सबीहाफातिमा/ बेंगलुरु
दिल्ली की तंग गलियों में शाम का ढलना एक अलग ही मंजर पेश करता है। हवा में बहती कव्वाली की तान और गुलाब की महक दिल को छू लेती है। दुकानों पर जलती अगरबत्तियां और रंगीन चादरें बिखरी पड़ी हैं। लोग मन्नत के धागे बांधते हैं। कुछ लोग रसीद काट रहे हैं। इसी भीड़ में खड़ा एक नौजवान सोच में पड़ जाता है। क्या वाकई खानकाह इसी व्यवस्था का नाम था? यह सवाल सिर्फ एक दरगाह से जुड़ा नहीं है। यह पूरी सूफी परंपरा और सभ्यता का सवाल है। सबीहा फातिमा की यह रिपोर्ट इसी ऐतिहासिक सफर को सामने लाती है।
खानकाह का मतलब सिर्फ किसी बुजुर्ग की मजार नहीं है। यह संत के जीवनकाल में बना एक आध्यात्मिक केंद्र होता था। यहाँ इंसान के चरित्र को संवारा जाता था। पूजा और इबादत के साथ यहाँ इंसानियत का पाठ पढ़ाया जाता था।

खानकाह शब्द फारसी के दो शब्दों से मिलकर बना है। खाना यानी घर और गाह यानी जगह। इसका सीधा अर्थ था एक ऐसा घर जहाँ जिंदगियां बदली जाती थीं। आठ सौ साल पहले की खानकाह में किसी से उसका धर्म या जात नहीं पूछी जाती थी। प्रवेश करते ही सबसे पहले खाना खिलाया जाता था।
इस्लामी इतिहास में खानकाह की नींव मदीना के चबूतरे असहाब-ए-सुफ्फा से मिलती है। वहाँ रहने वाले साथियों के पास धन-दौलत नहीं थी। उनके पास ज्ञान और सादगी थी। खलीफा उमर इब्न अल-खत्ताब ने अपने अंतिम समय में नया कफन लेने से मना कर दिया था। उनका मानना था कि जीवित लोगों को नए कपड़ों की ज्यादा जरूरत है। यही सादगी खानकाह की असली आत्मा बनी।
चौथी सदी हिजरी में मध्य एशिया और फारस में खानकाहें बनने लगीं। जब सूफी संत भारत आए तो वे केवल धर्म का संदेश लेकर नहीं आए। वे एक नई सामाजिक व्यवस्था के निर्माता बने।
लाहौर में दाता गंज बख्श, अजमेर में ख्वाजा मोइनुद्दीन चिश्ती, दिल्ली में निजामुद्दीन औलिया, मुल्तान में बहाउद्दीन जकारिया और गुलबर्गा में बंदा नवाज गेसू दराज ने ऐसी खानकाहें बनाईं जिनके दरवाजे सबके लिए खुले थे। यहाँ अमीर और गरीब एक ही दस्तरखवान पर बैठते थे। यहाँ फारसी और स्थानीय बोलियों का मिलन हुआ। अमीर खुसरो जैसे महान कवियों ने यहीं से नई सांस्कृतिक पहचान बनाई।

समय बीतने के साथ खानकाह का स्वरूप बदलने लगा। संत के जाने के बाद उनकी याद में दरगाहें बनीं। पहले दोनों में कोई अंतर नहीं था। खानकाह जीवित गुरु का मदरसा था और दरगाह उनकी याद का केंद्र थी।
पर धीरे-धीरे कुछ जगहों पर मकसद बदलने लगा। लंगर की जगह चंदे का हिसाब अहम होने लगा। अहंकार मिटाने वाली जगहों पर व्यक्ति पूजा शुरू हो गई। चादर और फूलों का एक व्यापारिक ढांचा खड़ा हो गया। हालांकि आज भी कई खानकाहें अपनी पुरानी सादगी और सेवा भाव को पूरी तरह संजोए हुए हैं।
उत्तर प्रदेश के चुनार किले की एक पुरानी कहानी इसकी मिसाल है। मुगल बादशाह जहांगीर के दौर में बाबा कासिम शाह सुलेमानी का नैतिक प्रभाव बहुत बढ़ गया था। शाही दरबार को लगा कि यह प्रभाव राजनीति के लिए खतरा बन सकता है। संत को चुनार किले में बंद कर दिया गया।
जनश्रुति है कि अजान होते ही उनकी जंजीरें खुल जाती थीं और वे नमाज अदा करके वापस आ जाते थे। इस घटना से प्रभावित होकर जहांगीर ने उनसे माफी मांगी और खानकाह के लिए जमीन दी। यह कहानी दिखाती है कि नैतिक ताकत हमेशा से राजनीतिक सत्ता से बड़ी रही है।
आज गुलबर्गा, अजमेर, दिल्ली और कलियर जैसी जगहों पर दो अलग दुनिया साथ दिखती हैं। एक तरफ लंगर और पुरानी सादगी कायम है। दूसरी तरफ आधुनिक व्यापार और राजनीति का असर है। चुनाव के समय बड़े नेता आशीर्वाद लेने आते हैं। वे जानते हैं कि सूफी गद्दी का असर हजारों वोटरों पर पड़ता है। इस तरह खानकाहें आध्यात्मिक केंद्र से सामाजिक और राजनीतिक असर की जगह बनती चली गईं।

इबादत का असली मकसद दिल को नरम करना था। लंगर का मकसद इंसानी बराबरी को बढ़ावा देना था। आज हमें इमारत के बजाय खानकाह की उस सोच की जरूरत है जो अहंकार को खत्म करती थी। खानकाह का असली नुकसान उसकी दीवारों का बदलना नहीं है। असली नुकसान उन मूल्यों को भूल जाना है जिनके लिए इन्हें बनाया गया था।
खानकाह और सूफी परंपरा से जुड़े मुख्य सवाल
खानकाह का मुख्य काम क्या होता था?
खानकाह एक आध्यात्मिक केंद्र, स्कूल, मुसाफिरखाना और लंगर खाना होता था। यहाँ गुरु अपने शिष्यों के चरित्र का निर्माण करते थे और समाज के हर वर्ग को भोजन और आश्रय देते थे।
खानकाह और दरगाह में क्या फर्क है?
खानकाह जीवित सूफी संत के निवास और शिक्षा का केंद्र होती थी। दरगाह किसी सूफी संत के निधन के बाद उनकी मजार या समाधि स्थल को कहा जाता है।
सूफी परंपरा में लंगर की शुरुआत क्यों हुई?
लंगर का मकसद समाज से ऊंच-नीच, भेद-भाव और जातिगत दूरियों को खत्म करना था। यहाँ अमीर और गरीब एक साथ बैठकर एक जैसा खाना खाते थे।