सपनों के शहर में संघर्ष करती बस्तियां

Story by  आवाज़ द वॉयस | Published by  [email protected] | Date 08-05-2026
Struggling Settlements in the City of Dreams
Struggling Settlements in the City of Dreams

 

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चंचल

भारत के तेजी से शहरीकरण करते परिदृश्य में एक तरफ चमचमाते मॉल, ऊँची इमारतें और स्मार्ट सिटी का सपना है, तो दूसरी ओर उन्हीं शहरों के भीतर ऐसी स्लम बस्तियाँ भी हैं जहाँ जीवन आज भी बुनियादी सुविधाओं के लिए संघर्ष का दूसरा नाम बना हुआ है। शहरों की अर्थव्यवस्था को चलाने वाले यही प्रवासी मजदूर और उनके परिवार अक्सर उन बस्तियों में रहने को मजबूर होते हैं जहाँ न साफ-सफाई की समुचित व्यवस्था होती है, न पीने के स्वच्छ पानी की उपलब्धता। इन बस्तियों में केवल गरीबी और संघर्षों की कहानियाँ ही छिपी नहीं होती हैं, बल्कि सामाजिक असमानता, प्रशासनिक उपेक्षा और विकास के असंतुलित मॉडल का भी आईना होता है।

राजस्थान के जयपुर स्थित बाबा रामदेव स्लम बस्ती इसका एक जीवंत उदाहरण है। अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति बहुल इस बस्ती की जनसंख्या 500से अधिक है. इसमें लोहार, मिरासी, रद्दी बेचने वाले, फ़कीर, शादी ब्याह में ढोल बजाने वाले, बांस से सामान बनाने वाले बागरिया समुदाय और दिहाड़ी मज़दूरी का काम करने वालों की संख्या अधिक है. इस बस्ती में साक्षरता की दर भी काफी कम है. यहाँ रहने वाले अधिकांश परिवार राजस्थान और देश के अन्य राज्यों के ग्रामीण इलाकों से रोजगार की तलाश में आए हैं। जहां शहर ने उन्हें काम तो दिया, लेकिन सम्मानजनक जीवन नहीं।

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इस बस्ती में गंदगी और जलभराव आम समस्या है। संकरी गलियों में कूड़े के ढेर, खुले नाले और दूषित जल स्रोत बीमारियों को खुला न्योता देते हैं। कई परिवारों को पीने के लिए साफ पानी तक नसीब नहीं होता, जिसके कारण डायरिया, टाइफाइड और त्वचा संबंधी बीमारियां आम हैं। स्वच्छ भारत अभियान जैसे प्रयासों के बावजूद इन बस्तियों तक सफाई की व्यवस्था प्रभावी ढंग से नहीं पहुंच पाई है।

भारत की 2011की जनगणना के अनुसार देश में लगभग 6.5करोड़ लोग स्लम बस्तियों में रहते हैं, जो कुल शहरी आबादी का लगभग 17प्रतिशत है। विभिन्न रिपोर्ट्स के अनुसार, इन बस्तियों में रहने वाले करीब 40प्रतिशत लोगों के पास शुद्ध पेयजल की नियमित सुविधा नहीं है, जबकि लगभग 30प्रतिशत परिवारों को शौचालय जैसी मूलभूत सुविधा भी उपलब्ध नहीं है। यह स्थिति केवल स्वास्थ्य संकट ही नहीं, बल्कि मानव गरिमा के लिए भी एक गंभीर चुनौती है।

इन समस्याओं के बीच सबसे अधिक प्रभावित होते हैं बच्चे। पलायन कर इन बस्तियों में रहने वाले परिवारों के पास अक्सर वैध दस्तावेज़ नहीं होते, जैसे कि आधार कार्ड, निवास प्रमाण पत्र या जन्म प्रमाण पत्र। इसके अभाव में उनके बच्चों का स्कूल में दाखिला नहीं हो पाता।

शिक्षा से वंचित ये बच्चे धीरे-धीरे गलत संगत में पड़ जाते हैं। कई बच्चे नशे की लत का शिकार हो जाते हैं या फिर बाल मजदूरी करने लगते हैं। सड़कों पर काम करते, कूड़ा बीनते या छोटे-मोटे ढाबों पर काम करते बच्चे हमारे समाज की उस सच्चाई को उजागर करते हैं जिसे हम अक्सर नजरअंदाज कर देते हैं।

विशेष रूप से किशोरियों की स्थिति और भी चिंताजनक है। शिक्षा के अभाव और सामाजिक दबाव के कारण इनकी कम उम्र में ही शादी कर दी जाती है। जल्द ही वे मातृत्व की जिम्मेदारी उठा लेती हैं, लेकिन पर्याप्त पोषण और स्वास्थ्य सुविधाओं के अभाव में वे कुपोषण का शिकार हो जाती हैं। राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण (NFHS-5) के अनुसार भारत में 15-19वर्ष की लगभग 23प्रतिशत किशोरियाँ कुपोषण से ग्रस्त हैं, और स्लम क्षेत्रों में यह प्रतिशत और भी अधिक है।

स्लम बस्तियों में महिलाओं की स्थिति भी बेहद असुरक्षित होती है। घरेलू हिंसा, यौन उत्पीड़न और शोषण के मामले यहाँ अधिक देखने को मिलते हैं। तंग गलियाँ, असुरक्षित वातावरण और सामाजिक जागरूकता की कमी महिलाओं के लिए भय का कारण बनती है। कई महिलाएं आर्थिक रूप से आत्मनिर्भर नहीं होतीं, जिससे वे हिंसा के खिलाफ आवाज उठाने में भी असमर्थ रहती हैं। यह स्थिति न केवल महिलाओं के अधिकारों का हनन है, बल्कि समाज के समग्र विकास में भी बाधा उत्पन्न करती है।

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बाबा रामदेव स्लम बस्ती में रहने वाली एक किशोरी की कहानी इस स्थिति को और स्पष्ट करती है। वह बताती है कि कैसे उसके माता-पिता के पास कोई दस्तावेज नहीं होने के कारण वह स्कूल नहीं जा पाई। कुछ समय बाद उसकी शादी कर दी गई और अब वह कम उम्र में ही माँ बन चुकी है।

पोषण की कमी और स्वास्थ्य सेवाओं की अनुपलब्धता के कारण उसका बच्चा भी कमजोर है। यह केवल एक कहानी नहीं, बल्कि हजारों ऐसी लड़कियों की सच्चाई है जो अपने सपनों को जीने से पहले ही जिम्मेदारियों के बोझ तले दब जाती हैं।

इन समस्याओं के समाधान के लिए केवल सरकारी योजनाएँ बनाना पर्याप्त नहीं है, बल्कि उनका प्रभावी क्रियान्वयन भी आवश्यक है। सबसे पहले, स्लम बस्तियों में रहने वाले लोगों के लिए दस्तावेज़ बनाने की प्रक्रिया को सरल और सुलभ बनाना होगा, ताकि उनके बच्चों को शिक्षा का अधिकार मिल सके।

मोबाइल स्कूल, सामुदायिक शिक्षा केंद्र और गैर-सरकारी संगठनों की भागीदारी से बच्चों को शिक्षा से जोड़ा जा सकता है। साथ ही, स्वच्छ पेयजल और सफाई व्यवस्था को प्राथमिकता देनी होगी। स्थानीय प्रशासन को इन बस्तियों में नियमित सफाई, कचरा प्रबंधन और जल आपूर्ति सुनिश्चित करनी चाहिए।

किशोरियों और महिलाओं के लिए विशेष स्वास्थ्य और पोषण कार्यक्रम चलाने की आवश्यकता है, ताकि वे कुपोषण और स्वास्थ्य समस्याओं से बच सकें। महिला सुरक्षा के लिए जागरूकता अभियान और कानूनी सहायता केंद्र भी स्थापित किए जाने चाहिए।

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अंततः, यह समझना होगा कि स्लम बस्तियों में रहने वाले लोग समाज के हाशिए पर खड़े वे नागरिक हैं, जिनकी मेहनत से शहर चलता है। उन्हें केवल दया नहीं, बल्कि अधिकार और सम्मान की आवश्यकता है। यदि हम वास्तव में एक समावेशी और विकसित भारत का सपना देख रहे हैं, तो इन बस्तियों की स्थिति में सुधार लाना हमारी प्राथमिकता होनी चाहिए। जब तक शहर के हर कोने में रहने वाले लोगों को समान अवसर और सुविधाएँ नहीं मिलेंगी, तब तक सपनों के शहर में संघर्ष करती बस्तियां नजर आती रहेंगी।

(यह लेखिका के निजी विचार हैं)