वैश्विक भरोसे का नया केंद्र बनने की राह पर भारत

Story by  आवाज़ द वॉयस | Published by  [email protected] | Date 18-07-2026
India on the path to becoming a new hub of global trust.
India on the path to becoming a new hub of global trust.

 

राजीव नारायण

बदलती वैश्विक राजनीति के बीच दुनिया की अर्थव्यवस्था भी नए दौर में प्रवेश कर चुकी है। अब केवल सस्ता उत्पादन या बड़ा बाजार ही किसी देश की ताकत नहीं माना जा रहा। सबसे बड़ी पूंजी भरोसा बन गया है। वैश्विक कंपनियां और निवेशक अब ऐसे देशों की तलाश में हैं जहां राजनीतिक स्थिरता हो, नीतियों में निरंतरता हो और लंबे समय तक निवेश सुरक्षित रह सके। ऐसे माहौल में भारत के सामने एक बड़ा अवसर दिखाई दे रहा है। विशेषज्ञों का मानना है कि यदि भारत अपनी आर्थिक और कूटनीतिक रणनीति को सही दिशा में आगे बढ़ाता है तो वह दुनिया का सबसे भरोसेमंद आर्थिक केंद्र बन सकता है।

अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष के अनुसार भारत दुनिया की सबसे तेज गति से बढ़ने वाली बड़ी अर्थव्यवस्थाओं में शामिल है। वर्ष 2026 में भारत की आर्थिक वृद्धि दर छह प्रतिशत से अधिक रहने का अनुमान है। यह उस समय हो रहा है जब वैश्विक अर्थव्यवस्था की वृद्धि दर करीब तीन प्रतिशत के आसपास रहने की संभावना जताई जा रही है। लेकिन जानकारों का कहना है कि आने वाले वर्षों में केवल विकास दर ही भारत की पहचान नहीं होगी। सबसे महत्वपूर्ण होगा दुनिया का विश्वास।

कोविड महामारी ने पूरी दुनिया को झकझोर दिया। इसके बाद रूस और यूक्रेन युद्ध ने वैश्विक व्यापार को प्रभावित किया। अमेरिका और चीन के बीच बढ़ती प्रतिस्पर्धा ने सप्लाई चेन को नई दिशा दी। पश्चिम एशिया में बढ़ते तनाव ने समुद्री व्यापार और ऊर्जा आपूर्ति पर भी असर डाला। इन घटनाओं ने यह साफ कर दिया कि व्यापार और भू राजनीति अब एक दूसरे से अलग नहीं हैं। कंपनियां अब केवल उत्पादन लागत नहीं देख रहीं। वे यह भी देख रही हैं कि निवेश किस देश में सबसे अधिक सुरक्षित रहेगा।

भारत की आर्थिक यात्रा भी इस बदलाव के बीच नई ऊंचाई पर पहुंची है। वर्ष 1991 के आर्थिक सुधारों के बाद भारतीय अर्थव्यवस्था तीन सौ अरब डॉलर से बढ़कर चार ट्रिलियन डॉलर से अधिक हो चुकी है। आज भारत वैश्विक विकास का एक प्रमुख इंजन माना जाता है। यही कारण है कि दुनिया की बड़ी कंपनियां और कई देश भारत को दीर्घकालिक साझेदार के रूप में देख रहे हैं।

भारत की सबसे बड़ी ताकत उसकी संतुलित विदेश नीति मानी जा रही है। भारत एक तरफ अमेरिका के साथ रणनीतिक साझेदारी को मजबूत कर रहा है तो दूसरी ओर रूस के साथ रक्षा संबंध बनाए हुए है। यूरोपीय संघ और जापान के साथ आर्थिक सहयोग बढ़ रहा है।

खाड़ी देशों से ऊर्जा संबंध मजबूत हैं। अफ्रीका के साथ संपर्क लगातार बढ़ रहा है। भारत क्वाड, ब्रिक्स और जी बीस जैसे महत्वपूर्ण वैश्विक मंचों पर सक्रिय भूमिका निभा रहा है। सीमा विवाद के बावजूद चीन के साथ व्यापारिक संबंध भी जारी हैं। यही संतुलन भारत को अन्य देशों से अलग पहचान देता है।

विशेषज्ञों का कहना है कि भारत की यह नीति तटस्थता नहीं बल्कि विकल्पों की क्षमता है। यही क्षमता आने वाले समय में भारत को वैश्विक निवेशकों के लिए सबसे भरोसेमंद गंतव्य बना सकती है। दुनिया ऐसे देशों की तलाश में है जो किसी एक गुट तक सीमित न हों और हर परिस्थिति में आर्थिक सहयोग जारी रख सकें।

डिजिटल क्षेत्र में भारत ने पिछले कुछ वर्षों में उल्लेखनीय उपलब्धियां हासिल की हैं। आधार और यूनिफाइड पेमेंट्स इंटरफेस यानी यूपीआई आज दुनिया के सबसे बड़े डिजिटल प्लेटफॉर्म में गिने जाते हैं। आधार से लगभग एक सौ चालीस करोड़ लोग जुड़े हैं जबकि यूपीआई के माध्यम से हर महीने दो हजार करोड़ के करीब डिजिटल लेनदेन हो रहे हैं। कई देश भारत के डिजिटल पब्लिक इंफ्रास्ट्रक्चर मॉडल का अध्ययन कर रहे हैं। इससे भारत की डिजिटल अर्थव्यवस्था और डिजिटल इंडिया की वैश्विक पहचान लगातार मजबूत हो रही है।

मैन्युफैक्चरिंग सेक्टर में भी भारत तेजी से आगे बढ़ रहा है। प्रोडक्शन लिंक्ड इंसेंटिव योजना के कारण इलेक्ट्रॉनिक्स, सेमीकंडक्टर, ऑटोमोबाइल और फार्मास्यूटिकल उद्योग में निवेश बढ़ा है। सड़क, बंदरगाह, एयरपोर्ट, लॉजिस्टिक्स और माल ढुलाई गलियारों में हो रहे बड़े निवेश से व्यापार आसान हुआ है। मोबाइल फोन निर्यात दो लाख करोड़ रुपये से अधिक पहुंच चुका है। इससे भारत वैश्विक सप्लाई चेन का महत्वपूर्ण हिस्सा बनता जा रहा है।

विदेशी निवेश के मोर्चे पर भी भारत लगातार मजबूत स्थिति में है। संयुक्त राष्ट्र व्यापार एवं विकास संगठन ने एशिया को दुनिया का सबसे आकर्षक निवेश क्षेत्र बताया है। भारत इसमें प्रमुख निवेश गंतव्य के रूप में उभरा है। वैश्विक निवेश में सुस्ती के बावजूद भारत में चालीस अरब डॉलर से अधिक का प्रत्यक्ष विदेशी निवेश आ रहा है। इससे निवेशकों के भरोसे का संकेत मिलता है।

भारत केवल उत्पादन का केंद्र नहीं बन रहा। दुनिया की बड़ी बहुराष्ट्रीय कंपनियां यहां अपने ग्लोबल कैपेबिलिटी सेंटर भी स्थापित कर रही हैं। अनुसंधान, इंजीनियरिंग, वित्तीय सेवाएं, कृत्रिम बुद्धिमत्ता, डिजिटल संचालन और नवाचार से जुड़े हजारों विशेषज्ञ भारत में काम कर रहे हैं। देश में सत्रह सौ से अधिक ग्लोबल कैपेबिलिटी सेंटर सक्रिय हैं और इनमें बीस लाख से अधिक पेशेवर कार्यरत हैं। आने वाले वर्षों में इनसे सौ अरब डॉलर तक का वार्षिक आर्थिक मूल्य सृजित होने का अनुमान है।

विश्लेषकों का कहना है कि स्विट्जरलैंड ने वित्तीय भरोसे के कारण वैश्विक पहचान बनाई। सिंगापुर ने पारदर्शिता और स्थिरता के दम पर अंतरराष्ट्रीय व्यापार का प्रमुख केंद्र बनने में सफलता हासिल की। संयुक्त अरब अमीरात भी प्रतिस्पर्धी क्षेत्रों के बीच व्यापारिक पुल बन चुका है। भारत के पास इन देशों से कहीं बड़ा घरेलू बाजार, विशाल युवा आबादी, तकनीकी क्षमता और मजबूत डिजिटल ढांचा मौजूद है। इसलिए भारत के पास वैश्विक आर्थिक नेतृत्व हासिल करने की वास्तविक संभावना दिखाई देती है।

भारत वर्ष 2047 तक विकसित राष्ट्र बनने का लक्ष्य लेकर आगे बढ़ रहा है। इसके लिए केवल सकल घरेलू उत्पाद में वृद्धि पर्याप्त नहीं होगी। वैश्विक निवेश, उन्नत विनिर्माण, तकनीकी नवाचार, डिजिटल अर्थव्यवस्था और विश्वसनीय व्यापारिक साझेदारी को समान महत्व देना होगा। अंतरराष्ट्रीय विशेषज्ञ मानते हैं कि भविष्य उसी देश का होगा जिस पर दुनिया सबसे अधिक भरोसा करेगी। मौजूदा परिस्थितियों में भारत के पास यह अवसर मौजूद है कि वह वैश्विक अर्थव्यवस्था का सबसे विश्वसनीय केंद्र बनकर उभरे।

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