Chennai’s ‘Sparrow Man’: The Muslim Man Who Gave Up His Home for Sparrows and Restored Life to the City
ओनिका माहेश्वरी/ नई दिल्ली
चेन्नई में बीते 20 सालों से रहने वाले हाफिज़ ख़ान की कहानी उस शहर की कहानी है, जो तेज़ी से बढ़ रहा था, लेकिन अपने छोटे, नाज़ुक और अनमोल निवासियों गौरैयाओं और तितलियों को खोता जा रहा था। जब हाफिज़ चेन्नई आए, तो उन्होंने देखा कि शहर का विस्तार हो रहा था, नई इमारतें उठ रही थीं, लेकिन पेड़-पौधे कम हो रहे थे और पक्षियों के लिए रहने की जगह लगभग खत्म हो चुकी थी।“शहर बढ़ रहा था, मगर पक्षियों, तितलियों और पेड़ों का घर गायब हो रहा था। मैं जानता था कि अगर हमने कुछ नहीं किया, तो ये जीव हमारे शहर से हमेशा के लिए चले जाएंगे। यह सिर्फ पक्षियों की बात नहीं थी, यह हमारे जीवन और शहर के संतुलन की कहानी थी,” हाफिज़ कहते हैं।

शहर में गौरैयाओं की संख्या कम होती जा रही थी, लेकिन हाफिज़ खान ने इस समस्या का सामना किया और उन्हें 4,000 से अधिक कृत्रिम घोंसलों (Nest Boxes) के माध्यम से सुरक्षित आवास मुहैया कराया। हाफिज़, जिन्हें चेन्नई का ‘स्पैरो मैन’ कहा जाता है, Communitree के संस्थापक भी हैं और शहरी पारिस्थितिकी संरक्षण के लिए सक्रिय रूप से काम कर रहे हैं। हाफिज़ ने 2022 में Koodugal Trust के सहयोग से यह पहल शुरू की। “Koodugal” का अर्थ है घोंसला, और इस प्रोजेक्ट का उद्देश्य शहर के आवासीय इलाकों में गौरैयाओं को लौटाने के लिए सुरक्षित नेस्टिंग स्पॉट बनाना था। उनके प्रयासों से उन इलाकों में गौरैयाओं की संख्या में साफ़ दिखाई देने वाली बढ़ोतरी हुई है।
हाफिज़ का कहना है कि परिवर्तन तभी आता है जब लोग खुद आगे आएँ। इसी लिए उन्होंने स्कूलों से ‘Sparrow Ambassadors’ को जोड़कर उन्हें नेस्ट बॉक्स बनाने और स्थापित करने में शामिल किया। इस नागरिक-आधारित मॉडल से बच्चों में पर्यावरण के प्रति जागरूकता भी बढ़ी। इसके अलावा हाफिज़ शहरी वनस्पति और हरियाली बढ़ाने के लिए भी काम कर रहे हैं। उन्होंने कंक्रीट के शहरों को हरित स्थानों में बदलने के लिए कई परियोजनाएँ संचालित की हैं।
पर्यावरण में उनके योगदान को देखते हुए हाफिज़ खान को 2020 में Radio City द्वारा ‘Nakshatras of Chennai’ में शामिल किया गया। हाफिज़ की कहानी यह साबित करती है कि एक इंसान की लगन और समर्पण से शहरों में जीवन और प्रकृति को फिर से लौटाया जा सकता है। शुरुआत में हाफिज़ ने समुद्र तटों की सफाई और पेड़ लगाना शुरू किया। उन्होंने सोचा कि अगर शहर हरा-भरा होगा, तो पक्षी लौट आएँगे। लेकिन आश्चर्यजनक रूप से, गौरैयाएँ नहीं लौट रही थीं। हाफिज़ ने महसूस किया कि समस्या सिर्फ पेड़ों की कमी की नहीं थी। गौरैयाओं के लिए सबसे बड़ी कमी उनका घर यानी घोंसला था, और स्नान करने के लिए पानी के गड्ढे।
2022 में, हाफिज़ ने अपने प्रयासों को नया रूप दिया। उन्होंने गौरैया घर बनाना शुरू किया। यह एक साधारण लेकिन क्रांतिकारी कदम था। हाफिज़ ने वर्कशॉप आयोजित की, जहां लोगों को सिखाया गया कि कैसे साधारण कार्डबोर्ड से गौरैयाओं के नेस्ट बनाए जा सकते हैं। ये नेस्ट चेन्नई के मछुआरा गांवों में लगाए गए। और आश्चर्य की बात यह थी कि स्थानीय समुदाय ने इसे खुलकर अपनाया।

हाफिज़ का मानना है कि परिवर्तन तभी आता है जब लोग खुद जुड़ें। इसलिए उन्होंने स्कूलों में जाकर बच्चों को ‘स्पैरो एंबेसडर’ बनाया। बच्चे अब अपने घरों और स्कूलों में गौरैयाओं के लिए घोंसले बनाते, उनके पानी का इंतजाम करते और पक्षियों के प्रति जागरूक होते। धीरे-धीरे, शहर के कई हिस्सों में गौरैयाओं की संख्या बढ़ने लगी। आज हाफिज़ ने 4,000 से अधिक गौरैया घर स्थापित कर चुके हैं, और कुछ इलाकों में उनके नंबर लगभग दोगुने हो गए हैं। लेकिन हाफिज़ का योगदान सिर्फ चिड़ियों तक सीमित नहीं है। उन्होंने भारत में 1.6 मिलियन पेड़ लगाए और 198 शहरी जंगल तैयार किए, जिससे शहरों में हरियाली और जीवन लौटे। चेन्नई में हाफिज़ के प्रयासों ने सिर्फ पक्षियों की संख्या बढ़ाई ही नहीं, बल्कि शहर में गौरैयाओं की चहचहाहट भी वापस ला दी।
रोज़ सबेरे आंगन मेरे,इक गौरैया आती है।
चीं-चीं करती, फुदक-फुदक कर,
अपना राग सुनाती है।दाना कोई बिखरा हो तो,
वह उसे चुग जाती है।प्यारी-प्यारी,
नन्ही-नन्ही,मन को बहुत लुभाती है।
एक इंसान की नीयत और लगन शहरों में जीवन वापस ला सकती है। और यह कहानी इसीलिए खास है क्योंकि हाफिज़ एक मुस्लिम व्यक्ति हैं, जिन्होंने अपने नेक इरादों और प्यार से प्रकृति और जीव-जंतुओं के लिए कदम उठाए। गौरैया (House Sparrow) की संख्या में पिछले वर्षों में काफी कमी आई है और अब ये शहरों व घरों के आसपास कम ही दिखाई देती हैं। 2026 की रिपोर्टों के अनुसार, यह समस्या गंभीर हो गई है।

इसके गायब होने के मुख्य कारणों में शहरीकरण और आधुनिक घर शामिल हैं, क्योंकि कंक्रीट के जंगलों और आधुनिक भवनों में गौरैया के घोंसले बनाने की जगह नहीं बची है। इसके अलावा शहरों में बढ़ता प्रदूषण और मोबाइल टावरों से निकलने वाली रेडिएशन भी इन नन्हीं चिड़ियों के लिए खतरा बन रही है। खेती में कीटनाशकों (pesticides) के अत्यधिक उपयोग से उनका प्राकृतिक भोजन उपलब्ध नहीं हो पाता, और बदलती जीवनशैली के कारण घर-आंगन में दाना-पानी न मिलने से भी ये पक्षी दूर चले गए हैं। साथ ही, कबूतरों की बढ़ती संख्या और अन्य शिकारी पक्षियों की प्रतिस्पर्धा ने गौरैया की संख्या और घटा दी है। ऐसे में पर्यावरणविद इन नन्हीं चिड़ियों को बचाने के लिए लोगों को अपने घरों, छतों और बाल्कनी में दाना-पानी रखने और कृत्रिम घोंसले (Nest Boxes) लगाने के लिए प्रोत्साहित कर रहे हैं, ताकि यह प्यारी चिड़िया वापस लौट सके।
हाफिज़ ख़ान की कहानी सिर्फ पक्षियों के घर लौटाने की नहीं है, बल्कि यह उस विश्वास की कहानी है कि अगर इंसान अपनी जिंदगी में थोड़ी सी लगन और नीयत डाल दे, तो शहर और प्रकृति दोनों फिर से संग-साथ और संतुलन में जी सकते हैं। चेन्नई में हाफिज़ के प्रयासों ने यह साबित कर दिया कि अच्छाई और नेक इरादे किसी धर्म, जाति या समुदाय की मोहताज नहीं होते।