जमाअत-ए-इस्लामी हिंद (जेआईएच) ने केंद्रीय बजट 2026–27 के लिए भारत सरकार के वित्त मंत्रालय को एक व्यापक, विचारोत्तेजक और दूरदर्शी नीतिगत ज्ञापन प्रस्तुत किया है। यह ज्ञापन केवल परंपरागत बजटीय सुझावों तक सीमित नहीं है, बल्कि यह भारत की अर्थव्यवस्था के सामने मौजूद गहरे संरचनात्मक प्रश्नों-रोज़गार संकट, बढ़ती असमानता, आय और संपत्ति के संकेंद्रण तथा कमजोर घरेलू मांग को केंद्र में रखकर तैयार किया गया है। इसका मूल उद्देश्य आर्थिक विकास को मात्र आंकड़ों की उपलब्धि तक सीमित न रखकर उसे रोज़गार, आय-सुरक्षा और सामाजिक न्याय में रूपांतरित करना है।

ज्ञापन में भारत के हालिया आर्थिक प्रदर्शन का संतुलित मूल्यांकन प्रस्तुत किया गया है। इसमें स्वीकार किया गया है कि देश ने पिछले वर्षों में निरंतर जीडीपी वृद्धि, वित्तीय बाज़ारों के विस्तार और कॉरपोरेट लाभप्रदता में वृद्धि के माध्यम से संपत्ति सृजन की उल्लेखनीय क्षमता प्रदर्शित की है। किंतु इसके साथ ही यह भी स्पष्ट किया गया है कि इस आर्थिक प्रगति का लाभ समाज के व्यापक वर्गों तक समान रूप से नहीं पहुँच पाया है।
विकास की रोज़गार-लोच में गिरावट, युवाओं में बढ़ती बेरोज़गारी, आय और संपत्ति का सीमित हाथों में सिमटना तथा आवश्यक वस्तुओं जैसे भोजन, स्वास्थ्य, आवास और शिक्षा पर घरेलू खर्च का बढ़ता बोझ इस बात की ओर संकेत करता है कि मौजूदा विकास मॉडल में गंभीर सुधार की आवश्यकता है।
इसी पृष्ठभूमि में जेआईएच ने वित्तीय नीति-निर्माण में रोज़गार को केंद्रीय मानक बनाने की आवश्यकता पर विशेष बल दिया है। ज्ञापन में यह सुझाव दिया गया है कि सार्वजनिक व्यय, प्रोत्साहन योजनाओं और बजटीय आवंटनों का मूल्यांकन केवल वित्तीय या भौतिक परिणामों के आधार पर नहीं, बल्कि उनके रोज़गार प्रभाव के आधार पर भी किया जाए।
इसके लिए ऐसे संस्थागत तंत्र विकसित करने की सिफारिश की गई है जो विभिन्न योजनाओं के श्रम-परिणामों का पूर्व और पश्चात आकलन कर सकें। शहरी क्षेत्रों में जलवायु-सहिष्णु अवसंरचना, नागरिक सेवाओं और देखभाल आधारित कार्यों पर केंद्रित लक्षित रोज़गार कार्यक्रमों की आवश्यकता रेखांकित की गई है, ताकि शहरी बेरोज़गारी और अनौपचारिकता की समस्या का समाधान हो सके।
ग्रामीण अर्थव्यवस्था के संदर्भ में, ज्ञापन एक स्थान-आधारित और ज़िला-स्तरीय विकास दृष्टिकोण का समर्थन करता है। इसका उद्देश्य कृषि पर अत्यधिक निर्भरता को कम करते हुए स्थानीय संसाधनों और क्षमताओं पर आधारित गैर-कृषि रोज़गार के अवसर पैदा करना है। इसके लिए अवसंरचना निवेश, सार्वजनिक खरीद, स्थानीय नियुक्ति और रियायती वित्तीय सहायता को आपस में जोड़ने का सुझाव दिया गया है, ताकि ग्रामीण युवाओं के लिए स्थायी और सम्मानजनक आजीविका के विकल्प उपलब्ध हो सकें।

सूक्ष्म, लघु और मध्यम उद्यमों (एमएसएमई) को अर्थव्यवस्था की रीढ़ मानते हुए, ज्ञापन में सार्वजनिक ऋण सहायता की संरचना में बदलाव की मांग की गई है। इसमें प्रस्ताव किया गया है कि ऋण और वित्तीय प्रोत्साहनों को सत्यापित रोज़गार सृजन से जोड़ा जाए, विशेष रूप से महिलाओं और पहली बार कार्यबल में प्रवेश करने वाले युवाओं के लिए।
इस प्रकार सार्वजनिक वित्त का सामाजिक प्रतिफल बढ़ेगा और एमएसएमई क्षेत्र को केवल उत्पादन नहीं, बल्कि रोज़गार विस्तार का भी सशक्त माध्यम बनाया जा सकेगा। साथ ही, औद्योगिक प्रोत्साहन योजनाओं को पुनः श्रम-प्रधान क्षेत्रों की ओर उन्मुख करने का आग्रह किया गया है, ताकि पूंजी-प्रधानता के बजाय रोज़गार घनत्व को प्रोत्साहन का आधार बनाया जा सके।
कृषि क्षेत्र के संदर्भ में, जेआईएच ने केवल इनपुट सब्सिडी पर केंद्रित दृष्टिकोण से आगे बढ़कर आय-स्थिरीकरण को नीति का केंद्र बनाने की आवश्यकता पर बल दिया है। ज्ञापन में यह स्वीकार किया गया है कि किसानों की आय में अस्थिरता ही ग्रामीण संकट का प्रमुख कारण बन चुकी है।
इसके समाधान के लिए मूल्य-अंतर भुगतान, फसल विविधीकरण को बढ़ावा, ऑफ-सीज़न ग्रामीण रोज़गार का विस्तार तथा संस्थागत ऋण प्रणाली में धीरे-धीरे आय-समतलीकरण उपकरणों को शामिल करने जैसे उपाय सुझाए गए हैं। इसके समानांतर, स्वास्थ्य-देखभाल पर होने वाले भारी निजी खर्च को कम करने के लिए ऐसी नीतियों की आवश्यकता बताई गई है जो सीधे जेब से होने वाले व्यय को घटाकर घरेलू वित्तीय सुरक्षा को सुदृढ़ करें।
ज्ञापन में शिक्षित बेरोज़गारी की गंभीर समस्या को भी प्रमुखता से उठाया गया है। इसके लिए शिक्षा से रोज़गार में संक्रमण को सुगम बनाने वाले संरचित तंत्रों—जैसे भुगतानयुक्त अप्रेंटिसशिप, कौशल-आधारित वजीफे और उद्योग-शिक्षा साझेदारी की सिफारिश की गई है। विशेष रूप से उन ज़िलों को प्राथमिकता देने का सुझाव दिया गया है जहाँ स्नातक युवाओं में बेरोज़गारी की दर अधिक है, ताकि क्षेत्रीय असमानताओं को भी संबोधित किया जा सके।
सामाजिक न्याय के आयाम को रेखांकित करते हुए, ज्ञापन में मुस्लिम समुदाय के लिए लक्षित सामाजिक-आर्थिक हस्तक्षेपों की आवश्यकता पर भी बल दिया गया है। यह मांग शिक्षा, रोज़गार और ऋण तक पहुँच में मौजूद असमानताओं से संबंधित स्थापित अनुभवजन्य साक्ष्यों पर आधारित है। प्रस्तावित उपायों में शिक्षा सहायता, उद्यम वित्त, कौशल एवं रोज़गार क्लस्टरों का विकास तथा सार्वजनिक खरीद प्रक्रियाओं में मुस्लिम-स्वामित्व वाले एमएसएमई की भागीदारी बढ़ाने के ठोस कदम शामिल हैं।
राजस्व नीति के स्तर पर, जेआईएच ने भारत की कर संरचना में मध्यम अवधि में पुनर्संतुलन की सिफारिश की है। इसमें अप्रत्यक्ष करों पर अत्यधिक निर्भरता कम कर प्रगतिशील प्रत्यक्ष कराधान को मजबूत करने की आवश्यकता बताई गई है। साथ ही विलासिता उपभोग, सट्टात्मक लाभ और डिजिटल अर्थव्यवस्था में मूल्य सृजन पर चयनात्मक उपकरों की संभावनाओं का उल्लेख किया गया है। राज्यों की राजकोषीय क्षमता बढ़ाने के लिए पूर्वानुमेय और परिणाम-आधारित अंतरणों को सुदृढ़ करने का सुझाव भी दिया गया है।
अपने ज्ञापन के माध्यम से जमाअत-ए-इस्लामी हिंद ने दोहराया है कि केंद्रीय बजट के लिए रचनात्मक और साक्ष्य-आधारित सुझाव देना उसका एक निरंतर वार्षिक प्रयास रहा है। यह अभ्यास समावेशी, संतुलित और सामाजिक रूप से उत्तरदायी आर्थिक नीति के प्रति उसकी प्रतिबद्धता को दर्शाता है।

इसी क्रम में संगठन ने अन्य मुस्लिम संगठनों और नागरिक समाज संस्थाओं से भी अपील की है कि वे अपने विचारपूर्ण और रचनात्मक प्रस्ताव वित्त मंत्रालय तक पहुँचाएँ, ताकि राष्ट्रीय बजटीय प्रक्रिया में समाज के विविध वर्गों की चिंताओं और आकांक्षाओं का समुचित प्रतिनिधित्व सुनिश्चित हो सके।
ज्ञापन का निष्कर्ष इस मूल संदेश के साथ होता है कि भारत की केंद्रीय आर्थिक चुनौती केवल संपत्ति का सृजन नहीं, बल्कि यह सुनिश्चित करना है कि विकास का लाभ रोज़गार, आय-सुरक्षा और न्यायसंगत सामाजिक परिणामों के रूप में समाज के हर वर्ग तक पहुँचे। इसी भावना के साथ ये सुझाव केंद्रीय बजट 2026–27 के निर्माण हेतु वित्त मंत्रालय के समक्ष सम्मानपूर्वक विचारार्थ प्रस्तुत किए गए हैं।






