ज़ेबा नसीम
“सुबह के वक्त हम अमन के शहर मक्का पहुंचे। अल्लाह इसकी इज्जत बुलंद करे।”
करीब सात सौ साल पहले लिखी गई यह पंक्ति आज भी दिल को छू लेती है। यह शब्द मशहूर मुस्लिम यात्री इब्न बतूता के हैं। वह मोरक्को से हजारों किलोमीटर का सफर तय करके 1326में मक्का पहुंचे थे। उस दौर में न जहाज थे, न आधुनिक सड़कें और न आरामदेह साधन। रास्ते में रेगिस्तान थे। बीमारियां थीं। लुटेरों का डर था। फिर भी दिल में सिर्फ एक ख्वाहिश थी। हज।
दुनिया में हजारों यात्राएं लिखी गईं। राजाओं की यात्राएं। खोजकर्ताओं के सफर। समुद्री अभियान। लेकिन हज के सफरनामों की बात अलग है। इनमें सिर्फ रास्तों का जिक्र नहीं होता। इनमें इंसान का दिल बोलता है। आस्था बोलती है। तड़प बोलती है। यही वजह है कि सदियों बाद भी ये सफरनामे पढ़े जाते हैं।
इब्न बतूता जब मदीना पहुंचे तो वहां चार दिन रुके। उन्होंने सफेद एहराम पहना। फिर मक्का की ओर रवाना हुए। काबा को पहली बार देखने का मंज़र उन्होंने जिस अंदाज में लिखा, वह आज भी रूह को छू लेता है। उन्होंने लिखा कि हमने काबा का तवाफ किया। हजरे अस्वद को चूमा। मकामे इब्राहीम पर नमाज पढ़ी। जमजम का पानी पिया और सफा मरवा के बीच सई की।

उनकी डायरी सिर्फ इबादत का बयान नहीं थी। वह उस दौर की दुनिया का आईना भी थी। उस वक्त के रास्ते। शहर। लोग। खानपान। काफिले। सब कुछ इन सफरनामों में दर्ज है।असल में हज का सफर हमेशा सिर्फ एक धार्मिक फर्ज नहीं रहा। यह इंसान के अंदर की दुनिया बदलने वाला अनुभव भी रहा है। शायद यही वजह है कि जो भी पढ़ा लिखा इंसान हज से लौटता था, वह इस सफर को शब्दों में कैद करना चाहता था।
बारहवीं सदी में स्पेन के मशहूर यात्री इब्न जुबैर ने भी ऐसा ही किया। उन्होंने अंदलुस से मक्का तक का सफर लिखा। समुद्री तूफानों का जिक्र किया। रास्ते की परेशानियां लिखीं। फिर एहराम, अराफात, जमरात और तवाफ के मंज़र बयान किए। उनकी भाषा में एक अजीब सी रूहानियत थी।
फिर चौदहवीं सदी में मशहूर आलिम इब्न कय्यिम अल जौज़िया ने हज पर एक लंबी नज्म लिखी। इसमें उन्होंने सिर्फ रास्ते की थकान नहीं लिखी बल्कि दिल की हालत भी बयान की। उन्होंने लिखा कि हाजी धूल से भरे बालों और थके चेहरों के साथ सफर कर रहे हैं लेकिन उनके दिल दुनिया की हर खुशी से ज्यादा मुतमइन हैं।
वह लिखते हैं कि जब हाजी पहली बार काबा को देखते हैं तो उनकी सारी थकान खत्म हो जाती है। ऐसा लगता है जैसे सदियों की तलाश पूरी हो गई हो।हज के सफरनामे सिर्फ मुस्लिम लेखकों तक सीमित नहीं रहे। दुनिया के दूसरे हिस्सों से आए लोगों ने भी इस अनुभव को समझने की कोशिश की।
अमेरिका के मशहूर मानवाधिकार नेता मैल्कम एक्स 1964में हज पर गए थे। उस सफर ने उनकी सोच बदल दी। उन्होंने वहां हर रंग और नस्ल के लोगों को एक साथ देखा। गोरे। काले। एशियाई। अफ्रीकी। सब एक ही कपड़े में। सब एक ही सफ में।
अमेरिका लौटकर उन्होंने लिखा कि मैंने पहली बार इंसानों को बिना नस्ल और रंग के फर्क के साथ खड़े देखा। उनके लिए यह सिर्फ धार्मिक यात्रा नहीं थी बल्कि इंसानी बराबरी का सबसे बड़ा सबक था।उन्नीसवीं सदी में ब्रिटिश यात्री रिचर्ड फ्रांसिस बर्टन ने भी मक्का का सफर किया। उस दौर में गैर मुस्लिमों का मक्का जाना मुमकिन नहीं था। इसलिए उन्होंने अपनी पहचान छिपाई और एक दरवेश के रूप में वहां पहुंचे। बाद में उन्होंने अपने अनुभव लिखे।
उन्होंने मक्का की गलियों। मस्जिदे हरम। हाजियों की भीड़ और वहां के माहौल को बेहद दिलचस्प तरीके से बयान किया। उनकी किताब पश्चिमी दुनिया में बहुत चर्चित हुई।इसके बाद एल्डन रटर नाम के एक और ब्रिटिश लेखक ने मक्का और मदीना का सफर लिखा। उन्होंने फज्र की नमाज का ऐसा दृश्य खींचा जिसे पढ़कर लगता है कि आंखों के सामने पूरा मंज़र जिंदा हो गया हो। वह लिखते हैं कि सुबह की हल्की रोशनी में काबा काले गिलाफ में ढका हुआ खड़ा था और चारों तरफ नमाजियों की कतारें बन रही थीं।
हज के सफरनामों की सबसे बड़ी खूबी यही है कि इनमें सिर्फ धार्मिक रस्में नहीं मिलतीं। इनमें इंसानी एहसास मिलते हैं। घर छोड़ने का दर्द। रास्ते की मुश्किलें। पहली बार काबा को देखने की खुशी। अराफात में दुआ करते लोगों की आंखों के आंसू। यह सब इन किताबों में सांस लेता दिखाई देता है।
आधुनिक दौर में भी यह परंपरा खत्म नहीं हुई। मिस्र की मशहूर लेखिका बिंत अल शाती ने अपने हज अनुभव लिखे। कई अरब और एशियाई लेखकों ने भी हज पर किताबें लिखीं। इन लेखों में सिर्फ इबादत नहीं बल्कि समाज और संस्कृति की झलक भी दिखाई देती है।
दरअसल हज दुनिया का शायद सबसे बड़ा सालाना मानवीय जमावड़ा है। यहां भाषा अलग होती है। रंग अलग होते हैं। देश अलग होते हैं। लेकिन मकसद एक होता है। यही बात लेखकों और कलाकारों को सबसे ज्यादा प्रभावित करती है।

इसीलिए हज पर सिर्फ किताबें ही नहीं लिखी गईं। पेंटिंग बनीं। कविताएं लिखी गईं। नज्में कही गईं। संगीत रचा गया। हर दौर के कलाकार ने इसे अपने अंदाज में महसूस किया।आज जब दुनिया बहुत तेज हो गई है और लोग छोटी छोटी चीजें पढ़कर आगे बढ़ जाते हैं, तब भी हज के पुराने सफरनामे लोगों को अपनी तरफ खींचते हैं। वजह साफ है। इनमें इंसान का असली दिल मौजूद है।
इन सफरनामों को पढ़ते हुए सिर्फ मक्का और मदीना का रास्ता नहीं दिखता बल्कि सदियों पुरानी मुस्लिम दुनिया की झलक भी मिलती है। उस दौर के बाजार। कारवां। जहाज। खानकाहें। मस्जिदें। सब कुछ इन पन्नों में जिंदा है।
इतिहासकार मानते हैं कि हज के ये सफरनामे सिर्फ धार्मिक दस्तावेज नहीं हैं। ये सामाजिक और सांस्कृतिक इतिहास का बड़ा खजाना हैं। इनके जरिए अलग अलग दौर की मुस्लिम दुनिया को समझा जा सकता है। शायद यही वजह है कि सात सौ साल बाद भी इब्न बतूता की वह पंक्ति आज ताजा लगती है जिसमें उन्होंने मक्का पहुंचने की खुशी लिखी थी। क्योंकि हज सिर्फ मंजिल तक पहुंचने का नाम नहीं है। यह इंसान के अंदर शुरू होने वाले एक नए सफर का नाम भी है।