ऑपरेशन गंगा’ - जटिल मानवीय ऑपरेशन की दास्तान

Story by  मलिक असगर हाशमी | Published by  [email protected] • 9 Months ago
ऑपरेशन गंगा’ - जटिल मानवीय ऑपरेशन की दास्तान

श्याम जाजू

हाल में सकुशल समाप्त हुए ऑपरेशन गंगा को भविष्य में एक ऐसी घटना के रूप में देखा जाएगा जिसमें नरेंद्र मोदी सरकार ने मानवीय, जनतांत्रिक, कूटनीतिक और साहस के सभी पैमानों पर खरा उतरते हुए न केवल देश के 22, 500 नागरिकों को बल्कि 18 अन्य देशों के 147 नागरिकों को भी बरसती मिसाइलों के बीच से सुरक्षित निकाल कर एक नया इतिहास रच दिया है.

यह सफलता ऐसी थी कि अपनी सरकार की उपलब्धियों पर बहुत ज्यादा कुछ नहीं कहने वाले प्रधानमंत्री ने यहां तक कहा कि ऑपरेशन गंगा पर एक फिल्म बनानी चाहिए. उन्होंने कहा कि जिस तरह से इतनी बड़ी चुनौती से इतने अच्छे ढंग से निपटा गया, उसको आने वाली पीढ़ियों को प्रेरित करने के लिए एक केस-स्टडी के रूप में प्रलेखित किया जाना चाहिए.

ऐसा नहीं कि इस तरह का रेस्क्यू ऑपरेशन पहली बार हुआ है. 1990 के कुवैत एयरलिफ्ट रेस्क्यू मिशन, 1996 के अरब देशों से किए गए एमनेस्टी मिशन, 2006 के लेबनान में फंसे भारतीयों को निकालने के ‘ऑपरेशन सुकून‘, 2011 में मिस्र और लीबिया से भारतीयों की सुरक्षित वापसी का अभियान, 2015 में सुषमा स्वराज के नेतृत्व में यमन में चलाया गया अत्यंत सफल ‘ऑपरेशन राहत‘, 2016 में सूडान से ‘ऑपरेशन संकट मोचन‘, 2020 में कोविड के दौर में पहले विश्व-व्यापी ‘वन्दे भारत‘ अभियान, अफगानिस्तान में फंसे भारतीयों के लिए 2021 में ऑपरेशन ‘देवी शक्ति‘ आदि लगभग 30 अभियान अभी तक हुए हैं.

फिर ऐसा क्या था ऑपरेशन गंगा में कि प्रधानमंत्री को इस पर फिल्म तक बनाने को कहना पड़ा  ? यह ऑपरेशन पहले के अन्य मिशन की तुलना में अत्यंत जटिल था. यूक्रेन से भारतीय छात्रों को लाना आसान नहीं था.

चारों तरफ, बम और मिसाइल बरस रहे थे. सैकड़ों छात्र बर्फ पिघलाकर प्यास बुझाने को मजबूर और भोजन की कमी झेल रहे थे. युद्धग्रस्त यूक्रेन के ऊपर नो-फ्लाई जोन बना हुआ था. ऐसी प्रतिकूल परिस्थितियों में भारत ने जिस तरह से न केवल अपने 22,500 नागरिकों को सुरक्षित निकला, बल्कि अनेक अन्य देशों जिसमें अपने पड़ोसी देशों के अलावा अमेरिका, कनाडा और ब्रिटेन जैसे विकसित देशों के नागरिकों का प्रत्यावर्तन भी किया.

ऐसा किसी और देश का उदाहरण नहीं होगा जिसने इतनी गंभीरता से अपने नागरिकों को वापस लाने का काम किया. अन्य देश तो बाद में सक्रिय हुए. चीन की पहली उड़ान पांच मार्च को हुई. अमेरिका ने बोल दिया कि आप खुद निकल आइए हम आपकी मदद नहीं कर सकते.

न केवल हमने अपने नागरिकों को सुरक्षित निकला, युद्धग्रस्त यूक्रेन को 90 टन से अधिक राहत सामग्री भी भेजी. ये न केवल भारत की भावना बल्कि उसके मूल्यों को भी प्रदर्शित करता है. प्रधानमंत्री ने सही ही कहा, हम जहां भी रहते हैं, हम भारतीय वसुधैव कुटुम्बकम के अपने सदियों पुराने दर्शन से प्रेरित होकर मानवता के प्रति अपने मूल्यों और प्रतिबद्धता को कभी नहीं भूलते.

ऐसा पहली बार हुआ कि देश का पूरा शासन तंत्र - राजनीतिक, कूटनीतिक, रक्षा, प्रशासनिक और अनेकानेक स्वयंसेवी संस्थाएं एक साथ सक्रिय हुए और देश के प्रधानमंत्री एक अभिभावक की तरह देश के सभी बच्चों को सकुशल स्वदेश वापस लाने में जुट गए.

संयुक्त एवं अथक प्रयासों से यह इवैक्यूएशन संभव हुआ. विदेश मंत्री ने तो विश्राम तक नहीं किया. चौबीसों घंटे इस पर निगरानी रखी. प्रधानमंत्री कार्यालय, विदेश मंत्रालय और अन्य अधिकारियों ने दिन-रात मेहनत की.

यह देखना सुखद था कि देश का पूरा सरकारी तंत्र जिसमें न केवल विदेश और रक्षा मंत्रालय बल्कि लगभग सभी राज्यों और शहरों के प्रशासनिक अधिकारी, विमानन कंपनियां, स्वयंसेवी संस्थाएं मिशन-मोड में युद्धक्षेत्र में फंसे भारतीय नागरिकों को सकुशल निकालने में लग गए.

इतना ही नहीं, यूक्रेन और उसके नजदीकी देशों - पोलैंड, हंगरी, रोमानिया, स्लोवाकिया और जर्मनी जैसे देशों में रह रह प्रवासी भारतीयों ने भी आगे बढ़ कर इस अभियान में अपना योगदान दिया.यह देश की बढ़ती साख और प्रभाव का ही असर था कि पोलैंड जैसे देशों ने बिना वीसा और कागजों के भारतीयों के लिए अपने दरवाजे खोल दिए.

इतिहास में ऐसे दुर्लभ क्षण बहुत कम देखने को मिलते हैं जब चलते युद्ध के बीच हजारों नागरिकों को सुदूर देश से निकलने में पूरा देश जुट गया हो.ऐसा भी सिर्फ भारत ने ही दिखाया जहां न केवल चार मंत्री स्वयं रेस्क्यू अभियान का नेतृत्व करने युद्ध क्षेत्र के नजदीक पहुंच गए, बड़े छोटे जिलों के डीएम युद्धक्षेत्र में फंसे छात्रों के परिवार जनों को ढाढस बंधा रहे.

जहां विदेश मंत्री अपनी नींद और आराम की परवाह किए बगैर 24घंटे अभियान का संचालन कर रहे हों और देश का मुखिया युद्धग्रस्त प्रतिद्वंदियों और अनेक देशों के राष्ट्राध्यक्षों से 11बार बात करता हो, 4 दिन में 9 उच्च स्तरीय बैठक करता हो, सिर्फ ये सुनिश्चित करने के लिए कि देश का एक एक नागरिक सुरक्षित घर वापस आ जाए.

आज देश में एक विश्वास का माहौल बना है कि किसी भी संकट के समय भारत सरकार और लोकप्रिय प्रधानमंत्री हमारा सहारा बनेंगे. यह है ‘ऑपरेशन गंगा‘ का प्रभाव जो इसको अन्य मशीनों से अलग बनाता है.

प्रधानमंत्री मोदी ने अपने इस मिशन से राजनीति और राष्ट्रनीति साथ-साथ चल रहे हैं. देश का नेतृत्व करने वाले नेता के पास निश्चिय शक्ति और निर्णय शक्ति कोई भी मंजिल पार करने की क्षमता रखती है.

तेजी से बदलती हुई वैश्विक परिस्थितियां, बदलता हुआ ग्लोबल ऑडेर, कोरोना की बीमारी से बाहर निकलने वाला संक्रमण और ऐसे सभी चैलेंजेस को स्विकारते हुए आजादी के 75साल पूरे होने वाले इस वर्ष ने 30 लाख करोड़ रूपये से ज्यादा उत्पदों पर निमार्ण का टारगेट पूरा किया है.

180 करोड़ से ज्यादा वेक्सीन डोज देने वाला देश के रूप में विश्व में भारत की चर्चा हो रही है. घरेलू तरक्की व प्रगति के मापदंड़ों में नए-नए उछाल प्रस्थापित करने वाला देश विश्व में भी अपनी नई प्रतिभा, नया तेवर लेकर जो कीर्तिमान स्थापित कर रहा है उसमें ऑपरेशन गंगा अभियान ने हमारा माथा ऊंचा किया है.

लेखक भारतीय जनता पार्टी के पूर्व राष्ट्रीय उपाध्यक्ष हैं