प्रमोद जोशी
ईरान में करीब तीन हफ्ते से ज्यादा समय तक चला झंझावात पिछले हफ्ते धीमा पड़ गया. इसके पीछे कई तरह के कयास हैं. यह किसी नए तूफान से पहले का ठहराव है या स्थायी शांति की तैयारी. या फिर साबित यह हुआ कि ट्रंप के बादल गरजते ज्यादा है, बरसते कम है.
मोटे तौर पर लगता है कि दोनों पक्षों ने हाथ खींचे हैं. खबरें हैं कि ईरानी शासन ने बड़े पैमाने पर दमन करके प्रदर्शनकारियों के हौसले पस्त कर दिए हैं. देश में कई सौ लोगों को सामूहिक रूप से फाँसी देने की तैयारी थी.
फाँसियाँ होतीं, तो टकराव बढ़ जाता, जिससे घबराकर ईरान ने हाथ खींच लिए. ट्रंप ने कहा था, फाँसियाँ हुईं तो अमेरिका हमला बोलेगा. इस बात की पुष्टि करते हुए वॉशिंगटन पोस्ट ने वाइट हाउस के एक अधिकारी के हवाले से रिपोर्ट छापी है, कि ईरान सरकार के एक संदेश के बाद 'राष्ट्रपति ट्रंप ने हमले के फ़ैसले को रद्द कर दिया.'
अख़बार के मुताबिक़, ईरानी विदेशमंत्री अब्बास अराग़ची की ओर से ट्रंप के विशेष दूत स्टीव विटकॉफ़ को भेजे गए संदेश ने माहौल को शांत किया और संकट को टाला. संदेश में कहा गया था कि ईरान सरकार का प्रदर्शनकारियों को फाँसी देने का कोई इरादा नहीं है.
अख़बार ने राजनयिक के हवाले से कहा है कि सऊदी अरब, क़तर, ओमान, मिस्र और यूएई जैसे आसपास के कुछ देशों ने वाइट हाउस से अनुरोध किया कि ईरान पर हमला नहीं किया जाए. जेरूसलम पोस्ट की खबर के अनुसार इसराइली प्रधानमंत्री नेतन्याहू ने भी ट्रंप से कहा कि जल्दबाज़ी में हमला न करें.

सेना तैयार नहीं थी
दूसरी तरफ ऐसी खबरें भी आईं कि गुरुवार की शाम होते-होते स्पष्ट होने लगा था कि पारा ठंडा हो रहा है. अमेरिका ने क़तर में अपने अल-उदैद एयर बेस पर सुरक्षा अलर्ट का स्तर घटा दिया.समाचार एजेंसी रॉयटर्स ने एक सूत्र के हवाले से खबर दी कि बुधवार को जिन अमेरिकी लड़ाकू विमानों को इस बेस से हटा लिया गया था, वे अब धीरे-धीरे वापस लौट रहे हैं.
लंदन के अख़बार 'द टेलीग्राफ़' ने ख़बर दी कि अमेरिकी सेना हमले के लिए तैयार नहीं थी. इस ख़बर के मुताबिक़ ट्रंप ने राष्ट्रीय सुरक्षा टीम को निर्देश दिया कि वे कार्रवाई तभी करें, जब निर्णायक प्रहार की गारंटी दे सकें.
अधिकारियों ने कहा कि वे ऐसी गारंटी नहीं दे सकते और यह भी कहा कि फौजी कार्रवाई करेंगे, तो बड़ी लड़ाई शुरू हो सकती है, जो हफ़्तों तक चल सकती है.
अखबार ने एक और खबर में लिखा, ट्रंप का कोई भरोसा नहीं. उन्होंने मंगलवार को प्रदर्शनकारियों से कहा, मदद रास्ते में है. उसके 24घंटे बाद वह यह कहते हुए पीछे हट गए कि ईरान सरकार अब अपने विरोधियों को मार नहीं रही है, और गिरफ्तार लोगों को फाँसी नहीं दी जाएगी.
बहरहाल अमेरिका ने अपने विमानवाहक पोत यूएसएस अब्राहम लिंकन के कैरियर स्ट्राइक ग्रुप को इस तरफ भेजा है, जिससे लगता है कि वह दबाव बनाकर रखेगा.
ट्रंप पर आरोप
शनिवार को ईरान के सर्वोच्च नेता आयतुल्ला अली खामनेई ने माना कि विरोध प्रदर्शनों के दौरान ‘कई हजार लोग’ मारे गए हैं. अभी तक ईरान सरकार कह रही थी कि आंदोलन की अफवाहें हैं, वास्तविकता कम. अब मौतों को लेकर आधिकारिक स्वीकृति उसकी भयावहता को बताती है.
आयतुल्ला खामनेई ने देश में हताहतों, विनाश और उथल-पुथल के लिए डॉनल्ड ट्रंप को सीधे दोषी ठहराया. उन्होंने कहा, ईरानी राष्ट्र को हुई क्षति और बदनामी के लिए हम उन्हें अपराधी मानते हैं.उन्होंने सोशल मीडिया पर लिखा, इस उत्पात में अमेरिकी राष्ट्रपति व्यक्तिगत रूप से शामिल थे. उन्होंने प्रदर्शनकारियों को संदेश भेजा कि हम आपको फौजी मदद देंगे. अमेरिकी राष्ट्रपति खुद इस देशद्रोह में शामिल हैं. यह आपराधिक कृत्य हैं.
खामनेई के इस आरोप के जवाब में ट्रंप ने फिर कहा कि ईरान को आयतुल्ला के लंबे शासन को समाप्त करते हुए नए नेतृत्व की तलाश करनी चाहिए. वे देश के विनाश और जनता के विरुद्ध ऐसी हिंसा के प्रयोग के दोषी हैं, जैसी पहले कभी नहीं हुई.
अमेरिका ईरान पर सैनिक कार्रवाई करेगा या नहीं, इसके बारे में पूछे जाने पर ट्रंप ने कहा, फिलहाल उन्होंने अच्छा काम यह किया है कि 800से अधिक लोगों को फाँसी देने का फैसला रोक दिया है.

कनेक्टिविटी बहाल
अब खबरें आ रही हैं कि ईरान ने आंशिक रूप से इंटरनेट कनेक्टिविटी बहाल कर दी. अर्ध-सरकारी समाचार एजेंसी मेहर ने कहा कि कुछ उपयोगकर्ता ऑनलाइन वापस आ गए हैं, एसएमएस सेवाएँ फिर से शुरू हो गई हैं.
इंटरनेट निगरानी समूह नेटब्लॉक्स ने कहा कि 200घंटे से अधिक समय तक लगभग पूरी तरह बंद रहने के बाद कनेक्टिविटी कुछ बेहतर हुई है, लेकिन यह सामान्य के लगभग दो प्रतिशत पर है.
ईरानी विदेशमंत्री अब्बास अराग़ची ने कहा है कि विदेश से से निर्देशित हो रहे ‘आतंकवादी अभियानों’ को रोकने के मक़सद से इंटरनेट को बंद किया गया है, पर उन्होंने या सरकार ने यह नहीं बताया है कि इंटरनेट सेवाएं पूरी तरह कब वापस आएँगी.
मीडिया रिपोर्टों से ऐसा संकेत भी मिला है कि ईरानी अधिकारी इसे स्थायी रूप से प्रतिबंधित करने या चीन की तरह नियंत्रित करने की योजना बना रहे हैं.ईरान इस समय दुनिया की सबसे खराब मुद्रास्फीति का सामना कर रहा है, जो 50प्रतिशत से अधिक और खाद्य सामग्री के मामले में 70प्रतिशत है. उसकी मुद्रा डॉलर के मुकाबले 80प्रतिशत से अधिक गिर गई है.
आंदोलन का क्या होगा ?
सवाल है कि क्या ईरान के भीतर आंदोलन चलेगा या खत्म हो जाएगा? अमेरिका के तमाम पर्यवेक्षकों का कहना है कि अमेरिका को सीधे हस्तक्षेप नहीं करना चाहिए, बल्कि आंदोलन के प्रभाव को देखना चाहिए. ट्रंप प्रशासन को यह नहीं मान लेना चाहिए कि ईरान सरकार इस विस्फोट को दबा लेगी.
आंदोलन और हिंसा के बाद स्थितियाँ चाहे, जिस दिशा में जाएँ, राज-व्यवस्था वैसी ही नहीं रहेगी, जैसी अभी तक चल रही थी. इसके पहले 1953और 1979में ईरान ने दो बड़े बदलाव देखे1979के पिछले बदलाव में ईरान के लोग तीन बड़े आदर्शों को लेकर खड़े हुए थे: आज़ाद राज व्यवस्था, व्यक्तिगत स्वतंत्रता, और सामाजिक न्याय. उस क्रांति को फ्रांस की राज्यक्रांति, रूस की बोल्शेविक क्रांति और चीन की कम्युनिस्ट क्रांति के बाद विश्व की सबसे महान क्रांतियों में गिना जाता है.

रसूख में कमी
पिछले कुछ वर्षों से देश में सरकारी रसूख कम हुआ है. विरोध के स्वर तेज हुए हैं. सितंबर 2022में महिलाओं के लिए देश के ड्रेस कोड का उल्लंघन करने के आरोप में गिरफ्तार ईरानी-कुर्द महिला महसा अमिनी की हिरासत में मौत के बाद बड़े पैमाने पर प्रदर्शन हुए. उनके दमन के लिए सरकार ने सख्ती का सहारा लिया था.
क्या अब वही सख्ती काम करेगी? खबरें हैं कि लोगों के मन से अब डर निकल गया है. पर क्या वे निर्णायक जीत हासिल कर पाएँगे? या सरकारी दमन के भय से पूरी तरह दब जाएँगे? सरकार के समर्थन में भी रैलियाँ हुई हैं.
ज्यादा बड़ा सवाल है कि क्या सत्ता परिवर्तन होगा? मान लिया अमेरिकी सैनिक हस्तक्षेप से परिवर्तन हो भी जाए, तो उसके बाद क्या होगा? अमेरिका दूध का जला है. क्या गारंटी है कि ईरान में भी वैसी ही अराजकता पैदा नहीं होगी, जैसी इराक, लीबिया और अफगानिस्तान में हो गई?
सरकारी कामयाबी?
दूसरी तरफ क्रूरता के सहारे विरोध को दबाने में सरकार कामयाब हो भी जाए, तब भी उसके पास आम ईरानियों के जीवन स्तर में सुधार करने और महिलाओं के बीच जन्म लेते विरोध का कोई व्यावहारिक समाधान नहीं है. इस आंदोलन के छींटे कमोबेश पश्चिम एशिया के कुछ और देशों पर भी पड़ेंगे.
ईरान में सर्वोच्च सत्ता 86 वर्षीय सर्वोच्च नेता आयतुल्ला खामनेई के हाथों में है. वे अपने सबसे वफादार बलों से घिरे हुए हैं, जिनमें इस्लामिक रिवॉल्यूशनरी गार्ड कोर भी शामिल है. उसका ईरान की अर्थव्यवस्था, राजनीति और सुरक्षा पर दबदबा है.
आंदोलनकारियों का कोई केंद्रीय नेतृत्व नहीं है. इस दौरान पुरानी राजशाही के पक्ष में भी नारे लगे हैं. राष्ट्रपति ट्रंप से ईरान में हस्तक्षेप करने का आह्वान करने वालों में निर्वासित पूर्व युवराज रज़ा पहलवी भी शामिल हैं, जिनके पिता को 1979की इस्लामी क्रांति में ईरान के शाह के पद से हटा दिया गया था.

शांतिपूर्ण परिवर्तन ?
समझदार लोगों का मानना है कि स्थायी परिवर्तन तभी आ सकेगा, जब वह शांतिपूर्ण होगा, और देश के भीतर से ही हो. लोगों में बदलाव की इच्छा है, पर कैसा बदलाव? कुछ लोग परिचित या पुराने प्रतीकों की ओर लौट रहे हैं. सिंह और सूर्य वाले ईरान के क्रांति-पूर्व ध्वज एक बार फिर सड़कों पर दिखाई देने लगे हैं.
पहलवी ने बार-बार इस बात पर ज़ोर दिया है कि वे ईरान में राजशाही को बहाल नहीं करना चाहते. उनका दावा है कि वे एक ऐसे परिवर्तन का नेतृत्व करना चाहते हैं जो ईरान को लोकतंत्र की ओर ले जाए.दो हफ्ते पहले, जब देश की मुद्रा के तीव्र अवमूल्यन के विरोध में लोग सड़कों पर उतरे थे, तब अधिकारियों ने उनकी शिकायतों को जायज़ माना था, पर अब वे उन्हें आतंकवादी बता रहे हैं. पिछले दो हफ्तों में, शहरों के बाज़ारों और विश्वविद्यालयों में छोटे-छोटे प्रदर्शन एक बड़े जनांदोलन में बदल गए हैं.
सरकारी समझदारी
28दिसंबर को, तेहरान में आयातित इलेक्ट्रॉनिक सामान बेचने वाले व्यापारी देश की करेंसी के अचानक और तेज़ अवमूल्यन से हैरान रह गए. उन्होंने अपनी दुकानें बंद कर दीं और हड़ताल पर चले गए, और बाज़ार के अन्य व्यापारियों से भी उनका साथ देने का आह्वान किया.
सरकार की शुरुआती प्रतिक्रिया त्वरित और समझौते वाली थी. राष्ट्रपति मसूद पेज़ेश्कियान ने व्यापारियों से बातचीत करने का वादा किया. आम लोगों की तकलीफों को कम करने के लिए हरेक के बैंक खाते में लगभग सात डॉलर का नया भत्ता जमा किया गया, लेकिन समस्या का समाधान नहीं हुआ. चीजों की कीमतें और बढ़ गईं और प्रदर्शनों की लहर और तेज़ हो गई.
पश्चिम एशिया के अन्य देशों के मुकाबले ईरानी जनता, सुशिक्षित, जागरूक और अनुशासित है. यह दुनिया की प्राचीनतम सभ्यताओं में एक है.

ईरानी क्रांति
1979 की ईरानी क्रांति ने पहलवी राजवंश का अंत किया और आयतुल्ला खुमैनी को नए धर्मतंत्र का प्रमुख बनाया. वहाँ सर्वोच्च नेता धार्मिक इमाम होते हैं, पर शासन एक निर्वाचित राष्ट्रपति चलाता है.उस क्रांति का उद्देश्य अमेरिकी प्रभुत्व को समाप्त करना, राजनीतिक और व्यक्तिगत स्वतंत्रता की गारंटी देना और संपदा के वितरण के लिए एक निष्पक्ष प्रणाली स्थापित करना था.
क्रांति के 47वर्षों के बाद, ईरान के बहुत से नागरिक नई व्यवस्था को उन आदर्शों के वाहक के रूप में नहीं, बल्कि एक ऐतिहासिक विफलता के रूप में देखते हैं. इस दौरान राजनीतिक और नागरिक स्वतंत्रताएँ कम हो गईं. उनकी जीवनशैली और व्यक्तिगत पसंद भी निगरानी और दमन की शिकार हो गई.
नए ईरान ने अमेरिका और पश्चिमी देशों के साथ शुरू से ही रंजिश मोल ले ली. अपने नाभिकीय-कार्यक्रम के कारण वह विवादों में घिर गया और फिर इराक, लेबनॉन, सीरिया और फलस्तीन में पैर फँसा दिए. इससे उसकी अर्थव्यवस्था पर भी विपरीत प्रभाव पड़ा.
पश्चिमी हस्तक्षेप
अंतिम बादशाह शाह मोहम्मद रज़ा पहलवी अमेरिका और इसराइल के करीबी सहयोगी थे. तख्त पर उनकी वापसी भी अमेरिका और ब्रिटेन की मदद से हुई थी, जिन्होंने 1953में ईरान के लोकतांत्रिक पद्धति से चुने गए प्रधानमंत्री मुहम्मद मुसद्देक़ का तख्ता-पलट कराया था.
इस क्रिया की प्रतिक्रिया होनी थी. जनता के मन में विरोध ने जन्म ले लिया था. परिणाम यह हुआ कि ईरान में इस्लामिक-क्रांति ने जन्म लिया, जिसके कारण 1979में आयतुल्ला खुमैनी की वापसी हुई.1979की क्रांति में वामपंथियों ने भी शाह के शासन के खिलाफ एकजुट विपक्ष का हिस्सा बनकर महत्वपूर्ण भूमिका निभाई, जिसमें मार्क्सवादी और वामपंथी इस्लामी समूह शामिल थे. क्रांति के बाद आयतुल्ला खुमैनी के नेतृत्व में वामपंथियों को दबा दिया गया. उनके नेताओं और कार्यकर्ताओं को हाशिए पर धकेल दिया, जिसके बाद धार्मिक सत्तावादी शासन स्थापित हुआ.
वर्तमान राजव्यवस्था का सिद्धांत है ‘विलायत-ए-फ़कीह.’ यानी फ़कीह (इस्लामी न्यायविद) का संरक्षण, जो शिया वैचारिक-आधारशिला से जुड़ा है. मौजूदा वली-ए-फ़कीह (संरक्षक न्यायविद-गार्डियन ज्यूरिस्ट) आयतुल्ला अली खामनेई हैं. सवाल है कि क्या वे ऐसी व्यवस्था कायम कर पाएँगे, जो सर्वस्वीकृत हो?
( लेखक हिंदी दैनिक हिन्दुस्तान के संपादक रहे हैं)
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