कुर्बानी या मदद, क्या कहता है इस्लाम

Story by  फिरदौस खान | Published by  [email protected] | Date 28-05-2026
Sacrifice or Aid: What Does Islam Say?
Sacrifice or Aid: What Does Islam Say?

 

-डॉ. फ़िरदौस ख़ान                

पिछले कुछ बरसों से ईद उल अज़हा के मौक़े पर क़ुर्बानी को लेकर कई ऐसे बयान आ रहे हैं, जो बहस का मुद्दा बन जाते हैं। इस बार भी कुछ ऐसा ही हो रहा है। कई मुसलमान कह रहे हैं कि क़ौम के लोग हर साल ईद उल अज़हा पर करोड़ों रुपये क़ुर्बानी पर ख़र्च कर देते हैं। अगर ये रक़म क़ुर्बानी पर ख़र्च न करके इनसे ज़रूरतमंदों की मदद की जाए, तो क़ौम की हालत कुछ बेहतर हो जाए। अपनी बात को पुख़्ता करने के लिए वे मोरक्को की मिसाल दे रहे हैं।

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ग़ौरतलब है कि पिछले साल अफ़्रीकी देश मोरक्को के शासक सिदी मुहम्मद बिन हसन अल्वी ने अकाल की वजह से ईद उल अज़हा पर क़ुर्बानी पर रोक लगा दी थी। हुकूमत ने सख़्त निर्देश दिए थे कि कोई भी नागरिक क़ुर्बानी न करे। मोरक्को में अकाल की वजह से भीषण जल संकट पैदा हो गया था। लोग पानी के लिए तरस रहे थे।

क़ुर्बानी के लिए ज़्यादा पानी की ज़रूरत होती है। इसलिए हुकूमत ने क़ुर्बानी पर रोक लगाने का फ़ैसला किया। इसके तहत जानवरों की ख़रीद-फ़रोख़्त पर पाबन्दी लगा दी गई। कुछ लोगों ने हुकूमत के इस फ़ैसले की अनदेखी करके क़ुर्बानी करने की तैयारी कर ली, लेकिन चोरी छुपे लाए गये जानवरों को ज़ब्त कर लिया गया।

इससे लोगों में हुकूमत के ख़िलाफ़ आक्रोश फैल गया और उन्होंने जगह-जगह धरने-प्रदर्शन शुरू कर दिये। इसके साथ ही ये बहस भी शुरू हो गई कि क्या हुकूमत को मज़हबी मामलों में दख़ल देने का हक़ है? मोरक्को और अन्य कई मुस्लिम देशों में इस पर तीखी प्रतिक्रिया हुई थी। हालांकि बहुत से लोग इस मामले में हुकूमत के साथ खड़े दिखाई दिए।

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ज़कात से मदद

जहां तक क़ुर्बानी की रक़म से ज़रूरतमंदों की मदद करने का सवाल है, तो सनद रहे कि ईद उल अज़हा से पहले ईद उल फ़ित्र आती है। ईद उल फ़ित्र के मौक़े पर ज़रूरतमंदों को ज़कात, फ़ितरा और सदक़ा दिया जाता है। ज़कात की रक़म ज़रूरतमंदों पर ही ख़र्च की जाती है।

ज़कात की रक़म से क़र्ज़दारों का क़र्ज़ अदा कर दिया जाता है। बेघरों को मकान ख़रीदने के लिए पैसा दे दिया जाता है। जिनके घर कोई कमाने वाला नहीं है, उन्हें सालभर का ख़र्च दे दिया जाता है। बेवाओं और तलाक़शुदा महिलाओं का महीना बांध दिया जाता है। ग़रीबों को इलाज के लिए पैसे दे दिए जाते हैं। ज़कात की रक़म से इसी तरह के और भी काम किए जाते हैं।      

दरअसल, अल्लाह तआला ने हमारे माल और दौलत में ज़रूरतमंद लोगों के लिए ज़कात के तौर पर एक हिस्सा मुक़र्रर किया हुआ है। क़ुरआन करीम में लोगों की मदद करने का हुक्म देने के साथ-साथ उन्हें इस नेक काम के लिए प्रोत्साहित भी किया गया है। अल्लाह तआला फ़रमाता है- “जो लोग अपना माल अल्लाह की राह में ख़र्च करते हैं, उनके ख़र्च की मिसाल उस दाने की मानिन्द है जिससे सात बालियां निकलें और हर बाली में सौ दाने हों। (क़ुरआन 2: 261)

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क़ुर्बानी का हुक्म

क़ुर्बानी वाजिब भी है और सुन्नत भी है। क़ुरआन करीम में अल्लाह तआला फ़रमाता है- “और हमने हर उम्मत के लिए क़ुर्बानी मुक़र्रर कर दी है, ताकि वे उन चौपायों को ज़िबह करते वक़्त अल्लाह का नाम लें, जो अल्लाह ने उन्हंं अता किए हैं.” (क़ुरआन 22:34)

दरहक़ीक़त, क़ुर्बानी के ज़रिये अल्लाह अपने बन्दे की नीयत को ज़ाहिर करना चाहता है, क्योंकि वह सबकुछ जानता है। क़ुरआन करीम में अल्लाह तआला फ़रमाता है- “अल्लाह को न क़ुर्बानी का गोश्त पहुंचता है और न उसका ख़ून, लेकिन अल्लाह की बारगाह में तुम्हारा तक़वा पहुंचता है।” (क़ुरआन 22:37)

हदीसों के मुताबिक़ अल्लाह के आख़िरी रसूल हज़रत मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम पाबन्दी से क़ुर्बानी किया करते थे। आप सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम के सहाबा भी क़ुर्बानी करते थे। हज़रत अब्दुल्लाह बिन उमर फ़रमाते हैं कि नबी करीम सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम दस साल मदीने में रहे और आप सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम हर साल क़ुर्बानी किया करते थे। (मुसनद अहमद, सुन्न तिर्मज़ी)

हज़रत अनस रज़ियल्लाहु अन्हु फ़रमाते हैं कि अल्लाह के रसूल सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम दो मैंढों की क़ुर्बानी किया करते थे और मैं भी दो मैंढों की ही क़ुर्बानी किया करता था। (सही बुख़ारी)

अल्लाह के रसूल हज़रत मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने फ़रमाया- “जिसने भी ईद की नमाज़ के बाद चौपाया ज़िबह किया, उसकी क़ुर्बानी हो गई और उसने मुसलमानों की सुन्नत पर अमल कर लिया। (सही बुख़ारी)

हज़रत अबू हुरैरा से रज़ियल्लाहु अन्हु से रिवायत है कि अल्लाह के रसूल सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने फ़रमाया- जो शख़्स क़ुर्बानी करने की हैसियत रखता है और फिर भी क़ुर्बानी नहीं करता तो वह हमारी ईदगाह के क़रीब न आए। (इब्ने माजा, मुसनद अहमद)    

इस्लाम में ज़रूरतमंदों का बहुत ज़्यादा ख़्याल रखा गया है। क़ुरआन करीम में बार-बार दूसरों की मदद करने का हुक्म दिया गया है। हदीसों में भी इसका ज़िक्र मिलता है। हज़रत अबू हुरैरा रज़ियल्लाहु अन्हु से रिवायत है कि अल्लाह के रसूल हज़रत मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने फ़रमाया- “अल्लाह तआला फ़रमाता है कि इब्ने आदम! तू ख़र्च कर, मैं तुझ पर ख़र्च करूंगा।“ (सही बुख़ारी : 5352, सही मुस्लिम : 993)  

आप सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने फ़रमाया- “जो शख़्स अल्लाह की राह में कोई चीज़ ख़र्च करे, तो उसके लिए वह चीज़ सात सौ गुना बढ़ाकर लिखी जाती है।“ (सुनन तिर्मिज़ी : 1625) 

हज़रत अब्दुल्ला बिन उमर रज़ियल्लाहु अन्हु से रिवायत है कि नबी करीम सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने फ़रमाया- “जो शख़्स अपने भाई की ज़रूरत पूरी करता है, तो अल्लाह तआला उसकी ज़रूरत पूरी करता है।  (अबू दाऊद 4893)

आप सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने फ़रमाया है- “ख़ैरात मत रोको, वरना तुम्हारा रिज़्क़ भी रोक लिया जाएगा।(सही बुख़ारी : 1433)

आप सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने फ़रमाया है- “सदक़ा करके अपने और अपने परवरदिगार के दरम्यान ताल्लुक़ पैदा करो। तुम्हें रिज़्क़ दिया जाएगा, तुम्हारी मदद भी की जाएगी और तुम्हारे नुक़सान की भरपाई भी की जाएगी।(सुनन इब्ने माजा : 1081)

 हज़रत इब्ने उमर रज़ियल्लाहु अन्हु हर उस ज़रूरतमंद को सदक़ा-ए-फ़ित्र दे दिया करते थे, जो उसे क़ुबूल करता था। लोग आमतौर पर ईद से एक-दो दिन पहले ही इसे अदा कर दिया करते थे। (सही बुख़ारी :1511)  

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ईद उल फ़ित्र की ही तरह ईद उल अज़हा पर भी ज़रूरतमंदों की मदद की जाती है। अमीर लोग हर रोज़ अच्छा लज़ीज़ खाना खाते हैं, लेकिन ग़रीबों को सिर्फ़ त्यौहारों पर ही मनचाहा खाना मिल पाता है। क़ुर्बानी के गोश्त के तीन हिस्से किए जाते हैं।

एक हिस्सा ख़ुद का होता है, एक हिस्सा रिश्तेदारों का और एक हिस्सा ज़रूरतमंद लोगों का होता है। आज भी ऐसे लोगों की कोई कमी नहीं है, जिन्हें दो वक़्त पेटभर खाना भी नहीं मिल पाता। भूख से मरने की ख़बरें भी देखने-सुनने को मिलती रहती हैं। ये बहुत अफ़सोस की बात है कि कूड़े-कचरे के ढेर से भी लोग खाने-पीने का सामान निकाल कर खाते देखे जाते हैं। 

महंगाई बहुत बढ़ गई है। हर चीज़ के दाम आसमान छू रहे हैं। थाली से दाल-सब्ज़ियां भी ग़ायब हो रही हैं। ऐसे में गोश्त खाने के बारे में तो ग़रीब सोच भी नहीं सकते। उन्हें ईद उल अज़हा के मौक़े पर ही गोश्त मिल पाता है। इसी दौरान वे अपनी मनपसंद की चीज़ें खा लेते हैं। जानवरों की खालों की रक़म ज़रूरतमंदों पर ख़र्च की जाती है।

जिन लोगों के पास उनकी ज़रूरत से ज़्यादा माल और दौलत है, तो वे ज़रूरतमंदों की दिल खोलकर मदद कर सकते हैं। इस तरह वे अपनी दुनिया और आख़िरत दोनों ही संवार सकते हैं।

(लेखिका आलिमा हैं. उन्होंने फ़हम अल क़ुरआन लिखा है)