फरहान इसराइली/ जयपुर
जयपुर के पुराने शहर का रामगंज बाज़ार अपनी तंग गलियों और चहल-पहल के लिए जाना जाता है। इसी बाज़ार का एक हिस्सा है क़मर चौक। यह सिर्फ एक भौगोलिक ठिकाना नहीं है। यह उर्दू अदब, शायरी और इल्म का एक जीता-जागता इतिहास है। इस चौक ने पीढ़ियों से अदबी तहज़ीब को ज़िंदा रखा है। आज भी यहाँ के माहौल में शायरी की महक घुली हुई है।
इस विरासत के पीछे एक पूरा घराना है। इस घराने की नींव मौलाना मोहम्मद अयूब ख़ान वाहिदी 'क़मर' ने रखी थी। आज उनके पोते शम्सुद्दुहा ख़ान 'हाकिम' इस सिलसिले को पूरी शिद्दत से आगे बढ़ा रहे हैं।
गौलंदाज़ चौक से क़मर चौक बनने का सफ़र
इतिहास के पन्ने बताते हैं कि इस परिवार के बुज़ुर्ग मोहम्मद गौरी के दौर में हिंदुस्तान आए थे। उस समय उनके पास तोपखाने की कमान थी। बाद में उन्हें दौसा के पास लवाड़ की जागीर मिली। वहाँ आज भी उनके बुज़ुर्गों की मज़ारें मौजूद हैं। जयपुर का जो इलाका आज क़मर चौक कहलाता है, उसका पुराना नाम गौलंदाज़ चौक था।
गौलंदाज़ का सीधा संबंध तोप चलाने वालों से था। बाद में मौलाना मोहम्मद अयूब ख़ान के तख़ल्लुस 'क़मर' के नाम पर लोग इसे क़मर चौक कहने लगे। यह नाम इस बात का सबूत है कि समाज में एक अदीब और उस्ताद का मर्तबा कितना बड़ा होता है।
मौलाना 'क़मर' का जन्म 1दिसंबर 1888को जयपुर में हुआ था। उनके पिता ग़ुलाम रसूल ख़ान चाहते थे कि बेटा हाफ़िज़-ए-क़ुरआन बने। मौलाना ने शुरुआती तालीम घर पर ही पाई। वे उर्दू, अरबी और फ़ारसी के बड़े आलिम बने। बाद में वे सरकारी नौकरी में आए। उन्होंने करीब 22साल तक बतौर सरकारी शिक्षक सेवाएं दीं। नौकरी के दौरान वे जहाँ भी रहे, वहाँ मुशायरों और अदबी बैठकों का माहौल बना रहा।
जब हसरत मोहानी और अल्लामा इक़बाल ने की तारीफ़
मौलाना 'क़मर' को शायरी का शौक़ बचपन से था। उन्होंने शुरुआत नातिया शायरी से की। जब उन्होंने अपना कलाम लोगों के सामने रखा, तो एक बुज़ुर्ग ने उन्हें किसी उस्ताद से इस्लाह यानी सुधार लेने की सलाह दी। उस दौर में मौलाना 'क़मर' ने ख़त के ज़रिये अपना कलाम मशहूर शायर मौलाना हसरत मोहानी को भेजा।
हसरत मोहानी उनके हुनर से बेहद प्रभावित हुए। उन्होंने जवाब में लिखा कि आप बग़ैर इस्लाह के शायर हैं। आपको बस अपनी मश्क-ए-सुख़न यानी लिखने का अभ्यास जारी रखना चाहिए।सिर्फ हसरत मोहानी ही नहीं, बल्कि अल्लामा इक़बाल भी उनकी शायरी के मुरीद थे।
इक़बाल अक्सर उन्हें मुलाक़ात के लिए लाहौर बुलाते थे। लाहौर में दोनों के बीच कई अदबी गुफ़्तगू हुईं। इक़बाल ने उनके कलाम को बेहद मेयारी और उम्दा बताया था। मौलाना 'क़मर' की मकबूलियत का अंदाज़ा इस बात से भी लगाया जा सकता है कि उनकी लिखी एक दुआ साल 1947 तक सरकारी स्कूलों में पढ़ी जाती थी। उस दुआ के बोल थे, "ऐ जग के गुरु सबसे पहले, हम नाम न लें क्यों कर तेरा। तू मालिक है हम बालक हैं, तुझसे ये विनती करते हैं।"
किताबों में सिमटा सूफ़ियाना रंग और सामाजिक सरोकार
मौलाना 'क़मर' सिर्फ शायर नहीं थे। वे एक बेहतरीन लेखक, मुदर्रिस और कैलीग्राफर भी थे। उनकी पहली किताब का नाम "अनवार-उत-तजल्लीयात" था। उन्होंने हज के सफ़र के अनुभवों पर एक सफरनामा लिखा, जिसका नाम "मक़ामात-ए-मुक़द्दस" है। इस किताब की ख़ासियत यह है कि पाठक को खुद हज के सफ़र में होने का अहसास होता है।
उनकी अन्य प्रमुख कृतियों में ये शामिल हैं:
1. शीशा-ए-दिल (शायरी का मजमुआ)
2.जहेज़ की लानत (दहेज प्रथा के ख़िलाफ़ लिखी गई किताब)
3.तारीख़-ए-जंग-ए-आज़ादी (स्वतंत्रता आंदोलन के वाक़ियात)
4.तारीखी क़तआत और मजमुआ-ए-ग़ज़लियात
"जहेज़ की लानत" में उन्होंने दहेज के कारण एक लड़की की हत्या की सच्ची घटना को तफ़सील से बयां किया था। वहीं "तारीख़-ए-जंग-ए-आज़ादी" में उन्होंने देश के स्वतंत्रता आंदोलन को बड़े ही अदबी अंदाज़ में पेश किया था।
राजस्थान का पहला उर्दू कॉलेज
मौलाना 'क़मर' वाहिदी ने शिक्षा के क्षेत्र में भी एक बड़ा मील का पत्थर स्थापित किया था। उन्होंने रामगंज बाज़ार के लुहारों के खुर्रे में राजस्थान के पहले 'उर्दू कॉलेज' की नींव रखी थी। देश की आज़ादी के कुछ साल बाद शुरू हुआ यह संस्थान करीब 30साल तक उर्दू तालीम का सबसे बड़ा केंद्र रहा। यहाँ जामिया उर्दू अलीगढ़ का सेंटर भी था।
इस कॉलेज की कक्षाएं रात में लगती थीं। इसी वजह से लोग इसे "शबीना उर्दू कॉलेज" भी कहते थे। यहाँ जामिया उर्दू अलीगढ़ के अदीब, माहिर और कामिल जैसे मशहूर कोर्स कराए जाते थे। साथ ही बुनियादी उर्दू भी सिखाई जाती थी। इस संस्थान से पढ़कर कई नामी शख्सियतें निकलीं। यह कॉलेज साल 1982-83तक नियमित रूप से चला। बाद में घर से परीक्षा और तालीम का काम होता रहा। करीब 7-8साल पहले यह पूरी तरह बंद हो गया।
बज़्म-ए-क़मर: आज भी जारी है हर महीने की नशिस्त
उर्दू ज़बान और अदब को बढ़ावा देने के लिए मौलाना ने साल 1972में "बज़्म-ए-क़मर" नाम की संस्था बनाई थी। यह संस्था आज भी पूरी तरह सक्रिय है। हर महीने के दूसरे रविवार को इसकी अदबी नशिस्त होती है। पहले ये महफ़िलें रात भर चलती थीं। अब लोगों की सहूलियत के लिए इन्हें दिन में आयोजित किया जाता है। इन बैठकों में तरही मुशायरे होते हैं, जहाँ नए और पुराने शायर अपना कलाम पढ़ते हैं।
पिछले 10सालों से यह संस्था समाज में योगदान देने वालों को सम्मानित भी कर रही है। इसके तहत "क़मर अवार्ड", "हसीन कौसरी अवार्ड" और "सिद्दीक कव्वाल अवार्ड" दिए जाते हैं। 23फरवरी 1991को मौलाना 'क़मर' का इंतकाल हो गया। उनके बाद उनके छोटे बेटे फ़रीदुल हसन अय्यूबी 'नज़र' और अब उनके पोते शम्सुद्दुहा ख़ान 'हाकिम' इस महफ़िल को सँभाले हुए हैं।

शम्सुद्दुहा ख़ान 'हाकिम': विरासत के नए रखवाले
शम्सुद्दुहा ख़ान 'हाकिम' ने बचपन से ही अपने घर में शेर-ओ-शायरी का माहौल देखा। वे मस्जिदों और मिलाद के कार्यक्रमों में अपने दादा का कलाम पढ़ते थे। इसी माहौल ने उन्हें भी शायर बना दिया। उन्होंने साल 1986में अपनी पहली ग़ज़ल पढ़ी, तब उनकी उम्र महज़ 15-16साल थी। दादा के शागिर्द कैफ़ी साहब ने उन्हें लिखने के लिए प्रेरित किया।
रोज़गार की वजह से बीच में कुछ समय के लिए शायरी छूटी, लेकिन यह सिलसिला ज़्यादा दिन दूर नहीं रह सका। हाकिम ने राजस्थान के कई शहरों में मुशायरे पढ़े। आकाशवाणी, दूरदर्शन उर्दू और डीडी राजस्थान पर उनका कलाम प्रसारित हुआ।
उन्होंने मुशायरों की निज़ामत यानी मंच संचालन भी शुरू किया। उन्हें राहत इंदौरी, वसीम बरेलवी, नज़र बरकाती और सागर सिद्दीकी जैसे मुल्क के बड़े शायरों के साथ मंच साझा करने का मौक़ा मिला।
हाकिम को मौजूदा हालात और सामाजिक मुद्दों पर लिखना पसंद है। उनका एक मशहूर शेर है:
"है जब पूछा गया मुझसे क्या शय है मोहब्बत,
हाथों ने मेरे मुल्क की तस्वीर बना दी।"
मिशन चंद्रयान की सफलता पर उन्होंने लिखा था:
"हम अंधेरों को मिटाएंगे, और नए सूरज उगाए जाएंगे।
चाँद पर चमकेगा परचम हिंद का, चाँद तक रास्ते बनाए जाएंगे।"
डिजिटल दौर में उर्दू को बचाने की मुहिम
हाकिम ने अभी तक अपनी कोई किताब प्रकाशित नहीं करवाई है। वे रिटायरमेंट के बाद अपनी रचनाओं को किताब की शक्ल देना चाहते हैं। फिलहाल उनका पूरा ध्यान डिजिटल माध्यमों पर है। उन्होंने एक यू-ट्यूब चैनल बनाया है, जहाँ वे अपनी ग़ज़लें और वीडियो साझा करते हैं।
उनका मानना है कि उर्दू सीखने के लिए सिर्फ सरकारों पर निर्भर रहने की ज़रूरत नहीं है। इंटरनेट ने नए रास्ते खोले हैं। कोरोना काल में उन्होंने "मिशन ज्ञान" प्रोजेक्ट के तहत उर्दू सिखाने के लिए कई वीडियो तैयार किए। उनके वीडियो देखकर कोई भी आसानी से उर्दू सीख सकता है।
हाकिम इस बात को सिरे से ख़ारिज करते हैं कि उर्दू ख़त्म हो रही है। वे कहते हैं कि आज अमेरिका और दुबई जैसे देशों में भी उर्दू खूब समझी जा रही है। उनका साफ़ कहना है कि अगर भारतीय फिल्म इंडस्ट्री से उर्दू को निकाल दिया जाए, तो उसकी रूह ही ख़त्म हो जाएगी।
रंगमंच, पत्रकारिता और कैलीग्राफी का हुनर
शायरी के अलावा हाकिम कला के कई अन्य रूपों से भी जुड़े रहे हैं। साल 1991-92के दौरान वे अखिल भारतीय नाट्य संघ से जुड़े थे। यह वही संस्था है जिससे शबाना आज़मी, गिरीश कर्नाड और इरफ़ान ख़ान जैसे दिग्गज जुड़े रहे। हाकिम को साल 1993में जयपुर के जवाहर कला केंद्र के उद्घाटन के दौरान अभिनेता दिलीप कुमार से मिलने का मौका भी मिला था।
हाकिम का पत्रकारिता में भी लंबा अनुभव रहा है। वे 'राजस्थान लीडर' नाम के उर्दू अख़बार से जुड़े रहे। इसके अलावा उन्होंने 'समाचार जगत' और 'भास्कर टीवी' में भी काम किया। उर्दू अख़बारों में वे खबरों की एडिटिंग, टाइपिंग और हेडिंग का काम देखते थे।
इसके साथ ही वे एक बेहतरीन कैलीग्राफी आर्टिस्ट भी हैं। वे पत्थरों, पुराने दस्तावेज़ों, कागज़ और शादी के कार्ड पर बेहद ख़ूबसूरत लिखावट करते हैं। दूर-दूर से लोग उनसे खुशख़ती करवाने आते हैं।

इतिहास के पन्नों को पढ़ने वाले सरकारी विशेषज्ञ
वर्तमान में हाकिम एक शिक्षक हैं। इसके साथ ही वे राजस्थान सरकार के भू राजस्व विभाग के लिए एक बेहद ज़रूरी काम कर रहे हैं। वे विभाग के पुराने उर्दू, अरबी और फ़ारसी दस्तावेज़ों को पढ़ने और उनका अनुवाद करने के विशेषज्ञ हैं। ज़मीन-जायदाद और पुराने मुकदमों से जुड़े सैकड़ों साल पुराने कागज़ात अक्सर उनके पास जाँच के लिए आते हैं।
उन्होंने जयपुर के मशहूर अल्बर्ट हॉल म्यूज़ियम की दीवारों पर लिखी पुरानी उर्दू इबारतों को पढ़ने और उन्हें सही करवाने में मदद की। इसके अलावा उन्होंने जयपुर के ताड़केश्वर मंदिर और किशनपोल क्षेत्र के कई पुराने मंदिरों के फ़ारसी और उर्दू दस्तावेज़ों का भी अनुवाद किया है।
भाषा के भविष्य पर बात करते हुए हाकिम थोड़े भावुक हो जाते हैं। वे कहते हैं कि उर्दू को एक धर्म विशेष से जोड़ दिया गया, जो कि पूरी तरह ग़लत है। इस ज़ुबां का जन्म हिंदुस्तान में हुआ था। इसे आगे बढ़ाने में ग़ैर-मुस्लिम साहित्यकारों का भी उतना ही बड़ा योगदान रहा है।
वे नई पीढ़ी को यही संदेश देते हैं कि जो भी बच्चा शायरी, उर्दू, अरबी, फ़ारसी या खुशख़ती सीखना चाहता है, उसके लिए बज़्म-ए-क़मर और क़मर चौक के दरवाज़े हमेशा खुले हैं। उनके बुज़ुर्गों ने उन्हें यही सिखाया है कि कला की ख़िदमत बिना किसी लालच के होनी चाहिए। आज के डिजिटल दौर में भले ही लोग मोबाइल स्क्रीन में सिमट गए हों, लेकिन क़मर चौक आज भी अपनी सौ साल पुरानी अदबी रिवायत की रौशनी फैला रहा है।