अदिति भादुरी
ईरान में पिछले तीन हफ्तों से चल रहे विरोध प्रदर्शन इस समय एक अहम मोड़ पर पहुँच चुके हैं। 28दिसंबर 2025से शुरू हुए ये प्रदर्शन अब तक के सबसे बड़े और असाधारण आंदोलन माने जा रहे हैं। शुरुआत में ये प्रदर्शन महंगाई और बढ़ती कीमतों से परेशान व्यापारियों ने किए थे, लेकिन बहुत जल्द यह गुस्सा देश के अन्य शहरों, कस्बों और गाँवों तक फैल गया। देखते ही देखते पूरा देश इसकी चपेट में आ गया।
इन प्रदर्शनों के दौरान कानून-व्यवस्था से जुड़े अधिकारियों पर हमले हुए, कई इमारतों और मस्जिदों को आग लगा दी गई, सर्वोच्च नेता आयतुल्लाह खुमैनी की तस्वीरें जलाई गईं और शासन को उखाड़ फेंकने के नारे लगाए गए।

इसी बीच ऐसी खबरें भी सामने आईं कि इन प्रदर्शनों में विदेशी ताकतों की घुसपैठ हुई थी। इज़राइल की खुफिया एजेंसी मोसाद ने फ़ारसी भाषा में सोशल मीडिया पोस्ट कर ईरानियों से सड़कों पर उतरने की खुली अपील की और कहा कि वह केवल समर्थन ही नहीं कर रही, बल्कि “ज़मीन पर भी मौजूद है।” यह बयान प्रदर्शनों के शुरुआती दिनों में सामने आया।
स्थिति तब और गंभीर हो गई जब अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने चेतावनी दी कि अगर ईरानी सरकार प्रदर्शनकारियों पर हिंसा करेगी तो अमेरिका सैन्य कार्रवाई कर सकता है। ईरानी अधिकारियों का दावा है कि वे इराक सीमा से घुसपैठ की कोशिश करने वाले लोगों को पकड़ चुके हैं।
Unarmed Iranians pushed regime security forces to flee. Despite more than 30 deaths over 11 days, protesters are back in the streets from Mashhad to Shiraz, Tehran, and across 100 cities. This isn’t about prices or paychecks, it’s about a nation fed up with the entire regime. pic.twitter.com/8XgbQLpqA6
— Masih Alinejad 🏳️ (@AlinejadMasih) January 7, 2026
राष्ट्रपति महमूद पेशेश्कियान ने कहा कि जिन ताकतों ने पिछले साल इज़राइल के साथ 12दिन की जंग के दौरान ईरान पर हमला किया था, वही अब आर्थिक मुद्दों के बहाने देश में अशांति फैलाने की कोशिश कर रही हैं। उनका इशारा साफ तौर पर अमेरिका और इज़राइल की ओर था।
ईरान ने भी स्पष्ट किया कि अगर किसी विदेशी ताकत ने सैन्य हस्तक्षेप किया तो वह जवाबी हमला करेगा। भारी बल प्रयोग, इंटरनेट बंदी और सख्त कार्रवाई के बाद फिलहाल प्रदर्शन थमते हुए दिख रहे हैं, लेकिन रिपोर्टों के मुताबिक इसमें 2000से अधिक लोगों की जान जा चुकी है।

इस बीच ईरान, इज़राइल और अमेरिका के बीच पर्दे के पीछे बातचीत भी चल रही है। अमेरिका के खाड़ी सहयोगियों ने भी ईरान पर किसी हमले का विरोध किया है। राष्ट्रपति ट्रंप ने हाल ही में सोशल मीडिया पर ईरानी सरकार की सराहना करते हुए कहा कि उसने प्रदर्शनकारियों के खिलाफ मौत की सजा का इस्तेमाल नहीं किया। इससे यह संकेत मिलता है कि फिलहाल विदेशी हस्तक्षेप का खतरा टल गया है।
हालाँकि, इन तमाम घटनाओं के बीच एक बड़ा सवाल बना हुआ है,क्या ईरान में बदलाव की चाह रखने वालों के लिए अपदस्थ शाह के बेटे रज़ा पहलवी कोई समाधान हो सकते हैं?
रज़ा पहलवी, जिन्हें बिना किसी कानूनी आधार के “क्राउन प्रिंस” कहा जाता है, अमेरिका में रहते हैं। हाल के दिनों में उन्हें पश्चिमी मीडिया और सोशल मीडिया पर काफी जगह मिल रही है। वे खुद को ईरान की मौजूदा धार्मिक व्यवस्था का एकमात्र विकल्प बताते हैं और दावा करते हैं कि वही एक लोकतांत्रिक ईरान का नेतृत्व कर सकते हैं। वे अमेरिका से ईरानी सरकार को गिराने में मदद की अपील भी कर चुके हैं।
पश्चिम एशिया की राजनीति को समझने वालों के लिए यह नया नहीं है। पिछले एक दशक से अधिक समय से इज़राइली मीडिया में रज़ा पहलवी को ईरान का “वैध नेता” बताकर पेश किया जाता रहा है। ईरानी प्रवासी समुदाय के एक हिस्से में उनके समर्थक भी हैं।
हाल ही में रज़ा पहलवी ने अपने कथित भविष्य के एजेंडे की भी चर्चा की। उन्होंने कहा कि वे इज़राइल को मान्यता देंगे, ईरान के परमाणु कार्यक्रम को खत्म करेंगे और भारत से अच्छे संबंध बनाएँगे—हालाँकि भारत और ईरान के रिश्ते पहले से ही अच्छे हैं।
इसके बावजूद सच्चाई यह है कि रज़ा पहलवी ईरान की ज़मीन से पूरी तरह कटे हुए हैं। वे 1979की इस्लामी क्रांति से पहले ही देश छोड़ चुके थे। उनके समर्थक मुख्य रूप से विदेशों में रहने वाले राजशाही समर्थक ईरानी हैं। ईरान का विपक्ष खुद भी बुरी तरह बँटा हुआ है और वे केवल मौजूदा शासन के विरोध में ही एकजुट हैं।
Mr. Pahlavi, as the son of the Shah – an authoritarian ruler – are you the right person to bring freedom to Iran?
— Paul Ronzheimer (@ronzheimer) July 29, 2025
Watch my interview with Reza Pahlavi on the instability of the Islamist regime, his fight for freedom, and criticism of his father. pic.twitter.com/Il1fv2FBA7
दूसरी बात यह है कि ईरान की मौजूदा सरकार भले ही दबाव में हो, कमजोर और डगमगाती दिख रही हो, लेकिन वह खत्म नहीं हुई है। उसके पास मजबूत संस्थान हैं और एक बड़ा समर्थक वर्ग भी है। पश्चिमी मीडिया पूरी तस्वीर नहीं दिखा रहा। ईरान में पहले भी कई बार विरोध प्रदर्शन हुए हैं। यह आंदोलन जरूर बड़ा है, लेकिन अगर सरकार समझदारी से काम लेती है तो हालात को काबू में लाया जा सकता है।
तीसरी अहम बात यह है कि मौजूदा सरकार के खिलाफ नाराज़गी का मतलब यह नहीं कि लोग किसी पश्चिम और इज़राइल समर्थित नेता को स्वीकार करने के लिए तैयार हैं। बहुत से ईरानी अपनी सरकार की विदेशों में हथियारबंद गुटों को मदद देने की नीति के खिलाफ हैं, फिर भी वे फ़िलिस्तीन के मुद्दे पर संवेदनशील हैं। भावनात्मक गुस्से को राजनीतिक समर्थन समझना गलत होगा।
सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि 1979की क्रांति को देखने और उसमें हिस्सा लेने वाली पीढ़ी आज भी ज़िंदा है। उन्हें शाह के शासन की सख्ती, दमन और गुप्त पुलिस का दौर याद है। भले ही उस समय ईरान बाहर से आधुनिक और पश्चिमी दिखता था, लेकिन असल में वह एक पुलिस राज्य था,जहाँ लाखों मुखबिर और हजारों गुप्तचर थे। अमेरिका पर अत्यधिक निर्भरता थी, पश्चिमीकरण जबरन थोपा गया था, और तेल संपन्न देश होने के बावजूद अर्थव्यवस्था बुरी तरह बिगड़ी हुई थी।

आज के ईरानी मौजूदा सरकार से निराश जरूर हैं, लेकिन वे उस पुराने दौर की वापसी भी नहीं चाहते। रज़ा पहलवी अगर सत्ता में आते हैं तो यह केवल अमेरिका की मदद से ही संभव होगा, जिससे ईरान फिर से विदेशी निर्भरता में चला जाएगा—ठीक वैसे ही जैसे उनके पिता के समय था।यहां तक कि राष्ट्रपति ट्रंप ने भी सवाल उठाया है कि रज़ा पहलवी ईरानी जनता को कितने स्वीकार्य होंगे। यह बात उनकी अमेरिकी दूत स्टीव विटकॉफ के साथ बैठक के बाद सामने आई।
इतिहास यह सिखाता है कि शासन परिवर्तन तभी सफल होता है जब वह देश के भीतर से स्वाभाविक रूप से उभरे। बाहरी ताकतों द्वारा थोपा गया बदलाव अक्सर अराजकता और अस्थिरता लाता है। अरब स्प्रिंग इसका बड़ा उदाहरण है।
रज़ा पहलवी न तो बांग्लादेश के मोहम्मद यूनुस हो सकते हैं और न ही अफगानिस्तान के राजा ज़ाहिर शाह। पश्चिमी सहारे से उनकी वापसी शायद ईरान को धार्मिक शासन से मुक्त कर दे, लेकिन उसे फिर से अमेरिका और इज़राइल पर निर्भर बना देगी। यह बहुत संदिग्ध है कि ईरानी जनता ऐसा भविष्य चाहती है।