प्रोफेसर मज़हर आसिफ
दुनिया का इतिहास इस बात का गवाह है कि जिन कौमों ने ज्ञान को अपना मूलमंत्र बनाया, चिंतन को अपनी पूंजी माना और अनुशासन को जीवन में उतारा, उन्हें कोई भी शक्ति आगे बढ़ने से नहीं रोक सकी।इसके विपरीत, जिन समाजों ने क्षणिक भावनाओं को बुद्धि और विवेक पर हावी होने दिया, उनके हाथ से न केवल सत्ता गई, बल्कि उनकी सभ्यता और संस्कृति का अस्तित्व भी मिट गया।
यह प्रकृति का अटल नियम है कि राष्ट्रों का निर्माण शोर-शराबे से नहीं, बल्कि शांत चिंतन, निरंतर प्रयास और ज्ञान के अर्जन से होता है।इसी कारण हर जीवंत समाज अपनी आने वाली पीढ़ी को सबसे पहले शिक्षण संस्थानों का मार्ग दिखाता है, न कि संघर्ष और आंदोलन के मैदानों का।पवित्र कुरान में भी कहा गया है कि क्या वे जो जानते हैं और जो नहीं जानते, बराबर हो सकते हैं?

लोकतंत्र की गरिमा और अभिव्यक्ति की सीमाएं
लोकतंत्र की आत्मा अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता में बसी है। कोई भी सभ्य और संवैधानिक व्यवस्था नागरिकों को उनके अधिकार मांगने से नहीं रोकती। नागरिक अपने मुद्दों को उठाएं, अपनी मांगें रखें और शांतिपूर्ण माध्यमों से प्रशासन तक अपनी बात पहुंचाएं, यह लोकतंत्र का मुख्य हिस्सा है।
वैचारिक असहमति लोकतंत्र का सौंदर्य है। परंतु जब यही मतभेद कानून, नागरिक शिष्टाचार और संतुलन की सीमा पार कर जाता है, तो यह सुधार के बजाय व्यवस्था में व्यवधान का कारण बन जाता है। हक का सम्मान अपनी जगह है, लेकिन हक मांगने का तरीका उससे भी अधिक महत्व रखता है।
छात्र और राष्ट्र का निर्माण
विद्यार्थी किसी भी देश का वह मुख्य आधार होते हैं, जिस पर आने वाले कल की इमारत खड़ी होती है।आज जो युवा कालेजों और विश्वविद्यालयों में पढ़ाई कर रहा है, कल वही न्याय की सीट पर बैठकर न्याय करेगा, अस्पतालों में लोगों की जान बचाएगा, प्रयोगशालाओं में नई खोजें करेगा, सरकार संचालन में नीतियां बनाएगा और समाज को वैचारिक दिशा देगा।
यदि यही वर्ग अपने मूल उद्देश्य से भटक जाए, तो आने वाली पीढ़ियों के पास बौद्धिक दरिद्रता के अलावा कुछ नहीं बचेगा। छात्र की असली पहचान उसका अर्जित ज्ञान है, उसका विरोध-प्रदर्शन नहीं।उसका मुख्य साधन किताबें हैं, नारे नहीं।उसकी असली ताकत भीड़ जुटाने में नहीं, बल्कि उसके विचारों की गहराई, अध्ययन के विस्तार और चरित्र की मजबूती में है।
यदि छात्र का अधिकांश समय ऐसी गतिविधियों में बीतने लगे जो उसकी शैक्षणिक प्रगति में बाधा बनती हैं, तो नुकसान केवल एक व्यक्ति का नहीं होता, बल्कि पूरे देश का होता है।समाज और देश व्यक्तियों के ज्ञान से बनते हैं, केवल उनके जोश से नहीं।
युवाओं का मार्गदर्शन और विवेकपूर्ण निर्णय
युवावस्था में भावनाएं बहुत तीव्र होती हैं। इसी कारण इतिहास के हर दौर में विभिन्न राजनीतिक और सामाजिक ताकतों ने युवाओं के इस उत्साह का उपयोग अपने हितों के लिए करने का प्रयास किया है। समझदारी का तकाजा यही है कि छात्र हर बात पर तुरंत प्रतिक्रिया देने के बजाय पहले उसकी सच्चाई को परखें।
हर विचार को तर्क और विवेक की कसौटी पर तौलें।वे हर कदम इस जिम्मेदारी के साथ उठाएं कि उनकी एक गलती उनका पूरा भविष्य प्रभावित कर सकती है।जो समाज अपने युवाओं को भावनाओं के बहाव में छोड़ देता है, वह उन्हें ज्ञान के मार्ग का मार्गदर्शक कभी नहीं बना सकता।
अभिभावकों का त्याग और विद्यार्थियों की जिम्मेदारी
नया शैक्षणिक सत्र शुरू हो चुका है। देश के दूर-दराज के गांवों, कस्बों और छोटे शहरों से हजारों युवा इस उम्मीद के साथ विश्वविद्यालयों का रुख कर रहे हैं कि शिक्षा उनके जीवन की दशा और दिशा बदल देगी। उनके माता-पिता अपनी सुख-सुविधाओं का त्याग करते हैं, अपनी जरूरतें कम करते हैं और अपनी पूरी उम्मीदें बच्चों की पढ़ाई से जोड़ देते हैं।
यह त्याग केवल पैसों का नहीं होता, बल्कि इसमें उनकी वर्षों की भावनाएं और सपने शामिल होते हैं।ऐसे में हर विद्यार्थी का कर्तव्य है कि वह इस जिम्मेदारी को समझे।वह अपने समय का सही उपयोग उसी काम में करे जिसके लिए उसे शिक्षण संस्थान भेजा गया है।
इसका अर्थ यह कदापि नहीं है कि विद्यार्थी अपने अधिकारों को भूल जाए या सामाजिक मुद्दों से अनजान रहे।एक जागरूक युवा वही है जो अपने आसपास के माहौल को समझे, अन्याय पर चुप न रहे और सच्चाई की आवाज उठाए।परंतु उसका हर प्रयास ज्ञान की गरिमा, संविधान के सम्मान और कानून के दायरे के भीतर होना चाहिए। यही वह संतुलन है जो विरोध को भी गरिमा प्रदान करता है और शिक्षा के माहौल को भी सुरक्षित रखता है।
संवाद, कानून का शासन और सुधार की राह
वर्तमान परिस्थितियों में यह समझना आवश्यक है कि सरकार और जनता का रिश्ता आपसी विश्वास पर आधारित होता है। जब किसी वर्ग को कोई समस्या या शिकायत हो, तो शासन का दायित्व है कि वह उनकी बात सुने, उनके मुद्दों को समझे और न्यायोचित समाधान निकाले।
इसी प्रकार नागरिकों और विशेष रूप से छात्रों का दायित्व है कि वे अपनी मांगें ऐसे तरीके से रखें जिससे न तो कानून का इकबाल प्रभावित हो, न शिक्षा का माहौल बिगड़े और न ही राष्ट्रीय एकता को कोई ठेस पहुंचे।बातचीत वहीं संभव होती है जहां धैर्य हो, और धैर्य वहीं रहता है जहां ज्ञान और बुद्धि भावनाओं पर नियंत्रण रखती है।
यह राहत की बात है कि सरकार ने बार-बार यह संकल्प दोहराया है कि युवाओं के भविष्य और शैक्षणिक मुद्दों को पूरी गंभीरता से हल किया जाएगा। राष्ट्रीय शिक्षा नीति का उद्देश्य शिक्षा को केवल कुछ सीमित लोगों तक सीमित रखना नहीं है, बल्कि देश के हर विद्यार्थी तक गुणवत्तापूर्ण शिक्षा की पहुंच सुनिश्चित करना है।
इसके साथ ही, कानून का शासन हर हाल में कायम रहेगा। यदि कोई व्यक्ति नियमों का उल्लंघन करता है, तो उस पर संविधान के अनुसार कार्रवाई होगी। युवाओं का हित और उनका सुरक्षित भविष्य सर्वोपरि प्राथमिकता है। भर्ती परीक्षाओं में पेपर लीक जैसे मामलों में दोषियों को तुरंत सजा दिलाने और मुकदमों के शीघ्र निपटारे के लिए फास्ट ट्रैक अदालतों के गठन की बात कही गई है, ताकि युवाओं के भविष्य से खिलवाड़ करने वाले किसी भी व्यक्ति को बख्शा न जाए।
असहमति और शांतिपूर्ण रास्ते
एक सभ्य समाज में कानून का सम्मान ही वह नींव है जिस पर शांति, स्थिरता और न्याय की व्यवस्था टिकती है। इस बात को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता कि असहमति और दुश्मनी दो अलग बातें हैं।लोकतंत्र में असहमति को दबाया नहीं जाता, बल्कि उसे प्रकट करने के लिए मर्यादित और सभ्य रास्ते दिए जाते हैं।
जो समाज मतभेदों को सहन करना सीख लेता है, वह प्रगति के नए द्वार खोलता है।इसके विपरीत, जो हर असहमति को टकराव में बदल देता है, वह स्वयं अपनी सामूहिक शक्ति को कमजोर कर लेता है।इसलिए यह आवश्यक है कि हमारे शिक्षण संस्थान टकराव के केंद्र न बनें, बल्कि वे विचार, शोध, संवाद और सहनशीलता का केंद्र बनें।
शिक्षाविद और सामाजिक कार्यकर्ता सोनम वांगचुक का प्रयास हमारे सामने एक सीधा उदाहरण है।उन्होंने अपने विचारों को व्यक्त करने के लिए हमेशा ज्ञान, तर्क और सकारात्मक प्रयासों का रास्ता चुना।उनका काम यह साबित करता है कि स्थायी बदलाव नारों से नहीं, बल्कि निरंतर मेहनत, बौद्धिक गहराई और रचनात्मक कार्यों से आता है।समाज में असली क्रांति वही है जो सोच को रोशन करे, न कि भावनाओं को भड़काए।
मशहूर शायर प्रोफेसर वसीम बरेलवी का यह शेर इसी सच्चाई को बखूबी बयां करता है:
कौन सी बात कहां कैसे कही जाती है
यह सलीक़ा हो तो हर बात सुनी जाती है

समय की कीमत और आने वाला कल
मांग की प्रभावशीलता केवल उसकी सत्यता में नहीं, बल्कि उसके प्रस्तुतीकरण के तरीके में भी छिपी होती है।कड़ी असहमति भी अगर शालीनता, शिष्टाचार और तर्कों के साथ रखी जाए तो वह दिल में जगह बनाती है।वहीं, एक जायज मांग भी यदि उग्रता और अनियंत्रित व्यवहार में बदल जाए तो अपना प्रभाव खो देती है।
आज आवश्यकता इस बात की है कि विद्यार्थी स्वयं को केवल एक छात्र समूह न समझें, बल्कि देश की बौद्धिक धरोहर का संरक्षक मानें।उनकी सफलता केवल उनकी व्यक्तिगत उपलब्धि नहीं, बल्कि पूरे देश की सफलता है।उनकी असफलता केवल एक व्यक्ति की विफलता नहीं, बल्कि राष्ट्रीय संपदा का नुकसान है।
यही युवा आगे चलकर अदालतों में न्याय की रक्षा करेंगे, शिक्षण संस्थानों में ज्ञान का प्रकाश फैलाएंगे, प्रयोगशालाओं में नई तकनीकों का विकास करेंगे और देश के राजनीतिक, आर्थिक तथा सामाजिक जीवन को दिशा देंगे।यदि उनके हाथ से किताब छूट गई, तो देश के हाथ से उसका आने वाला कल छूट जाएगा।
सामाजिक और सार्वजनिक मुद्दों को हर समय राजनीतिक खींचतान का विषय नहीं बनाया जाना चाहिए।जब हर बात को केवल राजनीतिक नजरिए से देखा जाता है, तो मुख्य समस्या पीछे छूट जाती है और समाज में अनावश्यक विभाजन पैदा हो जाता है।राष्ट्रीय जीवन की सुंदरता इसी में है कि मतभेदों के बावजूद एकता बनी रहे, आलोचना के बावजूद सम्मान कायम रहे और मांगों के बावजूद संविधान और कानून की मर्यादा बनी रहे।
आज के विद्यार्थी को यह बात हमेशा ध्यान रखनी चाहिए कि समय जीवन का सबसे अनमोल हिस्सा है।जो समय पढ़ाई में बीतता है, वह चरित्र का निर्माण करता है।जो पल शोध और चिंतन में लगता है, वह देश के भविष्य को रोशन करता है।जो दिन ज्ञान प्राप्त करने में बीतता है, वह आने वाले वर्षों की सफलता की नींव रखता है।
इसके विपरीत, जो समय बिना किसी उद्देश्य के टकराव, अव्यवस्था या लापरवाही की भेंट चढ़ जाता है, वह कभी वापस नहीं आता। बुद्धिजीवियों का यही संदेश है कि युवा अपने अधिकारों के प्रति सचेत रहें, लेकिन अपनी जिम्मेदारियों को भी न भूलें। अपनी मांगें सामने रखें, लेकिन ज्ञान का साथ न छोड़ें।असहमति जताएं, लेकिन सभ्यता और कानून की सीमाओं के भीतर रहें।अपने भविष्य की सुरक्षा को हर दूसरे लक्ष्य से ऊपर रखें।यही संतुलन व्यक्ति को सम्मान देता है, देश को मजबूती प्रदान करता है और लोकतंत्र को लंबे समय तक बनाए रखता है।