हरजिंदर
इस समय जब दुनिया में तनाव चरम पर है एक और सैनिक गंठजोड़ की आवाज सुनाई देने लग पड़ी है। अमेरिका वेनेजुएला में हस्तक्षेप कर चुका है, अब उसकी नजर ईरान और ग्रीनलैंड पर है। ऐसे वक्त में पाकिस्तान, सउदी अरब और तुर्की का सैनिक सहयोग के लिए एक साथ खड़े हो जाना क्या कहता है?
ज्यादातर विश्लेषणों में इस गंठजोड़ को मुस्लिम नाटो बताया गया है। यानी यह अमेरिका द्वारा शीतयुद्ध के दौरान बनाए गए पश्चिमी देशों के उस गंठजोड़ की तरह होगा जो सोवियत संघ और उसके सहयोगियों से रक्षा के लिए बनाया गया था। कहा जा रहा है कि इसमें तुर्की के हथियार होंगे, सउदी अरब का पैसा होगा और होगा पाकिस्तान का परमाणु बम। अभी यह साफ नहीं है कि इन तीनों चीजों का इस्तेमाल कैसे होगा?
दिलचस्प बात यह है कि जिस समय मुस्लिम नाटो की बात चल रही है असली नाटो लगभग खत्म हो चुका है। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप कईं बार यह संकेत दे चुके हैं नाटो को बनाए रखने में उनकी कोई दिलचस्पी नहीं है। ग्रीनलैंड को लेकर उनकी आक्रामकता ने इसके ताबूत में आखिरी कील भी ठोंक ही दी है।
एक और मजेदार बात यह भी है कि जो तुर्की इस समय मुस्लिम नाटो को अगुवा बन गया है वह एक साल पहले तक इस कोशिश में था कि उसे पश्चिमी देशों का हिस्सा मानकर अमेरिकी नाटो में शामिल किया जाए। वहां दाल नहीं गली तो अब वह अपना अलग नाटो बनाने निकल पड़ा है।
नाटो की कुछ और बातों को समझना जरूरी है। यह नार्द अटलांटिक ट्रीटी आर्गेनाईजेशन था जो सोवियत संघ और उसके सहयोगी देशों द्वारा किए गए सैनिक गंठजोड़ वारसा ट्रीटी के खिलाफ खड़ा किया गया था। सैनिक गंठजोड़ों की खास बात यह होती है कि आमतौर पर वे किसी खास और स्पष्ट दुशमन के खिलाफ तैयार किए जाते हैं। तो इस मुस्लिम नाटो का दुशमन कौन है?
तीनों देशों ने जो सैनिक समझौता किया है वह हमें ऐसी कोई बात नहीं बताता। अगर तुर्की और सउदी अरब के मामले में देखें तो पश्चिमी एशिया की राजनीति में उनके हित कईं जगह टकराते रहे हैं। इस्राएल को दोनों को
साझा दुशमन माना जा सकता है लेकिन अमेरिका जब तक इस्राएल के साथ खड़ा है यह उम्मीद नहीं की जा सकती कि दोनों मिलकर भी उसकी खिलाफ कोई कदम उठा सकेंगे।अगर पाकिस्तान की बात करें तो वह हर तरह से भारत को ही अपना दुशमन मानता है। भारत के खिलाफ वह कईं देशों की सैनिक मदद भी लेता रहा है। मसलन आॅपरेशन सिंदूर के समय ही चीन और तुर्की के लगातार मदद मिली थी। लेकिन सउदी अरब इस तरह के सहयोग से बचता रहा है। क्या उसके रुख में अब कोई बदलाव आएगा?
एक और चीज यह भी है कि जिन तीनों देशों के बीच सैनिक सहयोग का यह समझौता हुआ है उनके बीच इस तरह का सहयोग हमेशा से चलता रहा है। पाकिस्तान की फौज सउदी अरब की सेना को ट्रेनिंग से लेकर अपने सैनिक देने तक हर तरह से सहयोग करती रही है। जिस समय खाड़ी का युद्ध हुआ था तो पाकिस्तान ने अपने 20,000 सैनिक वहां तैनात कर दिए थे।

दूसरी तरफ तुर्की हथियारों का बड़ा उत्पादक है और उसका सबसे बड़ा खरीदार पाकिस्तान है। वह पाकिस्तान के एफ-16 लड़ाकू विमानों के अपग्रेड में उसकी मदद भी कर चुका है। आॅपरेशन सिंदूर के समय उसकी भूमिका को भी हम जान ही चुके हैं।
इसलिए बड़ा सवाल यह है कि ये तीनों देश पहले से ही चले आ इस सहयोग में नया क्या जोड़ने जा रहे हैं?मुस्लिम नाटो की खबरों में पाकिस्तान के परमाणु बम का जिक्र भी आ रहा है। काफी समय से इस बात का जिक्र होता रहा है कि जरूरत पड़ने पर पाकिस्तान अपने परमाणु बम को सउदी अरब में तैनात कर सकता है।
हालांकि बहुत से विशेषज्ञ यह चेतावनी देते हैं कि अगर ऐसा हुआ तो इससे जो संकट खड़ा होगा वह 1962 के क्यूबन मिसाइल संकट से कहीं ज्यादा बड़ा हो सकता है। 1962 में सोवियत संघ ने क्यूबा में चुपचाप अपनी परमाणु मिसाइले तैनात कर दीं थीं तो यह लगा था कि दुनिया तीसरे विश्वयुद्ध के मुहाने पर पहंुच गई है। बाद में अमेरिका और सोवियत संघ में समझौता हुआ और ये मिसाइलें क्यूबा से हटाई गईं तब जाकर कहीं संकट खत्म हुआ।
इस सबसे अलग हमें एक और बात ध्यान में रखनी चाहिए कि भले ही इसमें शामिल देश किसी फायदे की उम्मीद बांधते हों लेकिन सैनिक गंठजोड़ दुनिया के लिए कभी भी अच्छी खबर नहीं होते।
( लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं)