प्रमोद जोशी
अमेरिका ने 2 अप्रैल को चंद्रमा की परिक्रमा करने के लिए आर्टेमिस 2 यान भेजा है, जिसमें चार यात्री सवार है. 54 वर्षों में यह पहली मानवयुक्त चंद्र उड़ान है, जो चंद्रमा के चक्कर लगाकर 10 अप्रैल को पृथ्वी पर लौटेगी. यह यान एक बार फिर से मनुष्य को चंद्रमा पर उतारने की तैयारी में गया है. उधर चीनी अंतरिक्ष एजेंसी (सीएनएसए) को उम्मीद है कि वह 2030 तक अंतरिक्ष यात्रियों को चंद्रमा पर उतार देगी. चीन पहले ही कई रोबोट चंद्रमा पर भेज चुका है और चंद्र नमूने वापस ला चुका है.
ये दो समांतर यात्राएँ केवल चंद्रमा तक पहुँचने के लिहाज से महत्त्वपूर्ण नहीं हैं, बल्कि भविष्य के अंतरिक्ष-अनुसंधान में वर्चस्व की कहानी लिखने वाली हैं. पाँच दशक पहले के चंद्र मिशन अमेरिका और सोवियत संघ के बीच श्रेष्ठता की होड़ का हिस्सा थे. यह स्पर्धा अब चीन और अमेरिका के बीच है.

आर्टेमिस 2 का लॉन्च ऐसे वक्त में हुआ है, जब ईरान की लड़ाई चल रही है. पर्यवेक्षक मानते हैं कि इस रेस का आग़ाज़ करके अमेरिका अपने वर्चस्व की याद दिलाना चाहता है. वहीं कुछ मानते हैं कि चीन साबित करना चाहता है कि यह अमेरिकी पराभव का प्रारंभ है.
चंद्रमा का महत्त्व
आर्टेमिस मिशन में भारत सहित 50 से अधिक देश शामिल हैं. इसकी टीम अगले दो वर्षों में चंद्रमा के दक्षिणी ध्रुव की खोज करने के लिए प्रारंभिक कार्य करने का इरादा रखती है. इस इलाके में पानी है और बर्फ के भंडार भी. इससे ऑक्सीजन और हाइड्रोजन का उत्पादन करके रॉकेटों के लिए ईंधन तैयार किया जा सकता है.
आर्टेमिस मिशन के यात्री 2028 में चंद्रमा पर उतरने से पहले जीवन-सहायता प्रणालियों और नेविगेशन क्षमताओं का परीक्षण करेंगे. इस काम में वे चीन के लक्ष्य से दो साल आगे हैं. चीन का लक्ष्य 2030 में चंद्रमा पर अपने यात्रियों को उतारने का है.
चंद्रमा में, सौरमंडल के जन्म की जानकारी से जुड़े तमाम तथ्य उपलब्ध है. चंद्रमा में ब्रह्मांड का अरबों वर्षों का इतिहास छिपा है. इसका अध्ययन वैज्ञानिकों को सौर मंडल के विकास की परिस्थितियों का अंदाजा लगाने में मदद करेगा. आर्टेमिस मिशन, प्रयोगशाला और अन्य अभियानों के लिए प्रक्षेपण-पैड के रूप में भी चंद्रमा का इस्तेमाल करेगा.

स्पेस रेस
बीसवीं सदी में शीतयुद्ध के दौरान अमेरिका और रूस के बीच राष्ट्रीय-प्रतिष्ठा की प्रतिस्पर्धा की देन थी स्पेस-रेस. नाभिकीय-अस्त्रों और मिसाइलों के विकास के साथ दोनों देशों ने अंतरिक्ष-अभियानों के माध्यम से एक-दूसरे को परास्त करने का बीड़ा उठाया था.
29 जुलाई,1955 को अमेरिका ने अंतरराष्ट्रीय भू-भौतिकी वर्ष मनाने के लिए 1957-58 में एक उपग्रह पृथ्वी की कक्षा में भेजने की घोषणा की थी. इस घोषणा के चार दिन बाद ही रूस ने कहा कि हम भी जल्द ही भेजेंगे.
4 अक्तूबर,1957 को रूस ने स्पूतनिक-1 को पृथ्वी की कक्षा में स्थापित करके बाजी मार ली. इतना ही नहीं, 12 अप्रेल, 1961 को वोस्तोक-1 पर सवार होकर यूरी गागारिन पृथ्वी की परिक्रमा करने वाले पहले इंसान बने.
इन दो रूसी सफलताओं ने अमेरिका को स्तब्ध कर दिया, तब 25 मई, 1961 को राष्ट्रपति जॉन एफ कैनेडी ने संसद में घोषणा की कि हम इस दशक के खत्म होने के पहले चंद्रमा पर अपना अंतरिक्ष-यात्री भेजेंगे.कैनेडी के स्वप्न का पहला चरण जुलाई, 1969 में पूरा हो गया, जब अपोलो-11 पर सवार नील आर्मस्ट्रांग चंद्रमा की सतह पर पैर रखने वाले पहले इंसान बने. यह प्रतियोगिता चलती रही, पर 1991 में सोवियत संघ के विघटन के बाद यह खत्म हो गई.
'In Your Interest' with @kabir_naqvi
— News9 (@News9Tweets) April 2, 2026
Moon mission or space war? #NASA's Artermis mission heads to the moon but stakes are bigger than creating new records.
As humans return beyond Earth after 50 years, a bigger battle is unfolding. U.S vs China in a high-stakes race for… pic.twitter.com/t6MnvgZd1v
बुश की घोषणा
अपोलो-11 के यात्रियों नील आर्मस्ट्रांग और बज़ एल्ड्रिन के अभियान के बाद से 10 और यात्री चंद्रमा पर विचरण कर चुके हैं. कैनेडी के सपने के 43 साल बाद 2004 में तत्कालीन राष्ट्रपति जॉर्ज बुश ने घोषणा की कि 2020 तक अमेरिका फिर से चाँद पर जाएगा. उन्होंने यह भी कहा कि इस बार हमारा इरादा वहाँ जाकर वापस लौटने का नहीं है, बल्कि सौर मंडल में और आगे जाने का है, जिसके लिए चाँद पर बेस बनाएँगे.
अब चीन ने इसे राष्ट्रीय प्रतिष्ठा का प्रश्न बनाया है. अमेरिकी संसद से जुड़े अमेरिका-चीन आर्थिक एवं सुरक्षा समीक्षा आयोग के अनुसार ‘अंतरिक्ष को चीन भू-राजनीतिक और राजनयिक प्रतिस्पर्धा का औजार मानता है.’ साइबरस्पेस और स्पेस का सामरिक इस्तेमाल तो हो ही रहा है.

चीनी हौसले
चीन को उम्मीद है कि 2035 तक चंद्रमा पर समानव वैज्ञानिक बेस का उसका बेसिक संस्करण तैयार हो जाएगा, जिसका नाम होगा इंटरनेशनल ल्यूनर रिसर्च स्टेशन (आईएलआरएस). यह बेस चंद्रमा के दक्षिणी ध्रुव के पास बनाया जाएगा, जहाँ बर्फ और पानी होने की संभावना है. इस परियोजना में रूस भी चीन के साथ है. इस स्पर्धा में चीन के अलावा कुछ दूसरे ग्रुप भी सामने आ रहे हैं, खासतौर से प्राइवेट कम्पनियाँ.
2023 में भारत ने चंद्रमा की सतह पर चंद्रयान-3 को उतारा. जनवरी 2024 में जापान ने भी अपना एक यान चंद्रमा की सतह पर उतारा. अमेरिका को जहाँ चीन, चुनौती दे रहा है, वहीं चीन को भारत की चुनौती मिल रही है.2010 के बाद से ऑस्ट्रेलिया, मैक्सिको, न्यूजीलैंड, पोलैंड, पुर्तगाल, दक्षिण अफ्रीका और तुर्की की स्पेस एजेंसियाँ बनी है. अमेरिका की प्राइवेट एजेंसी स्पेसएक्स ने भी 2026 में मंगल ग्रह पर अपना यान भेजने की घोषणा की है.
अमेरिकी इरादे
इस दौड़ में ‘नासा’ का आर्टेमिस कार्यक्रम पिछड़ने लगा था. कई बार स्थगित होने के बाद 2 अप्रैल को इसका प्रक्षेपण हो पाया. पहली अमेरिकी मानवयुक्त चंद्र लैंडिंग को आर्टेमिस 4 तक टाल दिया गया है, जो अब 2028 से पहले संभव नहीं.
शायद इन्हीं बातों को देखते हुए आर्टेमिस 2 के प्रक्षेपण से महज़ एक सप्ताह पहले, ‘नासा’ ने पूरे आर्टेमिस चंद्र कार्यक्रम में एक बड़ा बदलाव किया है. आने वाले वर्षों में इस कार्यक्रम के साथ नाभिकीय ऊर्जा को भी जोड़ दिया गया है. पिछली 24 मार्च को अपने ‘इग्नीशन’ कार्यक्रम के अंतर्गत, ‘नासा’ ने राष्ट्रपति डॉनल्ड ट्रंप की राष्ट्रीय अंतरिक्ष नीति के तहत कई परिवर्तनकारी पहलों की घोषणा की है. लक्ष्य है, ट्रंप का कार्यकाल पूरा होने के पहला ही चंद्रमा पर कदम रखना.

नाभिकीय ऊर्जा
इस मौके पर ‘नासा’ के प्रशासक जैरेड आइज़ैकमैन ने कहा, अब सफलता या विफलता का फैसला महीनों में होगा, वर्षों में नहीं. ‘नासा’ के एसोसिएट एडमिनिस्ट्रेटर अमित क्षत्रिय ने कहा, चंद्रमा पर, हम एक केंद्रित, चरणबद्ध संरचना की ओर बढ़ रहे हैं.
उन्होंने यह भी कहा कि हम इंटरनेशनल स्पेस स्टेशन के अविश्वसनीय महत्त्व को पहचान रहे हैं. देश भर के शोधकर्ताओं और छात्रों के लिए चंद्रमा की सतह खुलने जा रही है. स्पेस रिएक्टर-1 फ्रीडम के साथ, हम अंततः नाभिकीय-प्रणोदन को सुदूर अंतरिक्ष में ले जाने वाले हैं.
चीन से स्पर्धा ही वह वजह है, जिसने पहली बार ‘नासा’ के बजट में चंद्रमा की सतह के लिए परमाणु ऊर्जा का प्रावधान शामिल किया गया. संभवतः इसी वजह से आर्टेमिस परियोजना में बदलाव करने पड़े. संसद का ध्यान इधर गया और बजट में ढील दी गई और ‘नासा’ को अपोलो परियोजना के बाद से अभूतपूर्व शक्ति प्राप्त हुई.
स्पर्धा या नवाचार?
कुछ पर्यवेक्षक मानते हैं कि सोवियत संघ के साथ स्पर्धा करीब चार दशक तक चली थी, पर चीन के लंबी चलेगी. पर वे यह भी मानते हैं कि स्पर्धा के पीछे वैज्ञानिक कारण होने चाहिए, जो उतने नहीं हैं, जितने हो सकते थे.
तकनीकी विकास का एक और द्वंद्व है. आविष्कार होते किसी इरादे से हैं, पर उनकी परिणति कुछ और होती है. जीपीएस इसका बेहतर उदाहरण है. इसकी शुरुआत फौजी संचार-प्रणाली के रूप में हुई थी. आज यह वैश्विक वाणिज्य का एक अभिन्न अंग है. इंटरनेट भी ऐसा ही आविष्कार है.
प्रतिस्पर्धाओं के पीछे कल्याणकारी वैश्विक सहयोग की भावना हो, तो परिणाम बेहतर हो सकते हैं. चीन का चंद्र-कार्यक्रम एक बंद प्रणाली की देन है. इसमें शामिल देश, चीनी संचार प्रोटोकॉल का उपयोग करेंगे, चीन-नियंत्रित शक्ति पर निर्भर रहेंगे और अपने वैज्ञानिक डेटा को चीनी स्टेशनों के माध्यम से भेजेंगे.

नया चीनी यान
चीन इस साल अपने नए मेंगझोऊ (ड्रीम शिप) अंतरिक्ष यान की परीक्षण उड़ान आयोजित करने जा रहा है. पुराने शेनझोउ की जगह यह नया यान अंतरिक्ष यात्रियों को चंद्र कक्षा में ले जाएगा. चंद्रमा पर अमेरिकी यात्री पहले उतर भी जाए, पर इस बात के आसार हैं कि स्पेस साइंस में चीन अब अमेरिका की बराबरी के स्तर पर आ रहा है.
आप अभी इसे बराबरी न भी मानें, पर स्पेस नेवीगेशन में वह अमेरिका से कुछ आगे निकलता नज़र आ रहा है. चीन के ‘बेइदू’ ने अमेरिकी ‘जीपीएस’ को पीछे कर दिया है. इस बात को अमेरिकी विशेषज्ञ भी मानने लगे हैं.
चीन ‘ग्लोबल साउथ’ के देशों में बेल्ट एंड रोड परियोजनाओं में निवेश के साथ-साथ ‘बेइदू’ प्रणाली को अपनाने पर जोर दे रहा है, ताकि इसे वैश्विक-व्यवस्था में डिफॉल्ट नेविगेशन सुविधा के रूप में स्थापित किया जा सके.
चीनी योजना
चीन का समानव प्रोजेक्ट 921, सितंबर, 1992 में शुरू किया गया था, जिसका उद्देश्य अंतरिक्ष स्टेशन विकसित करना है. इस कार्यक्रम के तहत 2003 में चीनी अंतरिक्ष यात्री यांग लीवेई की पहली उड़ान के बाद से लगभग 15 मानवयुक्त मिशन संचालित किए जा चुके हैं.
2011 में अमेरिका ने अपने इंटरनेशनल स्पेस स्टेशन (आईएसएस) में चीन को शामिल करने से इनकार कर दिया, जिसके बाद चीन ने अपना स्टेशन बनाने का फैसला किया और वह बना लिया. तियांगोंग, 2021 से काम कर रहा है और इसमें इस समय तीन चीनी अंतरिक्ष यात्री काम कर रहे हैं. चीन के किसी भी मानवयुक्त प्रक्षेपण में कोई मौत नहीं हुई है.
चीन ने अपनी पंचवर्षीय योजनाओं के दो सत्रों में विमानन और अंतरिक्ष उद्योग को 'स्तंभ उद्योग' का दर्जा दिया है. पहले यह विषय उभरते हुए क्षेत्र के रूप में वर्गीकृत था. पहली बार, 15वीं पंचवर्षीय योजना (2026-30) में साफ तौर पर 2030 तक चीन को अंतरिक्ष महाशक्ति बनाने का लक्ष्य निर्धारित किया गया है.

'स्पेस+' दृष्टिकोण
चीन के नए 'स्पेस+' दृष्टिकोण के अनुसार उपग्रह अवसंरचना, व्यापक औद्योगिक प्रणाली का हिस्सा है, जिसमें केवल संचार ही नहीं, पृथ्वी की कक्षा के कंप्यूटिंग उपयोग को लेकर भी दिलचस्पी बढ़ रही है.बहरहाल यह साल दोनों देशों के लिए महत्वपूर्ण साबित होने वाला है. चीनी रॉकेट अमेरिकी स्पेसएक्स के फैल्कन 9 के प्रतिस्पर्धी हैं, लेकिन फैल्कन 9 अभी चीनी रॉकेटों से आगे है. उसका पहला चरण पुनरोपयोगी है. कुछ बूस्टर अब तक 30 बार तक उपयोग में लाए जा चुके हैं.
चीन की ‘बेइदू’ प्रणाली, अमेरिका के जीपीएस से भले ही टक्कर ले रही है, पर सैटेलाइट इंटरनेट के मामले में, यह स्टारलिंक से कई साल पीछे है. सबसे मुश्किल काम, हजारों सैटेलाइटों को किफायती लागत पर पृथ्वी की निचली कक्षा में स्थापित करने में, वह अमेरिका से पीछे है.
नेविगेशन सैटेलाइट इतनी ऊँचाई पर होती हैं कि कुछ दर्जन सैटेलाइटों से पूरी दुनिया कवर हो जाती है, पर इंटरनेट नेटवर्क के लिए हजारों निचली कक्षा के सैटेलाइटों की आवश्यकता होती है. चीन के पास इतनी बड़ी संख्या में उपग्रह-प्रक्षेपण की क्षमता नहीं है, पर भविष्य में क्या होगा, अभी कहना मुश्किल है.
( लेखक हिंदी दैनिक हिन्दुस्तान के संपादक रहे हैं)
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