प्रो. राजीब हांडिके
जब चुनावों की घोषणा हुई, तब असम में सत्तारूढ़ भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) के नेतृत्व वाली एनडीए सरकार के लिए यह चुनाव एक आसान मुकाबला माना जा रहा था। यह स्पष्ट था कि यह राजनीतिक संघर्ष असमान (asymmetric) है और लगभग सभी इस बात से सहमत थे कि चुनावी तराजू भाजपा के पक्ष में झुका हुआ है।
इस असमानता का एक प्रमुख और सबसे प्रभावशाली कारण भाजपा की अत्यंत मजबूत संगठनात्मक संरचना थी। वर्षों के दौरान, भाजपा का संगठनात्मक नेटवर्क “पन्ना-प्रमुख” प्रणाली के माध्यम से गाँवों के घर-घर तक पहुँच गया है, जहाँ प्रत्येक कार्यकर्ता मतदाता सूची के एक पृष्ठ (पन्ना) की जिम्मेदारी संभालता है।
इस विशाल संगठनात्मक शक्ति को मजबूत वित्तीय संसाधनों ने और सुदृढ़ किया, जिससे कार्यकर्ताओं के लिए काम करना आसान और प्रभावी हुआ। पिछले दशक में बने भव्य पार्टी कार्यालय इस वास्तविकता को स्पष्ट रूप से दर्शाते हैं।
इसके अतिरिक्त, अक्टूबर 2022में भाजपा ने असम में अपने जिला अध्यक्षों और आठ मोर्चा अध्यक्षों को संगठनात्मक कार्य को मजबूत करने के लिए 40महिंद्रा बोलेरो और स्कॉर्पियो एसयूवी वितरित कीं। इन वाहनों को गुवाहाटी में केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह और भाजपा राष्ट्रीय अध्यक्ष जे.पी. नड्डा द्वारा रवाना किया गया। इन वाहनों का उद्देश्य जिला स्तर के नेतृत्व की गतिशीलता बढ़ाना और संगठनात्मक पहुँच को सशक्त बनाना था। ऐसी पहलें अन्य राजनीतिक दलों में दुर्लभ हैं।
यह संगठनात्मक मजबूती भाजपा की मुख्य ताकत है, जिसने 2026के विधानसभा चुनाव में निर्णायक भूमिका निभाई। इसके साथ ही, 2023में चुनाव आयोग द्वारा किया गया परिसीमन (delimitation) भी एक महत्वपूर्ण कारक रहा, जिसने 2001की जनगणना के आधार पर 126 विधानसभा और 14लोकसभा क्षेत्रों की सीमाओं को पुनर्निर्धारित किया। यद्यपि सीटों की कुल संख्या समान रही, लेकिन राजनीतिक संरचना में बड़ा परिवर्तन हुआ। “स्वदेशी” समुदायों के लिए सीटें बढ़ीं, जबकि मुस्लिम बहुल सीटों में कमी आई, जिससे व्यापक राजनीतिक बहस छिड़ गई।
आलोचकों का मानना है कि इससे “सांप्रदायिक जेरिमैंडरिंग” (communal gerrymandering) का प्रभाव उत्पन्न हुआ, जिसके तहत मुस्लिम बहुल क्षेत्रों की सीटें लगभग 35–37से घटकर 20–22रह गईं। कई प्रशासनिक इकाइयों का पुनर्गठन किया गया, जिससे मतदान जनसांख्यिकी में भी महत्वपूर्ण बदलाव आया, जो कथित रूप से भाजपा के पक्ष में गया। भाजपा ने इस कदम का समर्थन करते हुए कहा कि इससे स्वदेशी समुदायों का राजनीतिक भविष्य सुरक्षित हुआ है।
असम चुनाव परिणामों के बाद AIUDF के अध्यक्ष मौलाना बदरुद्दीन अजमल ने कहा कि असम में कांग्रेस खत्म हो चुकी है… कांग्रेस अब मुस्लिम लीग जैसी बन गई है।
— Ankit Kumar Avasthi (@kaankit) May 5, 2026
दिलचस्प है कि असम में कांग्रेस के 19 जीते उम्मीदवारों में 18 मुस्लिम हैं। pic.twitter.com/xGFRHN1qqR
चुनावी जनसांख्यिकी के इस अनुकूल वातावरण और 9अप्रैल 2026को एक चरण में हुए चुनाव कार्यक्रम ने भी भाजपा के लिए स्थिति को और मजबूत किया। दूसरी ओर, विपक्षी एकता अभी पूरी तरह स्पष्ट नहीं थी, जबकि भाजपा ने पहले ही बोडोलैंड पीपुल्स फ्रंट (BOPF) के साथ गठबंधन कर लिया था। असम गण परिषद (AGP) के साथ उसका गठबंधन भी और परिपक्व हो चुका था।
राज्य में विकास कार्यों, महिलाओं और छात्रों के लिए लक्षित योजनाओं तथा लगभग 1,65,000युवाओं को सरकारी नौकरियों में नियुक्ति जैसी उपलब्धियों ने भी भाजपा के पक्ष में माहौल बनाया।इसके अलावा, कांग्रेस के कई महत्वपूर्ण नेताओं जैसे प्रद्युत बोरदोलोई और भूपेन बोरा के पार्टी छोड़ने से कांग्रेस संगठन में भारी अव्यवस्था फैल गई।
इस असमान मुकाबले में भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस (INC), असम जातीय परिषद, रायजोर दल, CPI(M), CPI(ML) और APHLC का गठबंधन विपक्ष के रूप में सामने आया। चुनाव से ठीक पहले बने इस गठबंधन ने विपक्षी राजनीति और सोशल मीडिया में हलचल पैदा कर दी।
कांग्रेस में भी कुछ दलबदल हुए, जिनमें भाजपा की विधायक नंदिता गरलोसा और AGP के कोषाध्यक्ष जयंत खाउंड का विपक्ष में शामिल होना शामिल है। सीमित संसाधनों के बावजूद विपक्ष ने कुछ प्रभावशाली उम्मीदवार उतारे और कड़ी चुनौती दी।
भाजपा सरकार और विशेष रूप से मुख्यमंत्री डॉ. हिमंत बिस्वा सरमा के खिलाफ भ्रष्टाचार के आरोपों ने भी जोर पकड़ा। कांग्रेस के राष्ट्रीय प्रवक्ता पवन खेड़ा ने दिल्ली और गुवाहाटी में प्रेस कॉन्फ्रेंस कर विदेशों में अवैध संपत्ति के आरोप लगाए।
Hemanta Biswa Sharma after Assam election results #Assam #HemantaBiswaSharma #electionresult2026 pic.twitter.com/qA5Jze3tHc
— 7vi Fail (@Sarcastic826541) May 4, 2026
विपक्षी रैलियों में भारी भीड़ देखने को मिली, जिससे चुनावी परिणामों को लेकर उम्मीदें बढ़ीं। जॉरहाट से कांग्रेस नेता गौरव गोगोई की उम्मीदवारी को भी एक बड़ा मोड़ माना जा रहा था, लेकिन वे भाजपा उम्मीदवार हितेन्द्रनाथ गोस्वामी से 20,000 से अधिक मतों से हार गए। इसका एक कारण यह माना गया कि वे अपने क्षेत्र में पर्याप्त समय नहीं दे सके, क्योंकि उन्हें अन्य क्षेत्रों में प्रचार करना पड़ा।
यह उम्मीद भी थी कि जनरेशन Z वोटर विशेष रूप से ज़ुबीन गर्ग के प्रति न्याय की भावना के कारण विपक्ष का समर्थन करेंगे, लेकिन यह प्रभाव मतदान में स्पष्ट रूप से दिखाई नहीं दिया।विपक्ष की कमजोर संगठनात्मक संरचना अपनी बढ़त को वोटों में बदलने में असफल रही, जबकि भाजपा का चुनावी तंत्र पूरे राज्य में प्रभावी रहा।
2026 के असम चुनाव का अंतिम परिणाम विपक्ष के लिए चिंताजनक संकेत देता है। कुल 126 सीटों में से परिणाम इस प्रकार रहे—भाजपा: 82, कांग्रेस: 19, AGP: 10, BOPF: 10, AIUDF: 2और रायजोर दल: 2। एनडीए को कुल 102सीटें मिलीं और उसने सरकार बनाने का स्पष्ट बहुमत हासिल किया।
इतनी बड़ी जीत के बावजूद सरकार चलाना एक चुनौती होगी, लेकिन मुख्यमंत्री हिमंत बिस्वा सरमा के नेतृत्व में यह उम्मीद की जाती है कि आंतरिक विरोधाभासों को नियंत्रित कर लिया जाएगा।विपक्ष के लिए सबसे बड़ी चुनौती एक मजबूत संगठनात्मक ढांचा खड़ा करना है। बिना जमीनी स्तर पर मजबूत उपस्थिति के कोई भी चुनाव जीतना संभव नहीं है।
आज के उपभोक्तावादी समाज में राजनीति मतदाता और पार्टी के बीच लेन-देन आधारित संबंधों पर टिकी है, जिसे विपक्ष को नए सिरे से परिभाषित करना होगा।वहीं भाजपा और उसके सहयोगियों के लिए विकास और जनकल्याणकारी योजनाओं को लगातार आगे बढ़ाना आवश्यक होगा ताकि उनकी राजनीतिक बढ़त बनी रहे।
(लेखक: इतिहास के प्रोफेसर एवं अकादमिक रजिस्ट्रार, गौहाटी विश्वविद्यालय)