ताजुद्दीन बाबा : में हिंदू मुस्लिम एकता की अनोखी तस्वीर

Story by  आवाज़ द वॉयस | Published by  onikamaheshwari | Date 18-07-2026
The Urs of a Muslim elder at Nagpur's Tajbagh is inaugurated every year by the Hindu royal family.
The Urs of a Muslim elder at Nagpur's Tajbagh is inaugurated every year by the Hindu royal family.

 

अल्फिया शेख

नागपुर के ताजबाग में इस हफ़्ते एक बार फिर क़व्वाली और दुआओं की सदाएँ गूँज रही हैं। सूफ़ी बुज़ुर्ग हज़रत बाबा ताजुद्दीन का 104वां सालाना उर्स 8 जुलाई से शुरू हो चुका है और 19 जुलाई तक जारी रहेगा। हर साल की तरह इस बार भी ताजुद्दीन बाबा ट्रस्ट ने इसका इंतज़ाम किया है। उमरेड रोड पर वाक़्य दरगाह पर हज़ारों ज़ायरीन मिलाद, क़व्वाली और रोज़ाना की दुआओं के लिए पहुँच चुके हैं।

इस साल का उर्स भी सौ बरस पुरानी उसी भरी-पुरी रिवायत के मुताबिक़ मनाया जा रहा है। रोज़ाना के मिलाद और क़व्वाली के अलावा बारह दिनों में तक़रीर, महफ़िल-ए-ज़िक्र, नात-ओ-मनक़बत और सलातो सलाम जैसे प्रोग्राम ट्रस्ट ने तय किए हैं। चंदन का लेप लगी चादर शहर में जुलूस की शक्ल में निकालकर मज़ार पर चढ़ाने की शाही संदल की रस्म इस बार 12 जुलाई को होगी।

हज़रत बाबा ताजुद्दीन की पैदाइश 27 जनवरी 1861 को नागपुर के नज़दीक कामठी में हुई। उनका असली नाम सय्यद ताजुद्दीन मुहम्मद बद्रुद्दीन था। उनका ख़ानदान सादात में शुमार होता था और नबी-ए-करीम से निस्बत रखता था। बचपन में ही वालदैन का साया सर से उठ गया और चचा ने उनकी परवरिश की। उर्दू, फ़ारसी, अरबी और अंग्रेज़ी ज़बानें उन्होंने सीखीं।

1881 में वह ब्रिटिश हिंदुस्तानी फ़ौज की 13वीं नागपुर रेजिमेंट में भर्ती हुए, मगर 1884 में फ़ौज छोड़कर फ़क़ीरी का रास्ता अपना लिया। शुरुआती दौर में उनका हाल इतना अजीब था कि कुछ अरसे के लिए उन्हें शहर के पनाहगाह में रखा गया, मगर आहिस्ता-आहिस्ता लोगों ने उन्हें दीवाना नहीं, बल्कि ख़ुदा का बंदा मानना शुरू किया। वक़्त के साथ वह अपने दौर के सबसे मोहतरम सूफ़ी बुज़ुर्गों में शुमार होने लगे।

बाबा को शाही ख़ानदान से जोड़ने वाला एक दिलचस्प वाक़िया मशहूर है। नागपुर के भोसले शाही ख़ानदान के राजा रघोजी राव भोसले की बहू हामिला हालत में सख़्त बीमार पड़ गई थीं और डॉक्टरों ने भी उम्मीद छोड़ दी थी। भोसले ख़ानदान की रिवायत के मुताबिक़ बाबा की दुआ से माँ और बच्चा दोनों सलामत बच गए। एहसान के तौर पर राजा ने बाबा को अपने महल में क़याम की दावत दी। बाबा 1908 से लेकर 1925 में अपने विसाल तक इसी महल में रहे।

बाबा की पहचान सिर्फ़ महल में गुज़ारे बरसों तक महदूद नहीं। बीमारों के शिफ़ायाब होने और मायूस दिलों को सुकून मिलने की कहानियाँ आज भी ज़ायरीन सुनाते हैं। इनमें एक क़िस्सा उस फ़ौजी की बीवी का है, जो अपने लापता शौहर के लिए ताजबाग में दुआ माँगने आई थी। बाबा ने बस इतना कहा कि वह लौट रहा है, और चंद दिनों में ही शौहर सही-सलामत घर पहुँच गया। ऐसी कहानियों की वजह से ही बाबा को उस दौर का क़ुतुब, यानी सबसे बुलंद मक़ाम रखने वाला रूहानी बुज़ुर्ग माना जाने लगा।

शाही ख़ानदान से बना यह रिश्ता बाबा के विसाल के बाद भी सौ बरस से क़ायम है। हर साल उर्स का आग़ाज़ परचम कुशाई की रस्म से होता है, यानी दरगाह पर हरा परचम लहराया जाता है। उर्स की यह पहली और सबसे अहम रस्म कोई मौलवी नहीं, बल्कि हिंदू भोसले ख़ानदान का कोई फ़र्द अदा करता है। पिछले कुछ बरसों का रिकॉर्ड देखें तो यह बात साफ़ नज़र आती है।

2018 में 96वें उर्स में यह शरफ़ श्रीमंत राजे रघुजीराव भोसले को मिला, 2023 में 101वें उर्स में मुधोजी राजे भोसले ने परचम लहराया, 2024 में 102वें उर्स में राजे रघुजी भोसले ने यह रस्म अदा की। इस बार, यानी 104वें उर्स में, श्रीमंत पंचम राजे रघुजी भोसले ने परचम कुशाई की। इस मौक़े पर सज्जादानशीन सय्यद यूसुफ़ इक़बाल ताजी और अमीर-ए-शरीयत मुफ़्ती भी मौजूद रहे।

दरगाह का इंतज़ाम देखने वाले ताजुद्दीन बाबा ट्रस्ट में भी यही रंगारंगी नज़र आती है। सदर प्यारे ख़ान और सेक्रेटरी ताज अहमद राजा के साथ-साथ नायब सदर डॉ. सुरेंद्र जिचकार और ट्रस्टी गजेंद्रपाल सिंह होलिया के नाम भी फ़ेहरिस्त में शामिल हैं। यह मुस्लिम बुज़ुर्ग की दरगाह सिर्फ़ ज़ायरीन तक महदूद नहीं, बल्कि इसके इंतज़ाम में भी कई मज़हबों के लोग शरीक हैं।

दरगाह की ख़िदमत आज भी बाबा के दौर से चले आ रहे ख़ुद्दाम ख़ानदानों के हाथों होती है, जो ट्रस्ट के साथ मिलकर काम करते हैं। जिन बरसों में उर्स की तारीख़ें मुनासिब वक़्त पर पड़ीं, उन बरसों में मुल्क और बाहर से तक़रीबन पंद्रह लाख ज़ायरीन ताजबाग पहुँचे थे। सौ बरस से जिस सर्वमज़हबी अंदाज़ में यहाँ ज़ायरीन का इस्तक़बाल होता आया है, वही रिवायत आज भी उतने ही बड़े पैमाने पर क़ायम है।

उर्स की बाक़ी रस्में भी यही पैग़ाम देती हैं। हर साल शहर से निकलने वाले शाही संदल के जुलूस में हिंदू और मुस्लिम दोनों तबक़ों के लोग तक़रीबन बराबर तादाद में शरीक होते हैं। बारह दिन तक चलने वाले लंगर में मज़हब की परवाह किए बग़ैर हर आने वाले को खाना खिलाया जाता है। आज ताजबाग में हिंदू, मुस्लिम, सिख, ईसाई और पारसी, हर मज़हब के ज़ायरीन दुआ माँगने आते हैं।

बाबा की तालीम भी इसी जज़्बे से निकली है। अपनी दुआ हासिल करने के लिए कभी किसी से मज़हब बदलने को नहीं कहा, यह बात ज़ायरीन आज भी बताते हैं। हिंदू ज़ायरीन को उन्होंने अपनी पूजा जारी रखने को कहा और मुस्लिम ज़ायरीन को नमाज़ जारी रखने की हिदायत दी। किस दरवाज़े से दुआ माँगी जा रही है, यह बाबा के नज़दीक अहम नहीं था, अहम था दिल का सच्चा होना।

बाबा के विसाल को सौ बरस गुज़र चुके हैं, मगर यही तालीम आज भी हर जुलाई में ताजबाग में नज़र आती है। एक मुस्लिम बुज़ुर्ग की दरगाह पर हिंदू हाथों से परचम लहराया जाता है, और उसके बाद के बारह दिन सबके हो जाते हैं।