पर्यावरण अनुकूल कुर्बानी की ओर: अपशिष्ट प्रबंधन और सामाजिक जिम्मेदारियां

Story by  आवाज़ द वॉयस | Published by  [email protected] | Date 28-05-2026
Towards Eco-Friendly Sacrifice: Waste Management and Social Responsibilities
Towards Eco-Friendly Sacrifice: Waste Management and Social Responsibilities

 

आमिर सुहैल वानी

कश्मीर में ईद-उल-अज़हा हमेशा से एक धार्मिक रस्म से कहीं बढ़कर रही है। यह त्योहार भक्ति, उदारता, मेहमाननवाज़ी और आपसी भाईचारे का प्रतीक है। इस दौरान घरों के दरवाजे सबके लिए खुले रहते हैं। पड़ोसी एक-दूसरे को मांस बांटते हैं। लंबे समय बाद परिवार के लोग एक साथ इकट्ठा होते हैं और पूरी घाटी तकबीर की आवाजों से गूंज उठती है।

लेकिन इस पवित्र माहौल के बीच एक और परेशान करने वाला नजारा अब आम होने लगा है। शहरों और गांवों में सड़कों के किनारे भेड़ों की खालों के ढेर पड़े रहते हैं। नालियों में खून बहता दिखाई देता है। नदियों और पूंछों में ओझड़ी और आंतें फेंक दी जाती हैं।

सार्वजनिक जगहों पर आवारा कुत्ते इन अवशेषों को नोंचते हैं। कई दिनों तक पूरे इलाके में दुर्गंध फैली रहती है। जिस कुर्बानी का मकसद खुदा की राह में त्याग करना है, वह हमारी लापरवाही के कारण पर्यावरण के नुकसान, जनता की परेशानी और बीमारियों की वजह बन जाती है।

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कश्मीर की संवेदनशील पर्यावरण व्यवस्था के कारण यह समस्या और भी खतरनाक हो जाती है। बड़े मैदानी इलाकों की तरह यहां कचरा दूर-दूर तक नहीं फैल पाता है। कश्मीर एक कटोरी के आकार की नाजुक घाटी है। यहां की पूरी व्यवस्था पानी के स्रोतों, झरनों, झीलों और नदियों पर टिकी है।

आज भी एक बड़ी आबादी पीने के पानी के लिए इन्हीं प्राकृतिक स्रोतों पर निर्भर है। जब पशुओं का खून और अवशेष नालियों में बहाए जाते हैं, तो वे गायब नहीं होते हैं। वे पानी में मिलकर सड़ने लगते हैं। इससे खतरनाक बैक्टीरिया पैदा होते हैं जो बीमारियां फैलाते हैं। चिकित्सा विशेषज्ञों ने बार-बार चेतावनी दी है कि खुला खून और मांस संक्रमण को तेजी से बढ़ाते हैं। इससे पीने का पानी दूषित हो जाता है और पानी से होने वाली बीमारियां फैलने का खतरा रहता है।

यह मामला सिर्फ गंदगी से जुड़ा नहीं है बल्कि स्वास्थ्य से जुड़ा एक बड़ा संकट है। गर्मी के मौसम में पशुओं का खून और मांस कुछ ही घंटों में सड़ने लगते हैं। आंतों के कचरे में हानिकारक परजीवी और बैक्टीरिया होते हैं। खुले में कचरा फेंकने से मक्खियां और कीड़े तेजी से बढ़ते हैं।

यही मक्खियां बाद में हमारे घरों और खाने पर बैठती हैं। आवारा कुत्ते और चूहे इन अवशेषों को एक जगह से दूसरी जगह खींचकर ले जाते हैं। इससे संक्रमण और बढ़ता है। ऐसे स्थानों के आसपास खेलने वाले बच्चों को सबसे ज्यादा खतरा होता है। श्रीनगर, बारामूला,अनंतनाग और सोपोर जैसे घने बसे शहरों में यह लापरवाही पूरे मोहल्ले को बीमारी का केंद्र बना देती है।

सबसे बड़ा खतरा पानी के दूषित होने का है। कश्मीर की पुरानी बस्तियां पारंपरिक रूप से चश्मों और नदियों के किनारे बसी हैं जिन्हें स्थानीय भाषा में कुल, नाला या नाग कहा जाता है। जब कुर्बानी का कचरा इनमें डाला जाता है तो प्रदूषण दूर तक फैल जाता है।

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खून और सड़ते हुए जैविक कचरे के कारण पानी में ऑक्सीजन का स्तर कम हो जाता है। इससे जलीय जीवन को नुकसान पहुंचता है। दूषित पानी का असर तुरंत दिखाई नहीं देता जिससे खतरा और बढ़ जाता है। लोग कई दिनों तक अनजाने में वह गंदा पानी पीते रहते हैं जिसके बाद अचानक बीमारी फैलती है। डॉक्टरों और पर्यावरण विशेषज्ञों ने साफ कहा है कि जमीन के ऊपर और नीचे का पानी इस लापरवाही से खराब हो रहा है।

इसके सामाजिक परिणाम भी बहुत चिंताजनक हैं। कश्मीर को हमेशा से उसकी स्वच्छता, मेहमाननवाज़ी और बेहतरीन संस्कृति के लिए सराहा गया है। लोग इस घाटी को सिर्फ पहाड़ों की वजह से ही जन्नत नहीं कहते थे, बल्कि यहां के समाज के अनुशासन को देखकर भी प्रभावित होते थे।

लेकिन अब ईद के दौरान कई इलाकों में नजारा बिल्कुल उलट होता है। सड़कों पर बिखरी आंतें, सड़ती हुई खालें और नालियों में बहता खून इस सांस्कृतिक विरासत को ठेस पहुंचाता है। इसका बच्चों के दिमाग पर भी बुरा असर पड़ता है। वे सार्वजनिक जगहों को कचरा घर के रूप में देखने के आदी हो जाते हैं। धीरे-धीरे समाज स्वच्छता और नागरिक अधिकारों के प्रति अपनी संवेदनशीलता खोने लगता है।

यह स्थिति धार्मिक सिद्धांतों और हमारे व्यवहार के बीच के अंतर्विरोध को भी दिखाती है। कुर्बानी का असली मतलब आज्ञाकारिता, विनम्रता और आत्मा की शुद्धि है। पवित्र कुरान में भी कहा गया है कि खुदा तक न तो मांस पहुंचता है और न ही खून, बल्कि केवल इंसान का तकवा यानी परहेजगारी पहुंचती है।

इसके बावजूद अगर हमारे इस काम से समाज में गंदगी फैलती है, पड़ोसियों को तकलीफ होती है और स्वास्थ्य को खतरा होता है, तो इस इबादत का मूल भाव ही खत्म हो जाता है। इस्लाम में स्वच्छता और जन कल्याण पर बहुत जोर दिया गया है। एक तरफ धार्मिक भावना की बात करना और दूसरी तरफ सार्वजनिक जगहों पर गंदगी छोड़ देना हमारी नैतिक जिम्मेदारी की कमी को दर्शाता है।

भेड़ों की खालों को खुले में फेंकना एक और बड़ी समस्या बन चुका है। पहले के समय में इन खालों की आर्थिक कीमत होती थी। लोग इन्हें व्यापार या दान के लिए इकट्ठा करते थे। लेकिन अब स्थानीय स्तर पर चमड़े के कारोबार में कमी आने के कारण इन खालों को सड़कों पर ही छोड़ दिया जाता है।

धूप में सड़ने के बाद इनसे असहनीय बदबू आती है। नगर निगम के अधिकारी लगातार लोगों से अपील करते हैं कि वे इन्हें तय जगहों पर ही डालें। फिर भी जागरूकता की कमी और कड़े नियमों के न होने से यह ढर्रा जारी है।

इस वजह से कश्मीर के पहले से ही कमजोर कचरा प्रबंधन तंत्र पर भारी दबाव पड़ता है। कश्मीर की नगरपालिकाएं बढ़ती आबादी और शहरीकरण के कारण पहले ही कचरा संभालने में परेशान हैं। ईद के दौरान अचानक हजारों टन अतिरिक्त जैविक कचरा जमा हो जाता है।

इसके चलते कई दिनों तक कूड़ा नहीं उठ पाता है। श्रीनगर से आने वाली रिपोर्ट बताती हैं कि इस दौरान सामान्य कूड़ा उठाने की व्यवस्था भी ठप हो जाती है। इससे साफ है कि हमें सिर्फ त्योहार के समय अस्थायी इंतजाम करने के बजाय एक स्थायी और वैज्ञानिक व्यवस्था बनाने की जरूरत है।

इसके आर्थिक नुकसान भी हैं जिन्हें हम नजरअंदाज कर देते हैं। कश्मीर की अर्थव्यवस्था मुख्य रूप से पर्यटन पर टिकी है। सैलानी यहां की साफ-सफाई और प्राकृतिक सुंदरता देखने आते हैं। सड़कों और पर्यटन स्थलों के पास बिखरा कचरा कश्मीर की छवि को खराब करता है।

यहां की झीलें और दलदली इलाके पहले से ही प्रदूषण की मार झेल रहे हैं। ऐसे में पशुओं का यह अपशिष्ट पर्यावरण के संकट को और बढ़ा देता है। ग्रामीण इलाकों में स्थिति ज्यादा खराब है क्योंकि वहां कचरा उठाने की कोई नियमित व्यवस्था नहीं है। लोग मजबूरन कचरे को बागों या खेतों में फेंक देते हैं।

हालांकि इस पूरी समस्या के लिए केवल आम जनता को जिम्मेदार नहीं ठहराया जा सकता है। हमारी सरकारी संस्थाओं को भी अपनी जिम्मेदारी माननी होगी। कई गांवों में आज भी कचरा निपटान का कोई जरिया नहीं है। लोगों को पता ही नहीं होता कि वे इस कचरे को कहां ले जाएं।

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हाल के दिनों में नगर निकायों ने गाड़ियों और वार्ड स्तर पर कलेक्शन पॉइंट बनाने की कोशिश की है। यह प्रयास अच्छे हैं लेकिन ये सिर्फ त्योहार के दिनों तक ही सीमित रहते हैं। कश्मीर को अब रेफ्रिजेरेटेड कलेक्शन वैन, कंपोस्टिंग प्लांट और नियमों का उल्लंघन करने वालों पर सख्त जुर्माने की जरूरत है।

इस बदलाव में हमारी धार्मिक संस्थाएं बहुत बड़ी भूमिका निभा सकती हैं। ईद की नमाज से पहले दिए जाने वाले खुतबे यानी भाषणों में सिर्फ त्याग की कहानी ही नहीं, बल्कि सफाई की जिम्मेदारी पर भी बात होनी चाहिए। इमामों और मस्जिद कमेटियों को समाज को यह समझाना होगा कि गंदगी फैलाना एक नैतिक और धार्मिक अपराध है। कश्मीर जैसे समाज में जहां धार्मिक बातों का गहरा असर होता है, वहां ऐसी सीख लोगों के व्यवहार को बदल सकती है।

आखिर में यह मामला सिर्फ सफाई तक सीमित नहीं है। यह इस बात का पैमाना है कि हम कैसा समाज बनना चाहते हैं। जो समाज खुद को आध्यात्मिक रूप से संवेदनशील मानता है, वह पर्यावरण की इस तबाही को चुपचाप नहीं देख सकता। जिस घाटी ने सूफियों और संतों को प्रेरित किया, वहां की सड़कों पर बहता खून और सड़ते अवशेष सामान्य बात नहीं हो सकते। सच्ची कुर्बानी केवल पशु की बलि देने से पूरी नहीं होती, बल्कि वह तब पूरी मानी जाएगी जब हमारे पीछे समाज के लिए करुणा, गरिमा और स्वच्छता बचे।

कश्मीर आज एक बेहद नाजुक मोड़ पर खड़ा है। हम चाहे तो हर साल ईद को एक पर्यावरणीय संकट बना दें या फिर इसे एक अनुशासित और जागरूक समाज के उदाहरण के रूप में पेश करें। यह फैसला सरकार से ज्यादा हर उस नागरिक को करना है जो इस मिट्टी से प्यार करता है।