Prof. Fatima Sultana: Whose research brought back the roar of tigers to the forests of Hadoti
नीलम गुप्ता
कभी दर्रा और रामगढ़ के जंगल हाड़ौती (कोटा, बूंदी, झालावाड़) के बाघों की आरामगाह और राजाओं की शिकारगाह हुआ करते थे। पर आजादी के बाद ये दोनों ही धीरे धीरे खत्म होते चले गए क्योंकि राजस्थान और केंद्र सरकारों के वन विभागों ने सवाईमाधोपुर जिले के रणथंभौर के जंगलों को ही टाइगर रिजर्व के रूप में मान्यता देकर संरक्षित किया। नतीजा इन दोनों घने जंगलों से बाघ खत्म हो गए।
और उन्ही के साथ इन जंगलों का मध्य प्रदेश के गांधी सागर अभयारण्य से भी संपर्क टूट गया। रणथंभौर से लेकर रामगढ़ और दर्रा से होते हुए गांधीसागर तक के 17000 वर्ग किलोमीटर के घने जंगलो का मार्ग टाइगरों की सैरगाह था।
वे उन्मुक्त भाव से रणथंभौर से गांधीसागर तक आना-जाना करते थे। पर फिर सब छिन्न-भिन्न हो गया। अब पिछले करीब 10 साल से उनका यह आवागमन फिर से शुरू हुआ है। आज दर्रा अभयारण्य 250 वर्ग किमी. से बढ़कर करीब 800 वर्ग किमी. हो गया है और नाम मुकुंदरा हिल्स टाइगर रिजर्व। रामगढ़ अभयारण्य रामगढ़ विषधारी टाइगर रिजर्व। यह बदलाव कैसे हुआ?
कोटा जेडीबी गर्ल्स कॉलेज की प्रोफेसर फातिमा सुल्ताना के एक शोध से। वे बताती हैं कि मैंने कोटा में राजकीय महाविद्यालय से जूलॉजी में एमएसी की थी। 1988 में। टॉप किया था। नतीजतन तुरंत ही बतौर लेक्चरार पास ही के नगर बारां के गवर्मेंट कॉलेज में मेरी नौकरी लग गई। इसके बाद पूरे सर्विस पीरियड में चार बार मेरा तबादला अलग-अलग जगह हुआ जिसमें एक झालावाड़ भी था।
कोटा से झालावाड़ सड़क मार्ग से आते-जाते हुए दर्रा के घने जंगल मुझे बेहद आकर्षित करते थे। तभी सोचा करती थी कि जब भी रिसर्च की, इसी पर करूंगी। एक बार रिफ्रेशर कोर्स के लिए जोधपुर गई। वहां प्रोफेसर पी पी बार्करे मिले।
उन्होंने रणथंभौर अभयारण्य की वाइल्ड लाईफ पर हमें कई कुछ बताया। उनकी जानकारियों से मैं बहुत प्रभावित हुई। मैंने उनसे कहा कि मैं दर्रा सेंचुरी पर रिसर्च करना चाहती हूं। वे बोले-बहुत चैलेजिंग है। नहीं कर पाओगी। मैंने कहा-मैं मेहनत कर लूंगी। इसके बाद कोटा के जेडीबी कॉलेज से डा. अनुराधा सिंह के अंडर में मैंने अपना रजिस्ट्रेशन करवा लिया।
विषय रखा-राजस्थान के हाड़ौती क्षेत्र के दर्रा अभयारण्य की जीव विविधता (A study of the faunal diversity of Darrah sanctury of Hadoti region in Rajasthan)। वर्ष 2007 में मेरी पीएचडी पूरी हो गई। मैंने रिसर्च की एक कॉपी कोटा के वन एवं वन्य जीव विभाग को दी और एक जयपुर भी भेजी। उसके बाद पहली बार जयपुर में वन विभाग में दर्रा पर चर्चा की गई।
उसके कुछ दिन बाद राजस्थान सरकार के वाइल्ड लाइफ डिविजन, जयपुर से मेरे पास एक पत्र आया। इसमें मुझे इकोलोजिस्ट कहकर संबोधित किया गया था और अनुरोध किया गया था कि आप इस क्षेत्र को अच्छी तरह से जानती हैं तो क्या आप एक रिपोर्ट इस पर तैयार करके हमें दे सकती हैं कि इसमें बाघों को फिर से बसाया जा सकता है या नहीं। अगर हां तो कैसे। फरवरी 2012 में मैंने यह रिपोर्ट दे दी और अप्रैल 2013 में राजस्थान सरकार ने उस रिपोर्ट के आधार पर इसे मुकुंदरा हिल्स टाइगर रिजर्व घोषित कर दिया।
साथ ही रणथंभौर अभयारण्य से दो बाघों को यहां लाकर बसा भी दिया। पर इससे सरकार की रणथंभौर अभयारण्य में बाघों की घनी होती जा रही संख्या और उनके लिए घटती जा रही जगह की समस्या का हल नहीं हुआ। तब दोनों अभयारण्यों के बीच स्थित बुदी जिले के रामगढ़ विषधारी अभयारण्य को भी विकसित करना जरूरी हो गया। उससे रणथंभौर से मुकुंदरा हिल्स तक का वन गलियारा बाघों व वन्य जीवों के विचरण व नई बसावट के लिए पूर्ण सुरक्षित व संरक्षित हो सकता था।
वे कहती हैं-'अब वन्य जीव विभाग ने मुझे रामगढ़ विषधारी अभयारण्य पर भी बाघों के आवास की संभावनाओं पर वैसी ही रिपोर्ट तैयार करने के लिए कहा। 2022 में मैंने यह रिपोर्ट दे दी। उसकी सिफारिशों के आधार पर बाघों के आवास के लिए जो मसौदा तैयार किया गया उसमें भी डाटा विश्लेषण व तकनीकी विशेषज्ञ के रूप में मेरा योगदान रहा। बूंदी जिले में आने वाला यह रामगढ़ विषधारी अभयारण्य अब मात्र अभयारण्य नहीं रहकर बाघों का महत्वपूर्ण संरक्षण क्षेत्र बन चुका है।
इसके बनने के बाद रणथंभौर का बाघ रामगढ़ के जंगलों में से होते हुए मुकुंदरा हिल्स तक घूमकर बेखौफ वापस अपने स्थान पर जा सकता है। बाघ ही क्यों, वन्यप्रेमी देशी-विदेशी पर्यटकों के लिए भी अब यह एक ऐसा ट्रायंगल है जिसमें तीन-चार दिन तक वे प्रकृति व वन्यजीवों के बीच आराम से बिता सकते हैं।'
प्रो. सुल्ताना कहती हैं-मैं यह सब कर सकी क्योंकि यह मेरा पैशन था। राज्य का वन्य विभाग मेरी रिपोर्ट पर इसलिए आगे बढ़ा क्योंकि इससे पहले इन दोनों अभ्यारण्यों पर उसके पास फाइलों में इधर-उधर बिखरा हुआ डाटा तो था पर ऐसी कोई मुक्कमल रिपोर्ट नहीं थी जिसके आधार पर वह इन जगलों में बाघों को नए सिरे से बसा सकता।।
प्रोफेसर बार्करे ने ठीक ही कहा था कि यह बहुत चैलेंजिग होगा। पीएचडी पर जब काम शुरू किया और मैटर ढूंढने लगी तो कोटा व जयपुर के विभाग और लाइब्रेरियां सब कोरे मिले। देहरादून के वाइल्ड लाइफ इंस्टीच्यूट ऑफ इंडिया में भी इस पर कुछ नही था। केवल एक लाइन मिली जो बताती थी कि यह कितने लांगीच्यूड और लेटीच्यूड पर स्थित है।
वहां बहुत से वैज्ञानिक काम करते हैं पर उन्हें भी कोई जानकारी नहीं थी। इससे मुझे अपनी रिसर्च का महत्व समझ आने लगा था। निराश होने की बजाय मैंने अपनी कोशिशें और तेज कर दीं। अंततः कोटा के वन विभाग के आर्काइव से ही मुझे 1918 का एक बहुत पुराना डाक्युमेंट मिला। वह मेरे काम आया। पर आज के संदर्भ में मुझे पूरे जंगल को ही नए सिरे से बहुत अंदर तक जाकर वनस्पति और वन्य जीवों के बारे में देखना-समझना पड़ा।
यह काम मैं अकेले नहीं कर सकती थी। कॉलेज का काम भी देखना होता था इसलिए छुट्टी वाले दिन ही जा सकती थी। कई बार मेरे पति मेरे साथ जाते। पर वे हर बार नहीं जा सकते थे। बेटी छोटी थी तो कई बार उसे साथ ले जाना पड़ता। फारेस्ट आफिसर के पास छोड़ देती। जंगल में रात हो जाती तो बीच-बीच में भाग कर आती देखने के लिए कि बेटी ठीक तो है ना। आज सोचती हू तो लगता है कैसा जनून था मुझे कि मैने अपने बच्चों तक को खतरे में डाल दिया था।
दर्श के जंगलों में सुस्त भालुओं (sloth bear) की बहुतायत है। इनकी पारिस्थितिकी और जैव विविधिता पर यूजीसी प्रोजेक्ट के तहत प्रो. सुल्ताना ने तभी अलग से एक अध्ययन का लिया था। इस अध्ययन के आधार पर उन्हें ग्रीस व जापान में इंटरनेशनल कांफ्रेंस में आमत्रित किया गया।
वे कहती हैं-दोनों ही जगह दुनिया भर से आए वैज्ञानिको के बीच मैंने न केवल अपना रिसर्च पेपर पढ़ा, कुछ सत्रों की अध्यक्षता भी की। निश्चय ही ये क्षण मेरे लिए बेहद गौरव के क्षण थे। मैंने इस की कल्पना नहीं की थी। लगा, मेरी मेहनत बेकार नहीं गई।'
कोटा जिले के अंता के गवर्मेंट कॉलेज से फरवरी 2026 में प्रो. सुल्ताना प्रिंसिपल की पोस्ट से रिटायर हो गई। पर उससे पहले कोटा के जानकी देवी बजाज गर्ल्स कॉलेज में उन्होंने करीब 28 साल काम किया। पहले जूलॉजी डिपार्टमेंट के हैड के रूप में और फिर बतौर प्रिंसिपल। यहां उन्होंने जूलॉजी में ही एक अलग विशेष पेपर शुरू किया-फोरेस्टरी एंड वाइल्ड लाइफ मैनेजमेंट। इसलिए कि जूलॉजी का लेक्चरार ही वाइल्ड लाइफ का प्रोफेसर बन सकता है।
तो जब वह प्रोफेसर बनकर जाए तो कम से कम उसे वन्य जीवों के बारे में भी अच्छी जानकारी हो। वे कहती हैं-हमारे कॉलेज में तो बहुत-सी लड़कियों ने इस पेपर को चुना ही, अब सवाईमाधोपुर समेत राज्य के कई कॉलेजो में यह सब्जेक्ट में शामिल कर लिया गया है। इससे पहले वर्ष 2010 में उनकी कोशिशों से कोटा यूनिवर्सिटी में तो अलग से पूरा वन्य जीव विभाग ही शुरू कर दिया गया था।
प्रो. सुल्ताना ने केवल नए पेपर शुरू ही नहीं करवाए। अनेकों ऐसी कांफ्रेंस और वर्कशाप आयोजित कीं जिनसे विद्यार्थियों में वन्य जीवों और इस क्षेत्र में बहती चंबल और उसकी सहायक नदियों के प्रति उनकी रुचि बढ़ी और वे इनके गंभीर अध्ययन की ओर आकर्षित हुए।
उनके ये अध्ययन, निश्चय ही, इस क्षेत्र की हजारों किमी. में फैली अपार प्राकृतिक संपदा का आने वाली संतति की अमूल्य धरोहर होंगे। अभी तक उपेक्षित रहे यहां वन्य जीवों पर जलवायु परिवर्तन से आ रहे बदलावों को समझना और निवारक कदम उठाना आसान हो जाएगा। खुद प्रो. सुल्ताना ही करीब 50 से ज्यादा छात्र-छात्राओं को रिसर्च / पीएचडी करवा चुकी हैं। खुद के सौ से ज्यादा रिसर्च पेपर नेशनल व इंटरनेशनल पत्रिकाओं में छप चुके हैं।
वन्य जीवों और उनके अध्ययन (study of wild life and its study) संबंधी ये सभी प्रयास भले ही प्रो. सुलताना का पैशन थे पर उनके इन प्रयासों के पूरे हाड़ौती क्षेत्र में वन, वन्य जीव और समाज के संदर्भ में दूरगामी प्रभाव देखने को मिलेगे। तात्कालिक प्रभावों की बात करें तो युवाओं को रोजगार के नए अवसर मिले।
पर्यटन को बढ़ावा मिला। हाड़ौती की अभी तक उपेक्षित वन संपदा को एक नया जीवन और संरक्षण मिला। नेशनल पार्क के ये अभयारण्य अब राजाओं या शौकीनों की शिकारगाह नही है। अब ये संरक्षित स्थल हैं और बाघों समेत हर जीव जंतु बेखौफ इनमें विचरण करता है।
उन्हें अपनी जगह मिली है. अपना अधिकार मिला है। वन्य जीवों संबंधी अध्ययन पाठ्यक्रमों में शामिल हो जाने से हजारों किमी., जिसमें मध्यप्रदेश भी आ जाता है, के उपेक्षित वनों और नदियों के भीतर की अपार जीव संपदा का गहराई से अध्ययन हो सकेगा। तब किसी शोधार्थी को रिफरेंस मैटीरियल के लिए देहरादून नहीं जाना पड़ेगा। यह ऐसे ही नहीं है कि आज 14 से ज्यादा अवार्ड प्रो सुल्ताना की झोली में हैं।
उनके अनुसार मैं अपनी छात्राओं से हमेशा कहती हूं कि यह कभी मत सोचो कि मैं लड़की हूं। मैं भी तो लड़की थी पर देखो मैने कितना कुछ हासिल किया। मेरे वाइल्ड लाइफ रिसर्च या पेपर या किताबें सब काम मेरे कॉलेज की ड्यूटी के अलावा था। पर हर कॉलेज में काम करते हुए मैने उसमें नए आयाम जोड़े। तो अगर मैं इतना कर सकती हूं तो तुम भी कर सकती हो।