दावों के बीच क्यों अधूरी गांवों के विकास की नींव?

Story by  आवाज़ द वॉयस | Published by  [email protected] | Date 17-07-2026
Why does the foundation of village development remain incomplete amidst the claims?
Why does the foundation of village development remain incomplete amidst the claims?

 

ffपुष्पांजलि कुमारी

भारत की आत्मा गांवों में बसती है। यह बात हम सालों से सुनते आ रहे हैं। यह सिर्फ कोई कहावत नहीं है। हमारे देश का पूरा सामाजिक और आर्थिक ढांचा इसी पर टिका है। आज भी भारत की एक बहुत बड़ी आबादी ग्रामीण इलाकों में रहती है। इन लोगों की जिंदगी खेती, पशुपालन और छोटे-मोटे रोजगार के भरोसे चलती है। लेकिन हकीकत यह है कि जब तक किसी गांव में पक्की सड़क, बिजली, साफ पानी, रोजगार और अच्छी शिक्षा जैसी बुनियादी सुविधाएं नहीं पहुंचतीं, तब तक विकास का कोई मतलब नहीं रह जाता।

सुविधाओं की कमी सिर्फ आर्थिक रूप से नुकसान नहीं पहुंचाती, बल्कि यह लोगों के स्वास्थ्य, बच्चों की पढ़ाई और उनके सुरक्षित भविष्य को भी अंधकार में धकेल देती है। बिहार के मुजफ्फरपुर जिले का चरकोरिया गांव इसका एक जीता-जागता उदाहरण है।

इस गांव में आज भी जमीनी स्तर पर कई बुनियादी कमियां साफ नजर आती हैं। गांव के कई हिस्सों में जाने के लिए आज भी ढंग के रास्ते नहीं हैं। बरसात के दिनों में यहां की सड़कें कीचड़ में बदल जाती हैं। तब लोगों का पैदल चलना भी दूभर हो जाता है।

कुछ जगहों पर पुल न होने की वजह से ग्रामीणों को कई किलोमीटर का लंबा चक्कर लगाना पड़ता है। बिजली के तार तो खिंच गए हैं लेकिन उसकी आंख-मिचौनी से लोग परेशान रहते हैं। बिजली की इस अनियमित आपूर्ति के कारण बच्चों की पढ़ाई प्रभावित होती है और छोटे कारोबार ठप पड़ जाते हैं।

dd

पीने के साफ पानी की किल्लत भी यहां के कई परिवारों के लिए रोज की मुसीबत बन चुकी है। सबसे बड़ा संकट युवाओं के सामने है। गांव में कमाई का कोई साधन न होने के कारण हर साल भारी संख्या में नौजवान दूसरे राज्यों की तरफ पलायन करने को मजबूर हैं।

ग्रामीण विकास का मतलब सिर्फ बड़ी-बड़ी इमारतों का ढांचा खड़ा करना या नई योजनाओं की घोषणा करना नहीं होता। असली विकास तब माना जाएगा जब गांव के हर आखिरी व्यक्ति को इन सुविधाओं का लाभ बिना किसी भेदभाव के मिलने लगे।

किसी भी गांव में महिलाएं घर और समाज की धुरी होती हैं। पानी लाने से लेकर, चूल्हा-चौका संभालने और बच्चों की देखभाल तक की जिम्मेदारी उन्हीं पर होती है। अगर उन्हें पानी के लिए दूर पैदल जाना पड़े या टूटी सड़कों के कारण अस्पताल पहुंचने में देरी हो, तो उनकी मुश्किलें कई गुना बढ़ जाती हैं। ठीक इसी तरह सड़कों की बदहाली से बुजुर्गों का इलाज समय पर नहीं हो पाता और किसानों की फसलें सही समय पर मंडियों तक नहीं पहुंच पातीं।

किसी भी क्षेत्र की तरक्की के लिए वहां का बुनियादी ढांचा सबसे मजबूत होना चाहिए। पक्की सड़कें केवल आने-जाने का रास्ता नहीं होतीं, बल्कि वे गांव को शहर के स्कूलों, अस्पतालों और बाजारों से जोड़ती हैं।

बिजली सिर्फ अंधेरा दूर करने के काम नहीं आती। यह छोटे उद्योगों को चलाने, बच्चों को डिजिटल शिक्षा देने और आधुनिक खेती के लिए बेहद जरूरी है। स्वच्छ पेयजल एक स्वस्थ समाज की पहली शर्त है। इसी तरह अच्छे स्कूल आने वाली पीढ़ी को आगे बढ़ने के नए मौके देते हैं। जब इन सभी चीजों का विकास एक साथ और संतुलित तरीके से होगा, तभी कोई भी गांव आत्मनिर्भर बन पाएगा।

पिछले एक दशक के दौरान बिहार के ग्रामीण इलाकों में बुनियादी ढांचे को सुधारने के लिए कई सरकारी प्रयास जरूर हुए हैं। राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण की हालिया रिपोर्ट भी बताती है कि राज्य में बिजली की पहुंच पहले के मुकाबले काफी बेहतर हुई है।

ज्यादातर ग्रामीण घर अब बिजली ग्रिड से जुड़ चुके हैं। इसके अलावा जल जीवन मिशन के आंकड़ों को देखें तो एक बड़ा बदलाव नजर आता है। साल 2019तक बिहार के ग्रामीण इलाकों में नल से जल की सुविधा केवल एक या दो प्रतिशत घरों तक ही सीमित थी।

वहीं साल 2025तक यह आंकड़ा बढ़कर लगभग 97प्रतिशत से अधिक ग्रामीण परिवारों तक पहुंच चुका है। इसी तरह प्रधानमंत्री ग्राम सड़क योजना के तहत हजारों किलोमीटर लंबी ग्रामीण सड़कों का जाल बिछाया गया है।

इससे कई कटे हुए गांवों को हर मौसम में चालू रहने वाली पक्की सड़कें मिली हैं। बिहार सरकार की आर्थिक सर्वेक्षण 2024–25की रिपोर्ट भी यही दावा करती है कि सड़क, पानी और बिजली के क्षेत्र में पिछले दस सालों में उल्लेखनीय प्रगति दर्ज की गई है।

लेकिन सरकारी कागजों के ये औसत आंकड़े पूरी सच्चाई बयां नहीं करते। आज भी जमीनी हकीकत इन दावों से काफी अलग है। चरकोरिया जैसे सैकड़ों गांव आज भी इस बात के गवाह हैं कि योजनाओं का पूरा लाभ आखिरी छोर पर बैठे व्यक्ति तक नहीं पहुंच पा रहा है।

अगर किसी गांव में सड़क तो बना दी गई है लेकिन नदी पर पुल नहीं है, तो उस सड़क का फायदा आधा रह जाता है। अगर बिजली के खंभे और मीटर लग गए हैं पर चौबीस घंटे में से चंद घंटे ही बिजली आती है, तो उसे विकास नहीं कहा जा सकता।

इसी तरह स्कूल की इमारत खड़ी कर देने से बच्चे नहीं पढ़ जाते, जब तक कि वहां पढ़ाने के लिए पर्याप्त शिक्षक न हों। इसलिए सिर्फ योजनाएं लागू करना काफी नहीं है। उनकी गुणवत्ता की जांच करना और उन्हें समय पर पूरा करना भी उतना ही जरूरी है।

इसके साथ ही ग्रामीण इलाकों में युवाओं के लिए स्थानीय स्तर पर रोजगार पैदा करना आज की सबसे बड़ी जरूरत है। अगर गांवों के आसपास ही खेती से जुड़े छोटे उद्योग, डेयरी फार्म, फूड प्रोसेसिंग यूनिट और हुनर सिखाने वाले केंद्र खोल दिए जाएं, तो युवाओं को नौकरी के लिए अपना घर-बार छोड़कर बाहर नहीं भागना पड़ेगा।

इससे गांवों की अपनी अर्थव्यवस्था मजबूत होगी और लोगों का जीवनस्तर सुधरेगा। इसके साथ ही हर गांव में अच्छे स्कूल, एक छोटी लाइब्रेरी और इंटरनेट की सुविधा होनी चाहिए ताकि ग्रामीण बच्चे भी शहरों की तरह आगे बढ़ सकें। गांवों के प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्रों में डॉक्टरों की नियमित मौजूदगी, जरूरी दवाइयां और बुनियादी इलाज के उपकरण होने से लोगों को छोटे-छोटे इलाज के लिए बड़े शहरों के चक्कर नहीं काटने पड़ेंगे।

आज जरूरत इस बात की है कि हम केवल ऊपर से योजनाएं बनाकर नीचे न थोपें। बल्कि स्थानीय लोगों के बीच जाकर उनकी असली जरूरतों को समझें और उसी हिसाब से काम की प्राथमिकता तय करें।

ss

किसी भी गांव का विकास तभी सच्चा और सफल माना जाएगा जब वहां रहने वाला हर नागरिक एक सम्मानजनक जीवन जी सके। जब बच्चों को अच्छी शिक्षा के लिए भटकना न पड़े, किसानों को अपनी उपज का सही दाम मिले, महिलाओं को सुरक्षित माहौल मिले और युवाओं को अपने ही घर में एक बेहतर भविष्य की उम्मीद दिखाई दे।

इसके लिए सरकार, स्थानीय प्रशासन, पंचायत प्रतिनिधियों और खुद ग्रामीणों को मिलकर एक ठोस योजना तैयार करनी होगी। इस योजना में जमीन से जुड़े असली मुद्दों को सबसे ऊपर रखना होगा। निर्माण कार्यों में होने वाले भ्रष्टाचार को रोकने के लिए नियमित निगरानी की व्यवस्था जरूरी है।

विकास के हर काम में महिलाओं और युवाओं की राय को शामिल किया जाना चाहिए। शिक्षा, स्वास्थ्य और रोजगार को भी उतना ही महत्व मिलना चाहिए जितना सड़कों और बिजली को दिया जाता है। जब तक आम आदमी की बुनियादी जरूरतों को केंद्र में रखकर नीतियां नहीं बनाई जाएंगी, तब तक आत्मनिर्भर ग्रामीण भारत का सपना अधूरा ही रहेगा।