक वातावरण से लाभ उठा सकें और उम्मत की एकता तथा भाईचारे का दृश्य अपनी आँखों से देख सकें। भारत की बड़ी जामा मस्जिदें और केंद्रीय ईदगाहें हमेशा से मुसलमानों की धार्मिक, आध्यात्मिक और सामाजिक भावनाओं का केंद्र रही हैं।

यही कारण है कि जुमा और ईदैन के अवसर पर लाखों मुसलमानों का इन स्थानों की ओर जाना एक स्वाभाविक और भावनात्मक स्थिति बन जाती है। किन्तु वर्तमान भारतीय परिस्थितियों में बढ़ती जनसंख्या, शहरों का तीव्र विस्तार, यातायात की समस्याएँ, सुरक्षा संबंधी चिंताएँ और प्रशासनिक प्रतिबंधों के कारण कुछ स्थानों पर ऐसी स्थिति उत्पन्न हो जाती है कि एक ही जामा मस्जिद या केंद्रीय ईदगाह में सभी लोगों का एकत्र होना संभव नहीं रह जाता।

कई बार मस्जिदों और ईदगाहों के आसपास अत्यधिक भीड़ हो जाती है, सार्वजनिक मार्ग प्रभावित होते हैं, यातायात अवरुद्ध हो जाता है और सामान्य नागरिकों को कठिनाइयों का सामना करना पड़ता है। रोगियों की एम्बुलेंस, यात्रियों, बुज़ुर्गों और दैनिक आवश्यक कार्यों के लिए निकलने वाले लोगों पर भी इसका प्रभाव पड़ सकता है। यही कारण है कि कुछ राज्यों और नगरों में प्रशासन की ओर से सड़कों या सार्वजनिक स्थानों पर नमाज़ अदा करने के संबंध में दिशा-निर्देश या प्रतिबंध जारी किए जाते हैं।

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ऐसी परिस्थितियों में एक जागरूक मुसलमान के लिए सबसे महत्वपूर्ण प्रश्न यह होता है कि “शरीअत-ए-इस्लामिया” इस विषय में क्या मार्गदर्शन प्रदान करती है। इस्लाम का स्वभाव सदैव संतुलन, सरलता, विवेक और सामाजिक उत्तरदायित्व पर आधारित रहा है।

शरीअत ने जहाँ नमाज़, जुमा और ईदैन जैसे महान धार्मिक प्रतीकों पर बल दिया है, वहीं मानवीय सुविधा, सार्वजनिक शांति, सामाजिक व्यवस्था और रास्तों के अधिकारों को भी अत्यंत महत्व दिया है। इस्लाम यह शिक्षा नहीं देता कि इबादत के नाम पर दूसरों को कष्ट पहुँचाया जाए या सामाजिक व्यवस्था को बाधित किया जाए।

पैग़म्बर मुहम्मद ने अनेक अवसरों पर रास्तों के अधिकारों की रक्षा करने, लोगों को तकलीफ़ से बचाने और समाज में सुविधा उत्पन्न करने की शिक्षा दी है। एक हदीस में रास्ते से कष्टदायक वस्तु हटाने को ईमान का हिस्सा बताया गया है। (सहीह मुस्लिम) इसी प्रकार एक अन्य हदीस में दूसरों को हानि पहुँचाने और कष्ट देने से मना किया गया है। (सुनन इब्ने माजा)

इसी कारण शरीअत के ज्ञाता और इस्लामी विद्वानों ने स्पष्ट किया है कि सड़कें सार्वजनिक उपयोग के लिए होती हैं और उन पर सभी नागरिकों का समान अधिकार होता है। अतः ऐसी स्थिति में जब सरकारी स्तर पर प्रतिबंध हो या यातायात अवरुद्ध होने, रोगियों की आवाजाही प्रभावित होने अथवा सामान्य नागरिकों को कठिनाई होने की आशंका हो, तब सड़कों पर नमाज़ अदा करने से बचना अधिक उचित, सावधानीपूर्ण और शरीअत की भावना के अनुरूप है।

इस्लाम कभी भी इबादत को अव्यवस्था, अशांति या दूसरों के लिए परेशानी का कारण नहीं बनाता, बल्कि वह उत्तम सामाजिक व्यवहार, संतुलन और शांति की शिक्षा देता है। शरीअत का प्रसिद्ध सिद्धांत “ला ज़रर व ला ज़िरार” अर्थात “न स्वयं हानि उठाओ और न दूसरों को हानि पहुँचाओ” इसी संतुलित इस्लामी दृष्टिकोण को व्यक्त करता है।

वर्तमान भारतीय परिस्थितियों में विभिन्न मुस्लिम संगठनों, धार्मिक संस्थाओं, उलमा और सामाजिक संगठनों ने भी मुसलमानों से यही अपील की है कि वे “जुमा” और “ईदैन” के अवसर पर अनुशासन बनाए रखें, सरकारी निर्देशों का सम्मान करें तथा मस्जिदों और ईदगाहों के भीतर या वैकल्पिक वैध स्थानों पर शांति और गरिमा के साथ नमाज़ अदा करें।

जमीयत उलेमा-ए-हिंद सहित अनेक मुस्लिम संगठनों ने इस बात पर बल दिया है कि मुसलमान भावनाओं के बजाय विवेक, धैर्य और उत्तरदायित्व के साथ अपने धार्मिक कर्तव्यों का पालन करें ताकि इबादत की पवित्रता भी बनी रहे और सामाजिक सौहार्द भी प्रभावित न हो। वास्तव में इस्लाम अपने अनुयायियों को सदैव ऐसा मार्ग अपनाने की शिक्षा देता है जिसमें दीन भी सुरक्षित रहे और समाज भी शांति और व्यवस्था के साथ चलता रहे।

विशेष रूप से “ईदैन” और “जुमा” के अवसर पर चूँकि प्रत्येक व्यक्ति बड़ी जामा मस्जिद या केंद्रीय ईदगाह में नमाज़ अदा करना चाहता है, इसलिए अनेक स्थानों पर अत्यधिक भीड़ हो जाती है। यह भावना अपनी जगह सम्माननीय है, किन्तु यदि एक ही स्थान पर सभी लोगों के लिए पर्याप्त स्थान उपलब्ध न हो, तो शरीअत मुसलमानों को सरल और संतुलित मार्ग अपनाने की अनुमति देती है।

ऐसी स्थिति में अधिक उपयुक्त और बेहतर तरीका यही है कि मुसलमान अपने मोहल्लों, कॉलोनियों और स्थानीय मस्जिदों या ईदगाहों में नमाज़ अदा करें। इससे न केवल भीड़ कम होगी बल्कि शांति, एकाग्रता और अनुशासन के साथ इबादत भी संपन्न हो सकेगी।

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वास्तव में इस्लाम में किसी विशेष मस्जिद में नमाज़ अदा करना अनिवार्य नहीं, बल्कि मूल उद्देश्य जमाअत, इबादत और अल्लाह की प्रसन्नता प्राप्त करना है। अतः यदि कोई व्यक्ति अपने मोहल्ले की मस्जिद में नमाज़ अदा करता है तो उसके पुण्य और आध्यात्मिक फल में कोई कमी नहीं होती।

शरीअत के जानकारों ने भी स्पष्ट किया है कि यदि किसी एक जामा मस्जिद में सभी लोगों की व्यवस्था संभव न हो तो विभिन्न मोहल्लों और क्षेत्रों की मस्जिदों में जुमा और ईद की नमाज़ का आयोजन किया जा सकता है, और वर्तमान परिस्थितियों में यही तरीका अधिक उपयुक्त, विवेकपूर्ण और व्यावहारिक है।

यदि किसी स्थान पर अत्यधिक विवशता हो, मस्जिद में स्थान न मिले या प्रशासनिक प्रतिबंधों के कारण बड़ी जमाअत संभव न हो, तो कुछ वयस्क मुसलमान किसी उपयुक्त स्थान या घर में भी जमाअत स्थापित कर सकते हैं, बशर्ते वहाँ अनुशासन, गरिमा और शरीअत के आदाब का पालन किया जाए। इससे इस्लाम की सरलता, व्यापकता और व्यावहारिक बुद्धिमत्ता का सुंदर परिचय मिलता है। इस्लाम परिस्थितियों के अनुसार सुविधा और सरलता प्रदान करता है, न कि कठिनाई और विवाद को बढ़ावा देता है।

भारतीय मुसलमानों की उज्ज्वल परंपरा सदैव यह रही है कि उन्होंने अपनी धार्मिक पहचान को बनाए रखते हुए देश के कानूनों, सामाजिक परंपराओं और राष्ट्रीय हितों का सम्मान किया है। यही संतुलन और संयम भारतीय मुसलमानों की वास्तविक पहचान भी है।

आज के समय में भी आवश्यकता इस बात की है कि मुसलमान भावनाओं के बजाय विवेक, धैर्य, धार्मिक समझ और सामूहिक उत्तरदायित्व के साथ कार्य करें। इबादत का वास्तविक उद्देश्य अल्लाह की बंदगी, आध्यात्मिक सुधार, नैतिक प्रशिक्षण और मनुष्यों के बीच प्रेम, सद्भाव और भाईचारे को बढ़ावा देना है, न कि किसी प्रकार का तनाव, टकराव या अव्यवस्था उत्पन्न करना।

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यदि मुसलमान वर्तमान परिस्थितियों में अपने मोहल्लों की मस्जिदों और ईदगाहों में अनुशासन और गरिमा के साथ नमाज़ अदा करें, सड़कों और सार्वजनिक मार्गों पर अनावश्यक भीड़ से बचें, स्थानीय प्रशासन के साथ सहयोग करें और उलमा तथा मुस्लिम संगठनों की अपीलों का पालन करें, तो यह न केवल शरीअत की शिक्षाओं के अनुरूप होगा. बल्कि इस्लाम के उत्तम आचरण, संतुलन, शांति, कानून पालन और उत्तरदायी चिंतन का उत्कृष्ट व्यावहारिक उदाहरण भी सिद्ध होगा। यही व्यवहार भारत जैसे विविधतापूर्ण और साझा समाज में धार्मिक गरिमा, सामाजिक सौहार्द, राष्ट्रीय एकता और पारस्परिक सम्मान को सुदृढ़ करने का माध्यम बन सकता है।

( डॉ. रैहान अख्तर,असिस्टेंट प्रोफेसर, धर्म संकाय अध्ययन,अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी, अलीगढ़)