इस्लाम में मातृत्व का गौरव: जन्म देने वाली और रूह संवारने वाली माताएं

Story by  आवाज़ द वॉयस | Published by  [email protected] | Date 08-05-2026
The Glory of Motherhood in Islam: Mothers Who Give Birth and Nurture the Soul
The Glory of Motherhood in Islam: Mothers Who Give Birth and Nurture the Soul

 

ईमान सकीना   
 
इस्लाम एक ऐसा धर्म है जिसने माँ के दर्जे को उस ऊंचाई पर बिठाया है जिसकी कल्पना करना भी मुश्किल है। पैगंबर मुहम्मद साहब का वह मशहूर कथन आज भी हर मुसलमान के दिल में बसा है कि जन्नत माँ के कदमों के नीचे है। यह कोई साधारण जुमला नहीं है बल्कि एक बहुत बड़ी हकीकत है। इसका सीधा मतलब यह है कि अगर कोई इंसान खुदा को पाना चाहता है या स्वर्ग का हकदार बनना चाहता है तो उसका रास्ता उसकी माँ की सेवा से होकर गुजरता है। माँ का सम्मान करना केवल एक सामाजिक शिष्टाचार नहीं है बल्कि यह सीधे तौर पर इंसान के ईमान और यकीन से जुड़ा हुआ मामला है।

कुरान मजीद को जब हम पढ़ते हैं तो एक बात बहुत साफ तौर पर उभर कर आती है। अल्लाह ने अपनी इबादत का हुक्म देने के ठीक बाद माता-पिता के साथ अच्छा व्यवहार करने की बात कही है। यह मेल बहुत अहमियत रखता है। यह बताता है कि एक मोमिन के लिए खुदा की बंदगी और माँ की सेवा एक ही सिक्के के दो पहलू हैं।
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माँ केवल वह नहीं है जो बच्चे को दुनिया में लाती है। वह तो वह हस्ती है जो एक बच्चे के दिल की धड़कन को समझती है और उसके चरित्र की नींव रखती है। किसी भी समाज की तरक्की इस बात पर निर्भर करती है कि वहां की माताएं अपने बच्चों को कैसी परवरिश दे रही हैं।
 
इस्लाम ने माँ के उन बलिदानों को बहुत ही खूबसूरती से स्वीकार किया है जिन्हें अक्सर दुनिया नजरअंदाज कर देती है। कुरान में उन तकलीफों का जिक्र है जो एक औरत गर्भावस्था के दौरान सहती है। वह प्रसव की पीड़ा और फिर बरसों तक बच्चे को पालने की मशक्कत को बहुत सम्मान देता है।
 
मातृत्व को केवल एक भूमिका के तौर पर नहीं बल्कि एक इबादत के तौर पर देखा जाता है। माँ की रातों की नींद हराम होना और उसका हर पल अपने बच्चे की फिक्र में डूबे रहना खुदा की नजर में बहुत कीमती है। इसीलिए माँ का शुक्रिया अदा करना हर इंसान का फर्ज है।
 
लेकिन इस महान दर्जे का एक और पहलू भी है जिसकी चर्चा अक्सर कम होती है। वह है आध्यात्मिक माँ की भूमिका। इस्लाम के नजरिए से मातृत्व केवल खून के रिश्तों तक सीमित नहीं है। समाज में ऐसी बहुत सी महिलाएं होती हैं जो भले ही किसी की सगी माँ न हों लेकिन वे हजारों दिलों की परवरिश करती हैं। ये वे महिलाएं हैं जो लोगों की रूह को संवारती हैं और उन्हें सही रास्ता दिखाती हैं। इन्हें हम आध्यात्मिक माताएं कह सकते हैं। इनका काम केवल शरीर को पालना नहीं बल्कि इंसान के भीतर के विश्वास और नैतिकता को जिंदा रखना है।
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आध्यात्मिक मातृत्व का सबसे बड़ा उदाहरण हमें पैगंबर साहब की पत्नियों के रूप में मिलता है। उन्हें 'उम्माहातुल मोमिनीन' यानी तमाम ईमान वालों की माँ कहा जाता है। वे किसी की सगी माँ नहीं थीं लेकिन पूरे मुस्लिम समाज के लिए वे एक ढाल और मार्गदर्शक की तरह थीं।
 
उन्होंने लोगों को दीन सिखाया और मुश्किल वक्त में उनकी हिम्मत बढ़ाई। उनके ज्ञान और उनके ऊंचे चरित्र ने आने वाली पीढ़ियों के लिए एक ऐसा रास्ता बनाया जिस पर चलकर आज भी लोग अपनी जिंदगी संवार रहे हैं। यह दर्जा हमें सिखाता है कि ममता का दायरा बहुत बड़ा है।
 
एक आध्यात्मिक माँ वह शिक्षिका भी हो सकती है जो अपनी छात्राओं को केवल किताबी ज्ञान नहीं देती बल्कि उन्हें जिंदगी जीने का सलीका सिखाती है। वह एक बड़ी बहन भी हो सकती है जो अपने छोटे भाई-बहनों को सही और गलत का फर्क बताती है।
 
 
हमारे आसपास ऐसी बहुत सी बुजुर्ग महिलाएं होती हैं जिनकी बातें हमारे दिलों को सुकून देती हैं। वे बिना किसी लालच के दूसरों की भलाई के लिए दुआ करती हैं और नेक मशवरे देती हैं। उनकी मौजूदगी ही किसी समाज के लिए बरकत की तरह होती है।
 
आज के इस दौर में जहां हर तरफ भागदौड़ मची है वहां इन आध्यात्मिक माताओं की जरूरत और भी बढ़ गई है। आज की युवा पीढ़ी अक्सर अकेलापन महसूस करती है और उन्हें सही मार्गदर्शन नहीं मिल पाता। ऐसे में उन महिलाओं की जिम्मेदारी बढ़ जाती है जो समाज में अपना एक मुकाम रखती हैं। उन्हें आगे आकर युवाओं का हाथ थामना चाहिए। एक आध्यात्मिक माँ की पहचान यह है कि वह दूसरों की गलतियों पर पर्दा डालती है और उन्हें प्यार से सुधारती है। वह डराने के बजाय हौसला देती है।
 
सच्ची परवरिश का मतलब केवल अच्छा खाना खिलाना या अच्छे कपड़े पहनाना नहीं है। असली परवरिश तो वह है जिसे इस्लाम में 'तरबियत' कहा गया है। तरबियत का मतलब है इंसान के भीतर के इंसान को जगाना। इसमें सब्र, ईमानदारी और दूसरों के प्रति दया भाव जैसे गुण शामिल हैं। एक आध्यात्मिक माँ इन्हीं गुणों को दूसरों में बांटती है। वह अपने आचरण से एक ऐसी मिसाल पेश करती है जिसे देखकर दूसरे भी वैसा ही बनने की कोशिश करते हैं।
 
यह समझना बहुत जरूरी है कि आध्यात्मिक माँ बनने के लिए किसी खास पद या शोहरत की जरूरत नहीं है। यह काम घर की चारदीवारी के अंदर रहकर भी किया जा सकता है। एक औरत जो अपने पड़ोस के बच्चों को प्यार से कुछ सिखा देती है या किसी परेशान हाल इंसान की बात तसल्ली से सुन लेती है वह भी इसी दर्जे में आती है। छोटे-छोटे नेक काम ही बड़े बदलाव की शुरुआत करते हैं। जब महिलाएं एक-दूसरे को नीचा दिखाने के बजाय एक-दूसरे का सहारा बनती हैं तो एक मजबूत समाज का निर्माण होता है।
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इस्लाम का यह संदेश बहुत साफ है कि सफलता केवल धन-दौलत जमा करने में नहीं है। असली कामयाबी तो इसमें है कि हम अपने पीछे कैसा असर छोड़कर जा रहे हैं। एक जन्म देने वाली माँ एक पीढ़ी तैयार करती है लेकिन एक आध्यात्मिक माँ एक पूरी विचारधारा को जिंदा रखती है। उसकी दी हुई शिक्षा और उसकी नेक सलाह सदियों तक लोगों के दिलों में गूँजती रहती है। यह एक ऐसा सदका है जिसका फल इंसान को मरने के बाद भी मिलता रहता है।
 
अंत में हमें यह सोचना चाहिए कि क्या हम अपने समाज की ऐसी महिलाओं का सम्मान कर रहे हैं? क्या हम उनकी कद्र करना जानते हैं जो चुपचाप हमारे चरित्र को संवारने में जुटी हैं? माँ चाहे जन्म देने वाली हो या रूह को पालने वाली उसका स्थान हमेशा ऊंचा रहना चाहिए।
 
आज के दौर में जब परिवार टूट रहे हैं और आपसी रिश्ते कमजोर हो रहे हैं तब इन माताओं की भूमिका और भी अहम हो जाती है। हमें इस गौरवशाली परंपरा को फिर से जिंदा करना होगा ताकि आने वाली पीढ़ियां एक बेहतर और नेक समाज में सांस ले सकें।
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