शाइस्ता अंबर बनीं मुस्लिम महिलाओं की बुलंद आवाज

Story by  अर्सला खान | Published by  onikamaheshwari | Date 18-07-2026
From Convention to Rebellion: Shaista Amber’s Story of Change
From Convention to Rebellion: Shaista Amber’s Story of Change

 

अर्सला खान

भारत में जब भी महिलाओं के अधिकारों, सामाजिक न्याय और मुस्लिम महिलाओं के सशक्तिकरण का जिक्र होता है, तो शाइस्ता अंबर का नाम सबसे पहले जेहन में आता है। उन्होंने एक ऐसे दौर में समाज की दकियानूसी कड़ियों को तोड़ने का साहस दिखाया जब महिलाओं के लिए घर से बाहर निकलना भी एक बड़ी चुनौती थी। शाइस्ता अंबर ने न केवल रूढ़िवादी परंपराओं का विरोध किया बल्कि मुस्लिम महिलाओं को उनके असली धार्मिक और संवैधानिक अधिकारों से रूबरू भी कराया। ऑल इंडिया मुस्लिम महिला पर्सनल लॉ बोर्ड की संस्थापक अध्यक्ष और प्रख्यात सामाजिक कार्यकर्ता शाइस्ता अंबर आज देश के करोड़ों लोगों के लिए प्रेरणा का स्रोत बन चुकी हैं।

इलाहाबाद की गलियों से शुरू हुआ संघर्ष का सफर

शाइस्ता अंबर का जन्म साल 1962में इलाहाबाद (अब प्रयागराज) के एक पढ़े-लिखे और संभ्रांत परिवार में हुआ था। उनके पिता रेलवे में गार्ड थे और उनकी मां उर्दू की एक जानी-मानी कवयित्री थीं। बचपन से ही शाइस्ता को घर में अदब और किताबों का माहौल मिला। परिवार के लोग उन्हें बेहद भाग्यशाली मानते थे। शाइस्ता बचपन से ही पढ़ाई में बहुत तेज थीं और छोटी सी उम्र से ही उन्होंने देश-विदेश की प्रतिष्ठित पत्रिकाओं के लिए कहानियां और लेख लिखना शुरू कर दिया था।

शाइस्ता अंबर का निकाह मोहम्मद इदरीस अंबर से हुआ जो एक होनहार सिविल सेवक और मशहूर उर्दू शायर थे। इस तरह शाइस्ता एक साहित्यिक माहौल से निकलकर दूसरे साहित्यिक परिवार का हिस्सा बन गईं। शादी के बाद भी उनका पढ़ने-लिखने और समाज को करीब से देखने का सिलसिला थमा नहीं। उन्होंने समाज में महिलाओं के साथ होने वाले भेदभाव को बहुत करीब से महसूस किया और यहीं से उनके भीतर एक सामाजिक सुधारक ने जन्म लिया।

Aiding a Wildfire of Women's Rights | Shaista Amber | TEDxYouth@JPIS

जब तीन तलाक के दर्द ने बदली जिंदगी की राह

साल 1997के आसपास शाइस्ता अंबर ने लखनऊ में रहते हुए सामाजिक कार्यों में सक्रिय रूप से भाग लेना शुरू किया। उनके पास रोज ऐसी कई मुस्लिम महिलाएं अपनी फरियाद लेकर आती थीं जो घरेलू हिंसा या अचानक दिए गए तलाक का शिकार हुई थीं। गुस्से में, नशे की हालत में या फोन पर एक बार में बोल दिए गए तीन तलाक (ट्रिपल तलाक) ने कई हंसते-खेलते परिवारों को उजाड़ दिया था। महिलाओं की इस बेबसी ने शाइस्ता को झकझोर कर रख दिया।

शाइस्ता अंबर ने कुरान और इस्लामिक शरीयत का गहराई से अध्ययन किया। उन्होंने पाया कि तीन तलाक, हलाला, बहुविवाह और मेहर की रकम न देने जैसी कुप्रथाएं असल में इस्लाम का हिस्सा ही नहीं हैं। ये सब बाद में जोड़ी गई सामाजिक बुराइयां हैं जो महिलाओं का शोषण करती हैं। उन्होंने इसके खिलाफ एक लंबी कानूनी और सामाजिक जंग छेड़ी। बरसों की रिसर्च के बाद उन्होंने एक 'मॉडल निकाहनामा' का ड्राफ्ट तैयार किया जिसकी देश-विदेश में जमकर तारीफ हुई। इस निकाहनामे में निकाह के समय ही महिलाओं को कई जरूरी कानूनी अधिकार दिए गए थे।

ऑल इंडिया मुस्लिम महिला पर्सनल लॉ बोर्ड की स्थापना

मुस्लिम समाज में महिलाओं के मुद्दों को उठाने वाले जितने भी बड़े मंच थे, वहां पुरुषों का दबदबा था। महिलाओं को अपनी बात रखने का मौका नहीं मिलता था। इस कमी को दूर करने के लिए शाइस्ता अंबर ने साल 2005में 'अखिल भारतीय मुस्लिम महिला पर्सनल लॉ बोर्ड' (AIMWPLB) की स्थापना की। यह भारतीय इतिहास में एक क्रांतिकारी कदम था।

इस बोर्ड के जरिए शाइस्ता ने मुस्लिम महिलाओं को एक ऐसा मजबूत मंच दिया जहां वे बिना किसी डर के विवाह, तलाक, गुजारा भत्ता, शिक्षा और संपत्ति के अधिकारों पर खुलकर बात कर सकती थीं। उन्होंने देशव्यापी जागरूकता अभियान चलाए। उनका हमेशा से मानना रहा है कि महिलाओं को न केवल देश के संविधान की जानकारी होनी चाहिए बल्कि उन्हें अपने मजहब द्वारा दिए गए अधिकारों का भी ज्ञान होना चाहिए। जब सुप्रीम कोर्ट ने तत्काल तीन तलाक को असंवैधानिक घोषित किया तो शाइस्ता अंबर ने इस फैसले का खुलकर स्वागत किया और इसे देश की आधी आबादी की जीत बताया।

अंबर मस्जिद: लैंगिक समानता और समावेशी सोच की मिसाल

मस्जिदों में महिलाओं के प्रवेश और नमाज पढ़ने को लेकर हमेशा से अलग-अलग विवाद रहे हैं। विशेषकर उत्तर भारत में महिलाओं के लिए मस्जिदों में सामूहिक नमाज की कोई खास व्यवस्था नहीं होती थी। इस रूढ़िवादी परंपरा को तोड़ने के लिए शाइस्ता अंबर ने लखनऊ में 'अंबर मस्जिद' का निर्माण कराया। यह भारत की पहली ऐसी मस्जिद है जिसे विशेष रूप से महिलाओं की सहूलियत को ध्यान में रखकर बनाया गया है।

अंबर मस्जिद में महिलाएं और पुरुष दोनों पूरी गरिमा और समानता के साथ अलग-अलग कतारों में सामूहिक नमाज अदा कर सकते हैं। शाइस्ता अंबर का स्पष्ट तर्क है कि इस्लाम में कहीं भी महिलाओं को मस्जिद जाने से नहीं रोका गया है। यह अनोखी मस्जिद आज सिर्फ एक इबादतगाह नहीं है, बल्कि यह लैंगिक समानता और समाज की प्रगतिशील सोच का एक बड़ा प्रतीक बन चुकी है।

We welcome this, it was much needed.Unlike previous Govts, this Govt cares  for rights of Muslim women.Appeal to all parties to ensure passage of this  bill in Parliament: Shaista Ambar,All India Muslim

एक हाथ में कुरान और दूसरे हाथ में संविधान

शाइस्ता अंबर की लोकप्रियता सिर्फ भारत तक सीमित नहीं रही। साल 2019में भारत स्थित अमेरिकी दूतावास और अमेरिकी विदेश विभाग ने उन्हें अंतरराष्ट्रीय धार्मिक स्वतंत्रता पुरस्कार और 'इंटरनेशनल वुमेन ऑफ करेज' पुरस्कार के लिए नामांकित किया था। वे भारत की 44वीं सबसे प्रभावशाली महिला के रूप में भी चुनी जा चुकी हैं।

मशहूर वैश्विक मंच TEDx पर दिया गया उनका एक भाषण आज भी सोशल मीडिया पर खूब सुना जाता है। उस मंच से उन्होंने देश की मुस्लिम महिलाओं को एक बेहद खूबसूरत और शक्तिशाली संदेश दिया था। उन्होंने कहा था, "भारतीय मुस्लिम महिलाएं एक हाथ में पवित्र कुरान और दूसरे हाथ में भारत का संविधान लेकर चलेंगी।" यह एक लाइन उनकी पूरी विचारधारा को बयां करती है। वे मानती हैं कि धार्मिक आस्था और देश के कानून में कोई टकराव नहीं है, बल्कि दोनों मिलकर एक महिला को मुकम्मल ताकत देते हैं।

शिक्षा और राजनीतिक सशक्तिकरण ही असली हथियार है

शाइस्ता अंबर का मानना है कि किसी भी समाज को तब तक नहीं सुधारा जा सकता जब तक उसकी बेटियां शिक्षित न हों। उन्होंने हमेशा मुस्लिम लड़कियों की आधुनिक शिक्षा, तकनीकी ज्ञान और व्यावसायिक प्रशिक्षण पर जोर दिया है। उनका कहना है कि एक शिक्षित लड़की न केवल अपने पैरों पर खड़ी होती है बल्कि वह पूरे परिवार की सोच को बदल देती है।

इसके साथ ही वे संसद और विधानसभाओं में महिलाओं को आरक्षण देने की बड़ी पैरोकार रही हैं। उनका मानना है कि जब तक नीति निर्धारण और देश चलाने वाली संस्थाओं में महिलाओं की संख्या नहीं बढ़ेगी, तब तक जमीनी स्तर पर महिलाओं की सुरक्षा और उनके विकास के फैसले संवेदनशीलता से नहीं लिए जा सकेंगे।

 
 

 

 
 
 
 
 

 

 
 
 
 
 
 
 
 
 

 

 
 
 

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शाइस्ता अंबर आज अपने बेटे और दो बेटियों के साथ लखनऊ में रहती हैं। उनका पूरा परिवार अपनी मां के इस क्रांतिकारी और निडर व्यक्तित्व पर गर्व करता है। शाइस्ता अंबर की कहानी हमें सिखाती है कि अगर इरादे मजबूत हों और मकसद नेक हो, तो समाज की सदियों पुरानी दीवारों को भी गिराया जा सकता है। वह आज की तारीख में भारत की हर उस महिला का चेहरा बन चुकी हैं जो अपने हक और सम्मान के लिए लड़ रही हैं।