नई विश्व व्यवस्था में भारत की कूटनीति सबसे मजबूत

Story by  आवाज़ द वॉयस | Published by  [email protected] | Date 09-05-2026
India's Diplomacy is the Strongest in the New World Order.
India's Diplomacy is the Strongest in the New World Order.

 

 राजीव नारायण

भारत अब वैश्विक व्यवस्था के पीछे नहीं चल रहा है। वह इसके नियम खुद लिख रहा है। लंबे समय तक भारत की विदेश नीति को हिचकिचाहट भरी और जरूरत से ज्यादा सावधान माना जाता रहा। पश्चिमी देशों को लगता था कि भारत शीत युद्ध के दौर की पुरानी सोच में फंसा है। वे भारत को एक ऐसे देश के रूप में देखते थे जो फैसला लेने से डरता है और दो गुटों के बीच बस तालमेल बिठाने की कोशिश करता है। लेकिन आज वही 'दुविधा' भारत की कूटनीतिक समझदारी मानी जा रही है।

वजह साफ है। भारत अब किसी एक पक्ष को नहीं चुनना चाहता। और सच तो यह है कि अब दुनिया भी ऐसा नहीं चाहती।बदलाव बहुत बड़ा है। पश्चिमी देशों के प्रतिबंधों के बावजूद भारत रूस से सस्ता तेल खरीद रहा है। उसी समय वह अमेरिका के साथ रक्षा और तकनीक के रिश्ते मजबूत कर रहा है। हिमालय सीमा पर चीन के साथ सैन्य तनाव है लेकिन व्यापार भी जमकर चल रहा है।

भारत इजरायल का रणनीतिक साझेदार है और साथ ही 'ग्लोबल साउथ' की बुलंद आवाज भी है। वह 'क्वाड' का हिस्सा है लेकिन रूस की सीधे तौर पर निंदा भी नहीं करता। इसके बावजूद हर बड़े वैश्विक मंच पर भारत का स्वागत होता है।पश्चिमी विश्लेषकों को यह विरोधाभास लगता है। पर भारत के लिए यही उसकी नई नीति है।

पुराने दौर की गुटनिरपेक्षता रक्षात्मक और नैतिकता पर आधारित थी। भारत की यह नई नीति अलग है। यह व्यावहारिक है और पूरी तरह से अपने हितों पर टिकी है। यह सिर्फ तटस्थ रहने के बारे में नहीं है। यह अपनी ताकत का सही इस्तेमाल करने के बारे में है। आज की अस्थिर दुनिया में भारत का यह तरीका आने वाले समय में एक मिसाल बन सकता है।

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एक बंटी हुई दुनिया

शीत युद्ध के बाद बनी दुनिया की व्यवस्था अब चरमरा रही है। अमेरिका सैन्य रूप से शक्तिशाली तो है लेकिन वह अपने अंदरूनी राजनीतिक विवादों में उलझा है। चीन आर्थिक ताकत बन चुका है पर उस पर कोई भरोसा नहीं करता।

यूरोप अपनी आजादी की बात करता है लेकिन सुरक्षा के लिए अमेरिका पर निर्भर है। रूस आज भी खतरनाक है पर आर्थिक रूप से कमजोर हो चुका है। नतीजा यह है कि दुनिया बहुध्रुवीय होने के बजाय टुकड़ों में बंट गई है।इस बिखराव में उन देशों के लिए बड़े मौके हैं जो अनिश्चितता के बीच रास्ता बनाना जानते हैं।
 

भारत इस मौके को बखूबी समझता है। नई दिल्ली अब किसी बड़े देश के पीछे चलने वाला छोटा साझीदार नहीं है। वह एक ऐसी सभ्यता के रूप में व्यवहार कर रहा है जो अपनी शर्तों पर जगह मांगती है। उसकी विदेश नीति अब विचारधारा से नहीं बल्कि अपनी जरूरतों से चलती है। इसमें ऊर्जा सुरक्षा, सप्लाई चेन, रक्षा तैयारी और तकनीक तक पहुंच सबसे ऊपर है।

रूस का उदाहरण इसे अच्छे से समझाता है। यूक्रेन युद्ध शुरू होने पर पश्चिम को लगा था कि भारत रूस से दूरी बना लेगा। लेकिन भारत ने रूस से सस्ता कच्चा तेल खरीदना और बढ़ा दिया। इससे भारत में महंगाई काबू में रही और ऊर्जा का संकट भी टल गया।

यह बड़ी अजीब स्थिति थी। भारत ने एक तरफ रूस पर लगे प्रतिबंधों का असर कम किया और दूसरी तरफ अमेरिका से दोस्ती भी बढ़ाई। अमेरिका ने पहले इस पर नाराजगी जताई लेकिन बाद में उसे समझौता करना पड़ा। वजह यह थी कि भारत अब इतना महत्वपूर्ण हो चुका है कि उसे नाराज करना मुमकिन नहीं। इस घटना ने एक सच दुनिया के सामने रख दिया। देश भले ही मूल्यों की बात करें पर वे काम सिर्फ अपने फायदे के लिए करते हैं। भारत बस इस मामले में ज्यादा ईमानदार है।

 

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चीन का साया

भारत के इस संतुलन के पीछे चीन का बहुत बड़ा हाथ है। चीन की बढ़ती ताकत ने एशिया का संतुलन बिगाड़ दिया है। भारत पूरी तरह से पश्चिमी देशों के पाले में नहीं जा सकता क्योंकि उसे किसी पर भी जरूरत से ज्यादा निर्भर होने से डर लगता है। लेकिन वह पश्चिम से दूर भी नहीं रह सकता क्योंकि चीन का मुकाबला करने के लिए उसे ताकतवर साथियों की जरूरत है।

इसीलिए भारत 'क्वाड' में शामिल होता है लेकिन कोई सैन्य गठबंधन नहीं बनाता। वह चीन के साथ व्यापार भी जारी रखता है और सीमा पर मुकाबला भी करता है। यह ऊपर से उलझा हुआ लग सकता है पर भारत के लिए यह अपनी ताकत बढ़ाने का जरिया है।

भारत में अब एक मनोवैज्ञानिक बदलाव आया है। वह खुद को सिर्फ एक विकासशील देश नहीं मानता। वह खुद को एक प्राचीन सभ्यता मानता है जो उपनिवेशवाद के सदियों बाद अपनी स्वायत्तता वापस पा रही है। 'विश्वगुरु' और 'ग्लोबल साउथ' का नेतृत्व करने जैसी बातें आम भारतीयों को पसंद आती हैं। वे चाहते हैं कि भारत अपने फैसले खुद ले।आज गुटनिरपेक्षता का मतलब सिर्फ तटस्थ रहना नहीं है। इसका मतलब अपनी संप्रभुता को बचाए रखना है। भारत सबके साथ सहयोग करेगा लेकिन किसी के आगे झुकेगा नहीं।

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नया वैश्विक मॉडल

हैरानी की बात यह है कि अब दुनिया भी भारत के रास्ते पर चल रही है। सऊदी अरब अब अमेरिका और चीन दोनों से रिश्ते निभा रहा है। तुर्की नाटो का सदस्य होते हुए भी अपनी अलग राह चलता है। दक्षिण-पूर्व एशिया के देश भी चीन और पश्चिम के बीच संतुलन बना रहे हैं। यहाँ तक कि यूरोप भी अब 'रणनीतिक स्वायत्तता' की भाषा बोल रहा है।

पुराने गठबंधन अब कमजोर पड़ रहे हैं। आज की वैश्वीकृत दुनिया में किसी एक के प्रति वफादार रहना आर्थिक रूप से घाटे का सौदा है। देशों को ऊर्जा के लिए एक देश चाहिए, तकनीक के लिए दूसरा और व्यापार के लिए तीसरा। ऐसी दुनिया में किसी एक गुट से बंधना महंगा पड़ता है।

यहीं पर भारत की रणनीति सही साबित हो रही है। भारत रूस से तेल ले सकता है, अमेरिका से तकनीक, यूरोप से व्यापार और खाड़ी देशों से रिश्ते निभा सकता है। वह किसी के आगे अपनी आजादी गिरवी नहीं रखता। यह कोई भ्रम नहीं बल्कि बदलती दुनिया के हिसाब से खुद को ढालने की कला है।

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मुश्किल दौर

लेकिन इस नई नीति के अपने खतरे भी हैं। अगर सभी बड़े देश इसी तरह सौदेबाजी और पैंतरेबाजी करेंगे तो दुनिया और ज्यादा अस्थिर हो सकती है। हर बात में स्पष्टता न होने से देशों के बीच भरोसा कम हो सकता है। इससे वे संस्थाएं भी कमजोर हो सकती हैं जो दुनिया में नियम बनाए रखने के लिए बनी थीं। छोटे देशों के लिए ऐसी दुनिया में टिकना मुश्किल होगा जहाँ हर रिश्ता किसी न किसी शर्त पर टिका हो।

हो सकता है कि यह नया दौर आपसी अविश्वास का हो। लेकिन भारत इस व्यवस्था में कामयाब हो सकता है क्योंकि उसे दशकों से विरोधाभासों के बीच रहने की आदत है। दूसरे देशों के लिए यह इतना आसान नहीं होगा।

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सालों तक भारत के किसी एक पक्ष में न आने को उसकी कमजोरी समझा गया। आज वही उसकी सबसे बड़ी खूबी बन गई है। भारत ने सिर्फ खुद को नहीं बदला बल्कि उसने आने वाली दुनिया के संकट को पहले ही भांप लिया था। आने वाले समय में सवाल यह नहीं होगा कि भारत किसके साथ जाएगा। सवाल यह होगा कि क्या पूरी दुनिया भी अपनी ताकत बढ़ाने के लिए भारत जैसा रास्ता अपनाएगी।

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