आवाज़ द वॉयस I नई दिल्ली
“आपने अब तक किसी कायमखानी को पीठ में गोली खाए हुए नहीं देखा होगा।”
यह संवाद किसी फिल्मी कहानी का नहीं, बल्कि उस कड़वी सच्चाई का हिस्सा है जिसे आवाज़ द वॉयस जल्द ही अपनी आने वाली डॉक्यूमेंट्री के ज़रिए देश के सामने लाने जा रहा है। यह संवाद जिस किरदार के मुंह से निकलता है, वह कोई अभिनेता नहीं बल्कि एक वास्तविक पूर्व सैनिक है-ऐसा सैनिक, जिसने अपनी पूरी ज़िंदगी वर्दी, अनुशासन और राष्ट्रसेवा को समर्पित कर दी।
यह डॉक्यूमेंट्री केवल एक फिल्म नहीं, बल्कि राजस्थान की एक वीर मुस्लिम बिरादरी-कायमखानीकी गाथा है। एक ऐसी कौम, जिसके लिए देशभक्ति कोई नारा नहीं, बल्कि पीढ़ियों से निभाई जा रही परंपरा है। यह कहानी उन जांबाज़ सपूतों की है, जिन्होंने सीमा पर रहकर देश की रक्षा की, जिन्होंने दुश्मन की गोलियों का सामना सीने से किया और जिन्होंने शहादत को गौरव माना।
डॉक्यूमेंट्री की पहली झलक33सेकंड का टीज़रही दर्शकों के रोंगटे खड़े करने के लिए काफी है। टीज़र यह संकेत देता है कि यह फिल्म केवल तथ्यों की प्रस्तुति नहीं, बल्कि भावनाओं, बलिदान और राष्ट्रवाद से ओतप्रोत एक अनुभव होने वाली है। इसे देखकर दर्शक न केवल गर्व से भर उठेंगे, बल्कि यह समझने को भी मजबूर होंगे कि देश की रक्षा में धर्म नहीं, केवल कर्तव्य मायने रखता है।
राजस्थान की कायमखानी मुस्लिम बिरादरी का इतिहास शौर्य, अनुशासन और देशसेवा से भरा रहा है। इस बिरादरी का लगभग हर परिवार फौज से किसी न किसी रूप में जुड़ा रहा है। यहां के युवाओं का सपना किसी बड़े कारोबारी या अफसर बनने का नहीं, बल्कि भारतीय सेना, अर्धसैनिक बलों या पुलिस में भर्ती होकर मातृभूमि की सेवा करने का होता है। सरकारी बड़े ओहदों से लेकर सीमा पर तैनात जवानों तक, कायमखानियों ने हर मोर्चे पर अपनी निष्ठा साबित की है।
डॉक्यूमेंट्री के निर्देशक और पटकथा लेखक मंजीत ठाकुर बताते हैं कि कायमखानी समुदाय के सैनिकों ने अब तक चार शौर्य चक्र, 18सेना मेडल और पांच विशिष्ट सेवा मेडल अपने नाम किए हैं। ये आंकड़े किसी भी समुदाय के लिए गर्व की बात हो सकते हैं, लेकिन कायमखानियों के लिए यह सिर्फ सम्मान नहीं, बल्कि जिम्मेदारी का प्रतीक हैं।
बलिदान की बात करें तो यह समुदाय पीछे नहीं रहा। दंदूरी गांव, जिसे आज ‘फौजियों का गांव’ कहा जाता है, वहां से 18कायमखानी मुस्लिम देश के लिए शहीद हुए। इसी तरह झांझोत और नुआ गांव से भी 10-10शहीदों ने मातृभूमि के लिए अपने प्राण न्योछावर किए। ये आंकड़े केवल संख्या नहीं, बल्कि उन माताओं के आंसू, उन परिवारों का गर्व और उस मिट्टी की खुशबू हैं, जिसने ऐसे सपूतों को जन्म दिया।
डॉक्यूमेंट्री में इन शहीदों की कहानियों को बेहद संवेदनशील और प्रभावशाली तरीके से प्रस्तुत किया गया है। कैमरा वर्क, एडिटिंग और ग्राफिक्स उच्च स्तर के हैं, जो दर्शकों को भावनात्मक रूप से कहानी से जोड़ देते हैं। हर फ्रेम में रिसर्च, मेहनत और सच्चाई झलकती है।
इस डॉक्यूमेंट्री को बनाने से पहले आवाज़ द वॉयस की टीम ने गहन विचार-विमर्श और व्यापक अध्ययन किया। प्रधान संपादक आतिर खान के नेतृत्व में टीम ने लंबे समय तक रिसर्च की, इतिहास खंगाला और ज़मीनी सच्चाइयों को समझा। इसके बाद कई दिनों तक राजस्थान के अलग-अलग गांवों में शूटिंग की गई। शूटिंग देर रात तक चली, ताकि इस बिरादरी की असली जीवनशैली, संघर्ष और गौरव को बिना किसी बनावट के दुनिया के सामने लाया जा सके।
डॉक्यूमेंट्री में कई चौंकाने वाले तथ्य भी सामने आते हैं। उदाहरण के लिए, कायमखानी मुसलमान गाय को अपनी बड़ी पूंजी मानते हैं और उसे नुकसान पहुंचाने की कल्पना भी नहीं कर सकते। यह तथ्य उन रूढ़ धारणाओं को तोड़ता है, जो अक्सर समाज में बिना समझे बना ली जाती हैं।
मंजीत ठाकुर बताते हैं कि जब टीम कायमखानी गांवों में पहुंची, तो हर जगह उन्हें अपार सम्मान और आत्मीयता मिली। गांव वालों ने न केवल दिल खोलकर स्वागत किया, बल्कि अपनी कहानियां, अपने दर्द और अपने गर्व को भी खुले मन से साझा किया। यह भरोसा ही इस डॉक्यूमेंट्री की आत्मा बना।
डॉक्यूमेंट्री के उद्देश्य पर बात करते हुए आवाज़ द वॉयस के प्रधान संपादक आतिर खान कहते हैं कि आज के दौर में नकारात्मकता को खबरों की यूएसपी बना दिया गया है। ऐसे माहौल में आवाज़ द वॉयस एक ऐसा डिजिटल मंच है, जो भारत और दुनिया भर से सहयोग, आपसी अस्तित्व और शांतिपूर्ण सहजीवन की सकारात्मक कहानियां सामने लाता है।
उनका मानना है कि आस्था, जाति, क्षेत्र और भाषा की दीवारों से परे हमारी कई साझा चिंताएं, चुनौतियां और भविष्य के सपने हैं, जो लोगों और समुदायों को एक साथ लाने की अपार क्षमता रखते हैं। आवाज़ द वॉयस का कंटेंट न केवल भारत में, बल्कि विदेशों में भी मुस्लिम समुदाय के बीच प्रगतिशील, सकारात्मक और राष्ट्रनिर्माण से जुड़े विचारों को बढ़ावा देता है।
यह डॉक्यूमेंट्री उसी सोच का विस्तार हैएक ऐसा प्रयास, जो नफरत के शोर में दब चुकी सच्ची देशभक्ति की आवाज़ को बुलंद करता है। यह फिल्म याद दिलाती है कि वर्दी का कोई मजहब नहीं होता, और देश के लिए बहा हर खून सिर्फ हिंदुस्तानी होता है।
जब यह डॉक्यूमेंट्री रिलीज़ होगी, तो निश्चय ही यह दर्शकों को केवल प्रभावित नहीं करेगी, बल्कि सोचने पर मजबूर करेगी, गर्व से भर देगी और राष्ट्र के प्रति एक नई ऊर्जा पैदा करेगी। यह केवल कायमखानियों की कहानी नहीं, बल्कि उस भारत की कहानी है, जहां देश सबसे पहले आता है।