पीड़ित की भाषा का मनोविज्ञान

Story by  मलिक असगर हाशमी | Published by  [email protected] • 7 Months ago
पीड़ित की भाषा का मनोविज्ञान

फैयाज अहमद फैजी

अक्सर पसमांदा अंदोलन और उससे जुड़े लोगों पर यह आरोप लगता रहा है कि ये अपने दमनकारी,उत्पीड़क अशराफ की आलोचना करने में बहुत ही अभद्र और कड़वी भाषा का इस्तेमाल करते हैं, जो गुफ्तगू के आदाब (वार्तालाप के शिष्टाचार) के खिलाफ ह. सभ्यता और शालीनता की दृष्टि से भी उचित नहीं. जबकि स्वयं अल्लाह ने कुरआन (इस्लाम धर्म का पवित्र ग्रन्थ जिसको ईश्वर की वाणी माना जाता है) में मजलूम, पीड़ित को अभद्र और कड़वी भाषा के प्रयोग की इजाजत दी गई है. ताकि वो अपने दमनकारी, शोषण के विरुद्ध आवाज उठाने के लिए ऐसी भाषा का प्रयोग करने में तनिक भी संकोच ना करें.

कुरआन की सुरः निसा आयात न० 148 में लिखा ह, “ अल्लाह को यह प्रिय नहीं कि कोई बुरी बात(अभद्र भाषा) प्रकट करे मगर जिसपर अत्यचार हुआ हो.” अर्थात अत्याचार और उत्पीड़न की शर्त पर इस बात की आज्ञा है कि पीड़ित व्यक्ति और पीड़ित समाज दमनकारी की क्रूरता का पर्दाफाश करने के लिए अपशब्द या बुरे बोल का चयन कर सकता है.

मुहम्मद(स०) के कथनों और क्रियाकलापों (हदीस) की प्रसिद्ध संकलन “सहीह मुस्लिम” के हदीस संख्या 2587में लिखा है कि, “अपशब्द (गाली गलौज) कहने वाले दो लोग कुछ भी बुरा कहें उसका पाप अपशब्द में पहल करने वाले पर है.”

इस हदीस से भी यह बात सिद्ध हो जाता है कि प्रतिउत्तर में अभद्र,बुरा,अपशब्द कहने वाले अनैतिक नहीं हैं.मुहम्मद(स०) के कथनों और क्रियाकलापों (हदीस) की एक अन्य प्रसिद्ध संकलन ‘अबु दाऊद’ के हदीस संख्या 5153में लिखा है कि एक बार एक आदमी मुहम्मद(स०) से अपने पड़ोसी की शिकायत करता है कि मेरा पड़ोसी मुझे सताता है.

इस पर उन्होंने कहा कि तुम संयम से काम लो, फिर जब दो-तीन बार शिकायत लेकर पहंुचा तो मुहम्मद(स०) ने उससे कहा, “तुम अपने घर का सामान बाहर निकाल कर रास्ते पर रख दो, अगर लोग पूछे तो अपने पड़ोसी द्वारा परेशान किए जाने की बात बताना.

उसने फिर वैसा ही किया. जो भी उधर से गुजरता उससे पूछता, वह पड़ोसी के अत्याचारी रवय्ये को विस्तार से बताता. जिसे सुन कर हर गुजरनेवाला पड़ोसी को फटकार और धिक्कार के अपशब्द कहता.ऐसी परिस्तिथि में पड़ोसी ने भविष्य में अत्याचार नही करने का वादा करते हुए माफी मांग लिया. सारे सामान घर के अंदर रखने का अनुरोध किया.

इस हदीस से यह बात साबित होती है कि जुल्म और अत्याचार के खिलाफ एक सीमा तक ही संयम रखना चाहिए. उसके बाद खुल कर सरे बाजार अत्याचार को परिभाषित और व्याखित करते हुए समाज के सामने लाना चाहिए, ताकि समाज भी उसको बुरा कहे. इसके दो फायदे हैं.

पहला कि शायद समाज के डर या लज्जा से वो सुधर जाए और दूसरा यह कि समाज उससे बच के रहे. कुरआन और हदीस के विवरण में स्पष्ट रूप से अत्याचार को बुरा कहने का प्रशिक्षण दिया जा रहा है. कड़वी और अभद्र भाषा तो बहुत दूर की बात हो गई.

इसी संदर्भ में प्रथम पसमांदा आंदोलन के जनक आसिम बिहारी (1890-1953) की एक स्पीच बहुत महत्वपूर्ण है, जिसका विवरण इस प्रकार है. जब आसिम बिहारी अपने एक दौरे के दौरान पहली मार्च 1927ई० को प्रयागराज (पूर्ववर्ती नाम इलाहाबाद) पहुंचते हैं तो अपने सम्मान में होने वाले समारोह जिसमें आप को फख्र-ए- कौम (समाज का गौरव) और कौम के रुक्न-ए-आजम

(समाज का महान स्तंभ) जैसे विशेषणों के साथ लोगों से परिचित कराया जाता है. आप के सम्मान में एक स्वागत गीत भी पढ़ा जाता है. इस मौके पर अपने पौने दो घंटे के लंबे भाषण (ट्रैन का समय करीब होने के कारण भाषण जल्दी खत्म करना पड़ा) के दौरान 20साल के अनुभव के आधार पर यह सच्चाई खोल कर बताया कि वक्ता के सम्मान में बोले गए प्रशंसा के शब्द ना सिर्फ उसके लिए बल्कि कभी-कभी पूरे समाज के लिए भयंकर तबाही का कारण बन जाता है.

बड़ी स्पष्ठता से अपनी कम-हैसियत(अक्षमता) का इजहार करने के बाद प्रबंधन और एकता को क्रियान्वित करने का निर्देश दिया. इसके बाद कहने-सुनने के अपने 20वर्षों की आदत की चर्चा करते हुए अपने विशेष मजाकिया शैली में कहते हैं-

“मगर यहां तो इसकी भी हिम्मत नहीं पड़ती है, क्योंकि यह स्थान यूपी सरकार का मुख्यालय ह. आप सम्मानित लोग उर्दू के भाषाविद, सुस्पष्ट और मनोरम उर्दू पर महारत रखने वाले हैं, मैं पूरब का रहने वाला ‘चावल’ खाता हूं.

गलत उर्दू बोलता हूं, लेकिन मुझको उम्मीद है कि आप सम्मानित लोग मेरे शब्दों के बजाय मेरी अंतरात्मा पर दृष्टि रखेंगे, क्योंकि बेचैनी से रोने वाले की आवाज रागनियों के अनुसार नहीं होती. आग लगने के बाद की पुकार में उच्च साहित्य की खोज नहीं की जा सकती.

इसके बाद फारसी के कवि जामी की पंक्तियां पढ़ते हैं जिसका भावार्थ यह है -

 

       

         तू  ऐ  बहादुर  और  दिलेर  पक्षी

        तेरा ठिकाना इस भूमि के बाहर हो गया

         क्योंकि तू भूमि से अजनबी हो गया

         तू इसे नष्ट होता कैसे पसंद कर सकता है

         उठो अपने बाल व पर की मिट्टी झाड़ो

     ताकि आसमानों की ऊंचाई तक पहुँच सको

(अल इकराम, 15अप्रैल 1927, जिल्द-2नम्बर 6-7, पेज न० 40, बंदये मोमिन का हाथ, प्रो० अहमद सज्जाद पेज नं 167)आसिम बिहारी का उपर्युक्त भाषण शोषितों, पीड़ितों  और वंचितों की भाषा के दिशा निर्देश का एक सम्पूर्ण दस्तावेज है.

वंचित एफ्रो-अमेरिकन की लड़ाई लड़ने वाले विलियम लॉयड गैरिसन (1805-1879) ने अपनी पत्रिका द लिबेरेटर(आजादी दिलाने वाला) में इस महत्वपूर्ण सवाल के जवाब में लगभग ऐसी ही बात लिखी है-

मुझे पता है कि मेरी कठोर भाषा पर बहुत सी आपत्तियां हैं, लेकिन क्या इस कठोरता के कारण नहीं है?मैं उतना ही कठोर रहूंगा जितना कि सच, उतना ही असम्मत, जिद्दी और हठी रहूंगा जितना कि न्याय. और मैं इस विषय पर नर्मी और संयम से सोच, बोल और लिख नहीं सकता, नहीं! नहीं!

उस आदमी से कहिए जिसके घर में आग लगी हो कि संयम और उदारता से पुकारे, उससे कहिए कि वो बड़ी उदारता के साथ बलात्कारियों से अपनी पत्नी को छुड़ाए, उस मां से कहिए कि अपने बच्चे को धीरे-धीरे उस आग से निकाले जिसमें वो गिरा हुआ है. लेकिन मौजूदा कारणों के लिए मुझसे उदारता और संयम का आग्रह ना करें.

मैं खरा हूं. गोलमोल बात नहीं करूंगा. मैं एक इंच भी पीछे नहीं हटूंगा और मैं जरूर सुना जाउंगा.पीड़ित और अत्यचारी की भाषा पर बात करते हुए रोलैंड जेरार्ड बार्थेस (1915-1980) अपनी मशहूर किताब मयथोलॉजीज के पेज न० 150पर लिखता ..“पीड़ित के पास उसके मुक्ति,उद्धार के लिए उसकी भाषा के अतिरिक्त कुछ भी नहीं है.

दमनकारी के पास सब कुछ है. उसकी समस्याओं के निराकरण के लिए उसकी भाषा गरिमा की सभी संभावित आयामों के साथ, समृद्ध, बहुमुखी, लचीला और नरम है. उसके पास दूसरी भाषाओं या दूसरे की भाषाओं का निरूपण और विश्लेषण करने का विशेषाधिकार भी है.

पीड़ित दुनिया को बनाता है, उसके पास केवल एक सक्रिय, सकर्मक (प्राकृतिक) भाषा है. अत्यचारी अपनी भाषा को पूर्ण(समग्र), अकर्मक, सांकेतिक, नाटकीय, जो कि एक मिथक है, बता कर उसको संरक्षित करता है. पहले वाले की भाषा का उद्देश्य परिवर्तन है, जबकि बाद वाले की भाषा का उद्देश्य उसे शाश्वत एवं अविनाशी बनाना है.”

भाषा के इस बहस में जय प्रकाश फाकिर साहब की बात करना जरूरी है। लिखते हैं-“तंज(व्यंग्य) वाली भाषा मूलतः अत्याचारियों की भाषा है. व्यंग्य ब्राह्मणवादी,अशराफवादी भाषा का आविष्कार है. इसमें किसी को चोट पहुंचा कर उससे सैडिस्ट कंपेज (दूसरे को दर्द या अपमानित करके प्रसन्नता, विशेषरूप से यौनसुख प्राप्त करना) आनंद लेना और साथ ही उस व्यक्ति से इच्छित प्रतिक्रिया हासिल करना उद्देश्य होता है.

बाबा कबीर साहेब कहते हैं, “पांडे मैं कहता सुरझाई तू कहता सुरझाई रे” उलझी हुई व्यंग्यपूर्ण भाषा पांडे की विशेषता है. चूंकि भाषा पर पांडे का वर्चस्व है. हम भी ऐसी भाषा प्रयोग करते हैं. मगर यह है तो सैडिस्ट भाषा ही.

हम भाषा नहीं बोलते, बल्कि भाषा भी हमें बोलती है. हिंदी में स्त्री वाचक बनाने के प्रत्यय वही है जो ऊनार्थक(निम्न,कम अर्थ) बनाने के है. जैसे चुहिया और लुटिया. यानी हिंदी व्याकरण में स्त्री न्यून यानी कमतर है. फिर भी मुझे लुटिया शब्द का छोटे लोटे के रूप में प्रयोग करना पड़ता है. संरचना-गत विषमता से लड़ने के औजार जटिल होते हैं. रोलैंड बार्थेस लिखता है-“पीड़ित की भाषा अपरिष्कृत, सीधी और  प्राकृतिक है, जबकि दमनकारी की भाषा अप्रत्यक्ष, कलात्मक अप्राकृतिक है.”

एक तर्क और दिया जाता है कि सारे अशराफ बुरे नहीं हैं. सब को एक ही केटेगरी में नहीं रखा जा सकता. इस तर्क के जवाब में विश्व प्रसिद्ध और एफ्रो-अमेरिकन सामाजिक न्याय के साथी, बॉक्सर मुहम्मद अली क्ले (1942-2016) की बात नकल कर देना उचित है, जो उन्होंने टीवी शो ब्रिटिश चौट शो “पार्किंसन” 1971, में एक साक्षात्कार के दौरान सवाल करते हुए कहा था-

“ऐसे बहुत से गोरे लोग हैं जो अच्छे हैं और दिल से अच्छा करना चाहते हैं. अगर 10हजार सांप उतर कर मेरे गलियारे की तरफ आ रहे हैं, और मेरे पास एक दरवाजा है जिसे मैं बंद कर सकता हूं, और उन 10हजार जहरीले सांपों में एक हजार अच्छे सांप है, जो मुझे डसना नहीं चाहते हैं और मैं जानता भी हूं कि वो अच्छे हैं, तो क्या मुझे उन सभी जहरीले सांपों को नीचे आने देना चाहिए.

इस उम्मीद में कि वो एक हजार साथ मिलकर मेरे लिए एक ढाल बना लेंगे? या मुझे अपना दरवाजा बंद करके सुरक्षित हो जाना चाहिए ?मुहम्मद अली क्ले के इस सवाल को सामने रखते हुए पसमांदा अंदोलन को स्वयं पर भरोसा रखते हुए आगे बढ़ने का जतन करना चाहिए.

उपर्युक्त  धार्मिक, नैतिक एवं सामाजिक न्याय की लड़ाई लड़ने वालों के अनुभवों और व्यक्तव्यों के विवरण के आधार पर यह स्पष्ट हो जाता है कि पसमांदा अंदोलन और उससे जुड़े लोगों की भाषा सामाजिक न्याय के संघर्ष के अनुरूप नैतिकता के दायरे में है और दमनकारियों की ओर से लगाया जाने वाला आरोप बे बुनियाद है. वो ऐसा सिर्फ आंदोलन को दिग्भ्रमित करने के लिए कर रहे हैं.

आभारी हूं राष्ट्रपति पुरस्कार से सम्मानित हजरत मौलाना प्रो डॉ मसूद आलम फलाही और जय प्रकाश फकीर का. आभार व्यक्त करता हूं जिनके वैचारिक दिशा निर्देश ने इस लेख को वजूद में लाने में महती भूमिका निभाई.

( लेखक अनुवादक, स्तंभकार,मीडिया पैनलिस्ट, सामाजिक कार्यकर्ता और पेशे से चिकित्सक हैं. )