डॉ फैयाज अहमद फैजी
भारतीय लोकतंत्र और सामाजिक न्याय के इतिहास में आरक्षण हमेशा से एक संवेदनशील और निर्णायक विषय रहा है। हाल ही में पश्चिम बंगाल सरकार द्वारा राज्य की अन्य पिछड़ा वर्ग (OBC) आरक्षण नीति में किया गया आमूलचूल बदलाव देशव्यापी बहस का केंद्र बन गया है। सरकार ने राज्य में कुल ओबीसी आरक्षण को 17%से घटाकर 7%कर दिया है और इसके तहत मिलने वाले उप-वर्गीकरण को पूरी तरह समाप्त कर दिया है।
इस फैसले का सबसे सीधा असर उन मुस्लिम उप-जातियों पर पड़ा है, जिन्हें साल 2010के बाद इस सूची में शामिल किया गया था। पहली नज़र में यह कदम एक बड़ा राजनीतिक और सामाजिक झटका लग सकता है, लेकिन जब हम इसकी तह में जाते हैं, तो यह साफ हो जाता है कि यह फैसला किसी राजनीतिक इच्छाशक्ति का परिणाम नहीं, बल्कि न्यायपालिका द्वारा सामाजिक न्याय को पटरी पर लाने का एक प्रयास है।
पसमांदा आंदोलन के नजरिए से, यह घटनाक्रम इस बात का जीवंत उदाहरण है कि कैसे "थोक वोटबैंक" की राजनीति अंततः समाज के सबसे पिछड़े और वंचित तबके का ही नुकसान करती है।इस पूरे मामले की जड़ें मई 2024में कलकत्ता उच्च न्यायालय द्वारा दिए गए एक ऐतिहासिक फैसले में हैं। कोर्ट ने साल 2010 के बाद पश्चिम बंगाल में जारी किए गए लाखों ओबीसी प्रमाणपत्रों को असंवैधानिक और अवैध घोषित कर दिया था।

अदालत का स्पष्ट मानना था कि 2010 के बाद, विशेषकर 2012के एक अधिनियम के माध्यम से, जिस तरह से रातों-रात दर्जनों मुस्लिम उप-जातियों को ओबीसी सूची में शामिल किया गया, उसके पीछे कोई ठोस वैज्ञानिक, सामाजिक या आर्थिक डेटा मौजूद नहीं था। भारतीय संविधान का अनुच्छेद 15(4) और 16(4) राज्य को पिछड़ों के लिए विशेष प्रावधान करने की शक्ति देता है, लेकिन इसके लिए 'पिछड़ेपन' का प्रामाणिक डेटा होना अनिवार्य है।
तत्कालीन सरकार ने राष्ट्रीय पिछड़ा वर्ग आयोग या राज्य के वैधानिक निकायों की उचित सिफारिशों को दरकिनार कर, केवल धार्मिक और राजनीतिक प्राथमिकताओं के आधार पर यह वर्गीकरण किया था। वर्तमान सरकार द्वारा जारी नई अधिसूचना इसी अदालती आदेश का कानूनी अनुपालन है, जिसके तहत आरक्षण का दायरा सिमित कर पुरानी त्रुटियों को सुधारा जा रहा है।
पूर्ववर्ती व्यवस्था में ओबीसी को दो श्रेणियों में बांटा गया था। 'OBC-A' (अत्यंत पिछड़ा वर्ग), जिसमें अधिकतर मुस्लिम जातियां थीं, उन्हें 10%आरक्षण प्राप्त था। 'OBC-B' (पिछड़ा वर्ग), जिसमें मुख्य रूप से हिंदू और कुछ अन्य मुस्लिम जातियां थीं, उन्हें 7% आरक्षण प्राप्त था। इस प्रकार कुल कोटा 17%था।
अब इस विभाजन को पूरी तरह समाप्त कर दिया गया है और कुल कोटा केवल 7%रह गया है। नई व्यवस्था के तहत सरकार ने केवल 66जातियों/समूहों को ओबीसी के दायरे में वैध माना है। ये वो जातियां हैं जो 2010से पहले से ही राज्य की सूची में शामिल थीं। 2010के बाद जोड़ी गई लगभग 77जातियों को बाहर कर दिया गया है, जिनमें से 75से अधिक मुस्लिम जातियां सम्मिलित थे।
इस पूरे घटनाक्रम को समझने के लिए 'पसमांदा' दृष्टिकोण को समझना सबसे जरूरी है। पसमांदा आंदोलन का बुनियादी सिद्धांत ही यही है कि "पिछड़ेपन का आधार मजहब नहीं, बल्कि सामाजिक, शैक्षणिक और आर्थिक स्थिति होनी चाहिए।" यह एक कड़वी सच्चाई है कि भारतीय उपमहाद्वीप के सामाजिक ताने-बाने में मुस्लिम समाज भी जातिगत ऊंच-नीच से अछूता नहीं है।
यहाँ अशराफ (उच्च वर्गीय/विदेशी मूल के मुस्लिम) और पसमांदा (स्थानीय मूल के पिछड़े, दस्तकार और दलित मुस्लिम) के बीच एक गहरी आर्थिक राजनैतिक एवं सामाजिक खाई है। जब पश्चिम बंगाल में बिना किसी वैज्ञानिक सर्वे के पूरी की पूरी मुस्लिम आबादी या उनके बड़े हिस्से को एकमुश्त 'ओबीसी' घोषित कर दिया गया, तो वह सामाजिक न्याय नहीं बल्कि 'तुष्टिकरण की थोक राजनीति' थी।
इसका नुकसान यह हुआ कि जो रसूखदार और अगड़े मुस्लिम थे, वे आरक्षण का मलाईदार हिस्सा हड़प ले गए, और जो वास्तविक हकदार थे, जैसे बुनकर,धुनिया, कूंजड़ा (राइन), हज्जाम आदि वे हाशिए पर ही रह गए।
कलकत्ता हाई कोर्ट ने प्रक्रियात्मक खामियों के कारण 2010 के बाद के आरक्षण को रद्द किया, लेकिन राज्य सरकार ने इसके जवाब में 'OBC-A' और 'OBC-B' के उप-वर्गीकरण को ही पूरी तरह खत्म कर दिया। यह निर्णय अति-पिछड़ों( सभी धर्मों के) के हितों के खिलाफ जाता है।
सुप्रीम कोर्ट ने भी हाल के कई फैसलों में यह स्वीकार किया है कि पिछड़ों के भीतर 'अति-पिछड़ों' की पहचान करना और उन्हें अलग से कोटा देना (कोटे के भीतर कोटा) सामाजिक न्याय को लागू करने का सबसे सटीक तरीका है।
पश्चिम बंगाल में 'OBC-A' श्रेणी के माध्यम से जो अति-पिछड़े पसमांदा मुस्लिम मुख्यधारा में आने की कोशिश कर रहे थे, अब उप-वर्गीकरण खत्म होने और कुल कोटा केवल 7%रह जाने से वे फिर से प्रतिस्पर्धा में पीछे छूट जाएंगे। अब वे उन वर्गों के साथ प्रतिस्पर्धा करने को मजबूर होंगे जो उनसे कहीं अधिक मजबूत स्थिति में हैं।
यह विवाद इस बात का स्पष्ट संकेत है कि सामाजिक न्याय को केवल चुनावी नारों या अधकचरी प्रशासनिक नीतियों के भरोसे नहीं छोड़ा जा सकता। यदि सरकार वास्तव में पिछड़ों का भला चाहती है, तो उसे निम्नलिखित सुधारात्मक कदम उठाने होंगे:
सरकार को तुरंत पूरे राज्य में एक व्यापक, पारदर्शी और वैज्ञानिक सर्वेक्षण कराना चाहिए। इस सर्वे में किसी व्यक्ति के धर्म को देखने के बजाय उसकी जातिगत पृष्ठभूमि, पारिवारिक आय, शिक्षा का स्तर और पारंपरिक पेशे को आधार बनाया जाना चाहिए।
हाई कोर्ट ने भी अपने आदेश में यह स्पष्ट किया है कि यदि भविष्य में राज्य सरकार को पर्याप्त और ठोस आंकड़े मिलते हैं, तो वह कानूनी प्रक्रिया का पालन करते हुए पात्र जातियों को दोबारा ओबीसी सूची में शामिल कर सकती है। सरकार को एक निष्पक्ष जांच पैनल के माध्यम से इस प्रक्रिया को तेज करना चाहिए, ताकि वास्तविक पसमांदा समाज का हक उन्हें वापस मिल सके।
किसी भी समाज को आरक्षण देते समय राजनीति से ऊपर उठकर संवैधानिक मर्यादाओं और अदालती दिशा-निर्देशों का पालन किया जाना चाहिए, ताकि भविष्य में दोबारा ऐसी कानूनी अड़चनें न आएं और युवाओं का भविष्य अधर में न लटके।
पश्चिम बंगाल का यह आरक्षण संकट देश के सभी नीति-निर्माताओं के लिए एक सबक है। धर्म के चश्मे से सामाजिक न्याय को देखने का नतीजा हमेशा ऐसा ही त्रुटिपूर्ण होता है। पसमांदा समाज न तो न्यायालय के इस फैसले को पूरी तरह खारिज करता है और न ही सरकार की पुरानी त्रुटिपूर्ण नीति का आंख मूंदकर समर्थन करता है।
हम इस बात के पक्षधर हैं कि न्याय की लाठी मजबूत होनी चाहिए, लेकिन वह सबसे कमजोर व्यक्ति की सुरक्षा के लिए उठनी चाहिए। पश्चिम बंगाल के देशज पसमांदा (पिछड़े और वंचित मुस्लिमों) को उनका हक तभी मिलेगा जब राजनीति से परे हटकर, ईमानदारी के साथ वास्तविक 'पसमांदा' की पहचान की जाएगी और उन्हें उनका संवैधानिक अधिकार दिया जाएगा। सामाजिक न्याय की इस लड़ाई में जातिगत सच्चाई को स्वीकार करना ही पहला और सबसे जरूरी कदम है।