बदलते मानसून का संकट: क्या आपदाओं से निपटने के लिए तैयार है भारत

Story by  आवाज़ द वॉयस | Published by  [email protected] | Date 11-07-2026
The Crisis of a Changing Monsoon: Is India Prepared to Deal with Disasters?
The Crisis of a Changing Monsoon: Is India Prepared to Deal with Disasters?

 

राजीव नारायण

एक समय था जब भारत में मानसून के आने की खबर मोबाइल अलर्ट या टीवी स्क्रीन पर चलने वाली फ्लैश लाइनों से नहीं मिलती थी। मिट्टी की वह सोंधी खुशबू बारिश के आने का ऐलान करती थी। यह एक ऐसा मौसम था जो भारत की सामूहिक यादों में रचा-बसा था। बच्चे सड़कों के किनारे बहते पानी में कागज की नावें तैराते थे। परिवार के लोग गरमा-गरम चाय की चुस्कियों के साथ पकौड़ों का लुत्फ उठाते थे। किसान आसमान की तरफ हाथ जोड़कर आभार जताते थे। नदियां पानी से लबालब भर जाती थीं। जलाशय भरते ही जलविद्युत केंद्र फिर से चालू हो जाते थे और पहाड़ हरी चादर ओढ़ लेते थे।

मानसून हमेशा से भारत के लिए नए जीवन का उत्सव रहा है। आज भी स्थिति बहुत अलग नहीं है। देश की सालाना बारिश का लगभग 75 प्रतिशत हिस्सा महज चार महीनों में बरस जाता है। यही पानी हमारी नदियों को जीवन देता है। जलाशयों को भरता है। खेतों की सिंचाई करता है और खेती पर निर्भर पचास करोड़ से ज्यादा भारतीयों की आजीविका चलाता है। यह बारिश सिर्फ एक मौसम नहीं है। यह भारत की अर्थव्यवस्था की जीवनरेखा है जो हर साल देश को 4,000 अरब घन मीटर पानी देती है। इसके बावजूद समय के साथ इस उत्सव की जगह अब एक अजीब से डर ने ले ली है। अब आसमान में घिरने वाला हर काला बादल राहत से ज्यादा चिंता लेकर आता है।

आज का मानसून कहीं ज्यादा आक्रामक और अनपेक्षित हो गया है। यह देश की सहनशक्ति की परीक्षा ले रहा है। इस साल भी बारिश ने अभी अपनी पूरी रफ्तार नहीं पकड़ी है लेकिन भूस्खलन, अचानक आने वाली बाढ़, उफनती नदियों और थमे हुए यातायात की खबरें देश के कोने-कोने से आने लगी हैं।

मुंबई में जुलाई के औसत को पार करते हुए महज चार दिनों में 80 प्रतिशत बारिश हो गई। इस भारी बारिश ने सड़कों और रेलवे नेटवर्क को पूरी तरह ठप कर दिया। हिमालयी क्षेत्र में रेड और ऑरेंज अलर्ट ने हिमाचल प्रदेश और शिमला के लोगों को सहमा कर रख दिया है। लगातार होते लैंडस्लाइड और बाढ़ के कारण संपर्क मार्ग टूट रहे हैं।

उत्तराखंड के सभी जिलों में भारी बारिश के कारण नदियां खतरे के निशान से ऊपर बह रही हैं। केरल के वायनाड में हुए भीषण भूस्खलन ने पूरे देश को झकझोर दिया है। पश्चिमी और उत्तरी भारत के राज्यों में मौसम की ऐसी चेतावनियां अब एक आम बात बन चुकी हैं। यह हालात हमें एक कड़वी सच्चाई का अहसास कराते हैं। हमारा आज का बुनियादी ढांचा कल के पुराने पड़ चुके मौसम के हिसाब से बना है। यही वजह है कि यह आज के बदलते और उग्र मौसम का सामना करने में नाकाम साबित हो रहा है।

प्रकृति की स्पष्ट चेतावनी

पर्यावरण वैज्ञानिकों ने बहुत पहले ही यह चेतावनी दे दी थी कि ग्लोबल वार्मिंग का मतलब यह बिल्कुल नहीं है कि हर जगह ज्यादा बारिश होगी। इसका सीधा मतलब यह है कि मौसम का चक्र पूरी तरह अनिश्चित हो जाएगा। कहीं अचानक बादल फटेंगे तो कहीं लंबे समय तक सूखा रहेगा। फिर अचानक इतनी तेज बारिश होगी कि सब कुछ बह जाएगा। भारत इस समय ठीक इसी डरावने बदलाव का गवाह बन रहा है। लेकिन इस तबाही के लिए सिर्फ मानसून को जिम्मेदार ठहराना ठीक नहीं है।

भारत के लिए भारी बारिश कोई नई बात नहीं है। जो चीज बदली है वह हमारा भूगोल है। हमने अपनी बस्तियां बसाने के लिए पहाड़ों को बेतरतीब तरीके से काट दिया है। नदियों के प्राकृतिक रास्तों को छोटा करके उन पर अवैध कब्जे कर लिए हैं। जो तालाब और आर्द्रभूमि यानी वेटलैंड्स अतिरिक्त पानी को सोखने का काम करते थे वे अब कंक्रीट की इमारतों के नीचे दफन हो चुके हैं। दशकों पुराने हमारे ड्रेनेज सिस्टम आज की भारी बारिश का बोझ उठाने के लायक नहीं बचे हैं। सड़कों, होटलों और दूसरे निर्माण कार्यों का दायरा इतनी तेजी से बढ़ा है कि अब वैज्ञानिक योजना और पर्यावरण सुरक्षा के उपाय पहले से कहीं ज्यादा जरूरी हो गए हैं।

नतीजा हमारे सामने है। प्रकृति की एक सामान्य मौसमी घटना इंसानी लापरवाही के कारण एक बहुत बड़े मानवीय संकट में बदल जाती है। भारत को अपनी पुरानी गलतियों और आपदाओं से सबक सीखने की सख्त जरूरत है। हालांकि पिछले एक दशक में मौसम का पूर्वानुमान लगाने की हमारी तकनीक में काफी सुधार हुआ है।

भारतीय मौसम विज्ञान विभाग को पहले से ज्यादा सटीक और आधुनिक बनाया गया है। आपदा प्रबंधन की हमारी टीमें अब शुरुआती चेतावनी जारी करने और राहत कार्यों को अंजाम देने में काफी बेहतर काम कर रही हैं। नए तकनीकी प्रयास हमारी तैयारियों को और मजबूत करने का भरोसा देते हैं।

इसके बावजूद सिर्फ सटीक अनुमानों के भरोसे आपदाओं को नहीं रोका जा सकता। अगर हम तब जागेंगे जब आसमान में काले बादल घिर चुके होंगे तो नुकसान को टालना नामुमकिन होगा।

बेहतर तैयारी की रणनीति

हर साल मानसून की यह तबाही हमारे सामने एक ही चुभता हुआ सवाल खड़ा करती है। आखिर क्यों भारत हर साल आने वाली एक तय मौसमी घटना को अचानक आई किसी आपातकालीन आपदा की तरह देखता है? इसका समाधान दूसरों पर दोष मढ़ने में नहीं है। हमें यह स्वीकार करना होगा कि आपदा से लड़ने की ताकत पूरे साल की मेहनत से बनती है न कि संकट के समय दिखाई जाने वाली जल्दबाजी से।

बेहतरीन तैयारी का मतलब यह है कि नालों की सफाई बारिश आने से पहले हो जानी चाहिए न कि तब जब पूरा इलाका पानी में डूब जाए। इसका मतलब यह है कि हमें कमजोर पड़ चुके पहाड़ी ढलानों की पहचान समय रहते करनी होगी। नदियों के बांधों को मजबूत करना होगा। संवेदनशील इलाकों में निर्माण कार्यों पर कड़ा नियंत्रण रखना होगा। लोगों को सुरक्षित बाहर निकालने का प्लान आपदा आने से बहुत पहले ही तैयार रखना होगा। हमें अपने विकास के हर प्रोजेक्ट में पर्यावरण के जोखिमों का आकलन करना होगा। इसे सिर्फ कागजी औपचारिकता मानकर नहीं छोड़ा जा सकता।

राज्य की पहल

तात्कालिक उपाय

दीर्घकालिक समाधान

राहत कार्य

मशीनों और आपातकालीन कर्मियों की तैनाती

जोखिम वाले क्षेत्रों का नए सिरे से वैज्ञानिक नक्शा बनाना

सुरक्षा

संवेदनशील इलाकों से लोगों को तुरंत हटाना

मजबूत नदी तटबंध और प्राकृतिक जल स्रोतों का जीर्णोद्धार

प्रबंधन

तत्काल जल निकासी और कंट्रोल रूम की स्थापना

शहरी ड्रेनेज सिस्टम का पूरी तरह आधुनिकीकरण

कुछ राज्यों ने भारी बारिश से निपटने के लिए मशीनों और रैपिड रिस्पांस टीमों को तैनात करके अपनी तैयारियों को तेज किया है। ऐसे कदमों की सराहना होनी चाहिए क्योंकि ये इंसानी जान बचाते हैं। लेकिन हमारी इस तैयारी को केवल प्रतिक्रिया देने तक सीमित रहने के बजाय एक स्थाई व्यवस्था का रूप लेना होगा। बुनियादी ढांचे के निर्माण की हमारी रफ्तार के साथ पर्यावरण के प्रति संवेदनशीलता भी जुड़ी होनी चाहिए। विकास और पर्यावरण संरक्षण को एक दूसरे का विरोधी नहीं माना जा सकता। अगर सही ढंग से योजना बनाई जाए तो ये दोनों एक दूसरे को मजबूत कर सकते हैं।

इसलिए अब यह सवाल ही गलत है कि क्या भारत को विकास करना चाहिए। असली सवाल यह है कि भारत को अपना विकास किस तरह करना चाहिए।

 

अफवाहों का नया बाजार

मानसून के साथ एक और बड़ा खतरा आता है जिसका बारिश की बूंदों से कोई लेना-देना नहीं होता। यह खतरा हमारे स्मार्टफोन के जरिए सीधे हमारे घरों में प्रवेश करता है। जैसे ही कहीं तेज बारिश शुरू होती है सोशल मीडिया पर नाटकीय वीडियो की बाढ़ आ जाती है।

दावों के साथ दिखाया जाता है कि पहाड़ ढह रहे हैं, पुल गायब हो गए हैं या पूरे के पूरे शहर बह गए हैं। इनमें से कुछ वीडियो सच होते हैं लेकिन ज्यादातर पूरी तरह फर्जी होते हैं। पुराने वीडियो को नए कैप्शन के साथ दोबारा वायरल कर दिया जाता है। पिछले सालों के वीडियो या दूसरे देशों की घटनाओं को ब्रेकिंग न्यूज बनाकर परोस दिया जाता है।

जब अफवाहें राहत टीमों से ज्यादा तेजी से सफर करने लगें तो स्थिति बेहद खतरनाक हो जाती है। घर बैठे लोग घबरा जाते हैं। सैलानी उन जगहों की अपनी यात्राएं रद्द कर देते हैं जो पूरी तरह सुरक्षित हैं। इसके कारण उन होटलों, रेस्तरां, टैक्सी चालकों और छोटे दुकानदारों को भारी आर्थिक नुकसान उठाना पड़ता है जो पूरी तरह इस मौसमी पर्यटन पर निर्भर हैं। इससे भी ज्यादा चिंता की बात यह है कि सोशल मीडिया के इस शोर में सरकारी एजेंसियों की असली और जरूरी चेतावनियां कहीं दबकर रह जाती हैं।

अभिव्यक्ति की आजादी का मतलब समाज में डर पैदा करने का लाइसेंस कतई नहीं हो सकता। इसका समाधान सेंसरशिप नहीं है बल्कि सूचनाओं की गति, विश्वसनीयता और जवाबदेही है। प्रशासन को तुरंत फैक्ट चेक करके सही जानकारी लोगों तक पहुंचानी होगी।

सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स को भी आपदा से जुड़ी ऐसी झूठी या भ्रामक खबरों पर तुरंत रोक लगानी होगी। हम नागरिकों की भी एक बड़ी जिम्मेदारी बनती है। किसी भी डरावने वीडियो को आगे भेजने से पहले एक पल के लिए रुकें। उसकी सत्यता की जांच करें और देखें कि क्या वह किसी प्रामाणिक स्रोत से आया है या नहीं। घबराहट कभी भी तैयारी का विकल्प नहीं हो सकती।

प्रकृति के साथ जीने की कला

भारत मानसून को नहीं रोक सकता और हमें ऐसा सोचना भी नहीं चाहिए। यह बारिश हमारे खेतों, हमारी नदियों, जंगलों और जलाशयों के लिए अमृत के समान है। यह देश की आजीविका को चलाती है। भूजल को रिचार्ज करती है और उस अर्थव्यवस्था को सहारा देती है जो आज भी काफी हद तक प्रकृति की रफ्तार पर टिकी है। हम जो बदल सकते हैं वह है हमारी अपनी तैयारी।

हमारा भविष्य हर बादल को देखकर डरने में नहीं है। इसका समाधान बादलों से मिलने वाले सबक का सम्मान करने में छिपा है। वैज्ञानिक नजरिए से बनाई गई योजनाएं, मजबूत बुनियादी ढांचा, पर्यावरण के अनुकूल विकास, बेहतर जन जागरूकता और भरोसेमंद संचार व्यवस्था ही हमारा सबसे बड़ा सुरक्षा कवच हैं।

आधुनिक मानसून का सबसे बड़ा सबक यही है कि कोई भी आपदा बारिश की तीव्रता से तय नहीं होती बल्कि इस बात से तय होती है कि उसके नीचे रहने वाला समाज उससे निपटने के लिए कितना तैयार है।

जब यह मानसून आगे बढ़ेगा और इसकी रफ्तार तेज होगी तो भारत को इसका स्वागत उसी पुराने उत्साह और खुशी के साथ करना चाहिए। हमारा यह भरोसा इसलिए नहीं होना चाहिए कि आसमान से बरसने वाला पानी अब शांत हो गया है बल्कि इसलिए होना चाहिए क्योंकि एक देश के रूप में हम पहले से ज्यादा समझदार और तैयार हो चुके हैं।

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