भावना अरोड़ा
छत्तीसगढ़ के दक्षिण बस्तर के घने जंगलों में कभी पापा राव नाम का खौफ चलता था। वह सुरक्षाबलों के लिए एक बड़ी चुनौती बना हुआ था। लेकिन आज समय पूरी तरह बदल चुका है। कल तक जिस पुलिस और अर्धसैनिक बलों से वह जंगलों में लड़ता था, आज वही बल उसकी सुरक्षा में तैनात हैं।
बस्तर के सुदूर गांवों में सालों तक लोग उसका नाम लेने से भी डरते थे। माओवादी संगठन में पापा राव का फैसला ही आखिरी माना जाता था। उसके किसी गांव में आने का मतलब था कि वहां किसी न किसी से पूछताछ होगी या उसे कड़ी सजा दी जाएगी।
सुरक्षा एजेंसियों के मुताबिक, ग्रामीण इस बात से डरे रहते थे कि कब उन पर पुलिस का मुखबिर होने का ठप्पा लगा दिया जाए। उस दौर में डर ही उसका सबसे बड़ा हथियार था। लेकिन आज वह खौफ खत्म हो चुका है और उसकी जगह एक नई हकीकत ने ले ली है।
यह बदलाव इसलिए नहीं आया कि लोग पुराना सब कुछ भूल गए हैं। बल्कि यह उस अतीत का नतीजा है जिससे अब भागना नामुमकिन है। नक्सली प्रभाव से मुक्त हो चुके गांवों के लोग आज भी उसे माफ नहीं कर पाए हैं। स्थानीय पंचायतों और ग्रामीणों के मन में उस हिंसा को लेकर गहरा गुस्सा है जो उसने अपने भूमिगत जीवन के दौरान फैलाई थी।
#WATCH | Narayanpur: Chhattisgarh CM Vishnu Deo Sai says, "Our jawans are continuously fighting naxalism and being successful in their operations. This operation that took place in the Abujmarh area of Narayanpur has been the biggest one so far. Our jawans have been extremely… https://t.co/RhDqy2wGe1 pic.twitter.com/MPf4he8BOk
— ANI (@ANI) May 23, 2025
सुरक्षा अधिकारियों का भी मानना है कि अगर पापा राव को कड़ी सुरक्षा न मिले तो उसकी जान को सबसे बड़ा खतरा पुलिस से नहीं बल्कि उन्हीं ग्रामीणों से होगा जो मानते हैं कि उनके साथ कभी न्याय नहीं हुआ।
मारे गए लोगों में से कई ऐसे साधारण ग्रामीण थे जिन पर माओवादियों ने झूठा आरोप लगाया था। इनमें कुछ कम उम्र के लड़के-लड़कियां भी शामिल थे। दुनिया भर के उग्रवादी आंदोलनों में यह एक काला सच रहा है जहां सिर्फ शक के आधार पर अपनों का ही खून बहाया जाता है।
इस संवेदनशील स्थिति को संभालने के लिए प्रशासन ने एक अलग रास्ता चुना है। अधिकारी लगातार गांव के मुखियाओं और पंचायत प्रतिनिधियों से बात कर रहे हैं। उन्हें समझाया जा रहा है कि वे कानून अपने हाथ में न लें और बदला लेने की भावना से दूर रहें।
प्रशासन का संदेश बिल्कुल साफ है कि जब कोई नक्सली औपचारिक रूप से आत्मसमर्पण कर देता है, तो उसकी सुरक्षा की पूरी जिम्मेदारी सरकार की हो जाती है। इस नीति पर लोगों की राय अलग हो सकती है। लेकिन पुनर्वास का यह नियम बहुत जरूरी है ताकि हथियार छोड़ने वाले दूसरे लोगों का भी व्यवस्था पर भरोसा बना रहे।
पापा राव का नक्सली संगठन में ग्राफ लगातार ऊपर चढ़ता गया। उसने अपने सफर की शुरुआत एक साधारण एरिया कमेटी सदस्य के रूप में की थी। इसके बाद साल 2025 में उसे दक्षिण सब-जोोनल कमांडर की बड़ी जिम्मेदारी सौंपी गई।
Central Government's Initiative For Peace Dealt Hammer Blow on Naxalism
— PIB India (@PIB_India) February 23, 2024
📽️ A short film traces successful initiatives taken by the central government to improve the coordination with state governments of the affected areas#NaxalFreeBharat pic.twitter.com/DTP29FxBLh
सुरक्षा एजेंसियों के रिकॉर्ड के मुताबिक, उसने केंद्रीय रिजर्व पुलिस बल (सीआरपीएफ) और सीमा सुरक्षा बल (बीएसएफ) पर हुए कई बड़े हमलों की योजना बनाई और उन्हें अंजाम दिया। इन नक्सली हमलों में सौ से ज्यादा जवान शहीद हुए और कई अन्य गंभीर रूप से घायल हुए।
साल 2026 की शुरुआत आते-आते माओवादी संगठन के लिए हालात बहुत खराब हो चुके थे। सुरक्षाबलों के लगातार चले बड़े ऑपरेशनों ने जंगलों में नक्सलियों के पैर उखाड़ दिए थे। उनके छिपने और काम करने की जगह लगातार सिकुड़ती जा रही थी।
संगठन के कई बड़े नेता या तो मुठभेड़ में मारे गए, या गिरफ्तार हुए और कई ने हथियार डाल दिए। इसके चलते अलग-अलग टुकड़ियों के बीच आपसी संपर्क टूट गया। कैडरों के भीतर भविष्य को लेकर भारी अनिश्चितता और अविश्वास फैल गया। जिस आंदोलन को वे कभी अजेय समझते थे, उसकी कमजोरी सबके सामने आ चुकी थी।
इसी दबाव के बीच 24 मार्च 2026 को पापा राव ने अपने 18 साथियों के साथ पुलिस के सामने सरेंडर कर दिया। सुरक्षा मामलों के जानकार इसे बस्तर में उग्रवाद के खिलाफ एक बहुत बड़ी कामयाबी मान रहे हैं।
इस घटना ने बाकी बचे नक्सलियों को यह साफ संदेश दे दिया कि अब उनके सबसे अनुभवी कमांडर भी इस लड़ाई को आगे खींचने के पक्ष में नहीं हैं। इसके बाद के महीनों में छत्तीसगढ़ के अलग-अलग जिलों में बड़े पैमाने पर नक्सलियों ने आत्मसमर्पण किया।
पुनर्वास नीति के तहत सरकार फिलहाल पापा राव की हर गतिविधि पर नजर रख रही है। उस पर घोषित 25 लाख रुपये का इनाम और एके-47 राइफल जमा करने के बदले मिलने वाले 3 लाख रुपये तभी दिए जाएंगे जब वह सरकारी नियमों का पूरी तरह पालन करेगा। प्रशासन पूरी तरह संतुष्ट होने के बाद ही उसे समाज की मुख्यधारा में पूरी तरह शामिल करेगा।
#OperationBlackForest: The biggest blow to Naxalism in 3 decades
— PIB India (@PIB_India) June 10, 2025
➡️27 Maoists neutralized, including Basavaraju, their topmost leader
➡️ First time in 30 years a General Secretary-ranked Naxal eliminated
➡️54 Naxalites arrested, 84 surrendered#11YearsOfRakshaShakti pic.twitter.com/FodQkPZJ8m
यहां यह समझना जरूरी है कि आत्मसमर्पण का मतलब यह कतई नहीं है कि उसके पुराने गुनाह माफ हो गए हैं। सरेंडर करने से उन परिवारों का दर्द कम नहीं हो जाता जिन्होंने अपनों को खोया है। अदालतों में उसके खिलाफ चल रहे हिंसक मामलों की कानूनी प्रक्रिया जारी रहेगी। बस्तर के गांवों में उस खूनी संघर्ष की यादें आज भी लोगों के जेहन में ताजा हैं।
इस पूरी घटना का महत्व सिर्फ एक नक्सली कमांडर के हथियार डालने तक सीमित नहीं है। यह बस्तर के एक नए दौर में प्रवेश करने का संकेत है। यह दिखाता है कि बंदूक के दम पर चलाई जाने वाली समानांतर सत्ता अब ढह रही है।
जो कमांडर कभी अपनी शर्तों पर बात करते थे, वे अब बातचीत का रास्ता चुन रहे हैं। सरकार के सामने अब सिर्फ जंगलों में नक्सलियों को हराने की चुनौती नहीं है। सबसे बड़ी चुनौती यह सुनिश्चित करना है कि जो लोग मुख्यधारा में लौट आए हैं, वे दोबारा कभी भटक कर उस रास्ते पर वापस न जाएं।
आज पापा राव एक ऐसी जिंदगी जी रहा है जिसकी उसने कभी कल्पना भी नहीं की होगी। जो शख्स कभी दूसरों के दिलों में दहशत पैदा करता था, आज उसकी खुद की जिंदगी दूसरों के पहरे के भरोसे चल रही है।
(भावना अरोड़ा एक बेस्टसेलिंग लेखिका हैं, जो बरसों की गहन रिसर्च को प्रभावशाली मानवीय कहानियों में बदलने के लिए जानी जाती हैं।)