तिलक की विरासत, ज्ञान, संघर्ष और भाईचारे की मिसाल

Story by  आवाज़ द वॉयस | Published by  [email protected] | Date 01-08-2026
Lokmanya Tilak, who understood the importance of brotherhood alongside Swaraj.
Lokmanya Tilak, who understood the importance of brotherhood alongside Swaraj.

 

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समीर दि. शेख

1 अगस्त। 'भारतीय असंतोष के जनक' और स्वराज की सिंहगर्जना करने वाले लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक की पुण्यतिथि। स्कूली किताबों से लेकर सियासी मंचों तक, तिलक की तस्वीर एक गरम दल के नेता और कट्टर राष्ट्रवादी के तौर पर कायम की गई है।

लेकिन, अगर 1880 से 1920 तक के उनके 40 सालों के लगातार सार्वजनिक सफर पर नज़र डालें, तो तिलक के कुछ ऐसे अलग, सुलझे हुए और अंतरराष्ट्रीय सोच वाले पहलू सामने आते हैं, जिन्हें अक्सर नज़रअंदाज़ किया गया है।

जेल में उनका बेहिसाब किताबें पढ़ना, वामपंथी-मज़दूर आंदोलनों से उनका जुड़ाव और हिंदू-मुस्लिम भाईचारे की अंतरराष्ट्रीय समझदारी। इन्हीं सब बातों की वजह से महात्मा गांधी ने तिलक की शख्सियत को बयां करते हुए कहा था, "लोकमान्य एक समंदर की तरह हैं।"

मांडले की सख्त कैद में ऋग्वेद की रोशनी और 'गीतारहस्य' की रचना

1898 में राजद्रोह के पहले केस में सज़ा होने पर, तिलक के शानदार इल्म का एहतराम करते हुए जर्मन विद्वान मैक्स मूलर ने उनके द्वारा संपादित ऋग्वेद की एक कॉपी जेल में भिजवाई थी।

जेल से छूटने के बाद दोस्तों से गपशप करते हुए तिलक ने यूं ही कह दिया, "मैक्स मूलर साहब का भेजा हुआ ऋग्वेद पास होने की वजह से जेल के दिन बड़े मज़े में गुज़रे।" इस पर हैरानी से एक दोस्त ने पूछा, "दादा, जेल में कैसा मज़ा?" तब तिलक का जवाब बहुत ही गहरा था:"वो मज़ा तुम्हें तब तक समझ नहीं आएगा, जब तक तुम जेल में रहकर ऋग्वेद न पढ़ लो!"

1908 में, जब उनकी उम्र 50 के पार थी और वे शुगर की बीमारी से जूझ रहे थे, तब तिलक को 6 साल के लिए मांडले की जेल भेज दिया गया। वहां उन्होंने फ्रेंच और जर्मन विचारकों की असली किताबें पढ़ने के लिए, पहले भाषा सिखाने वाली किताबों की मदद से इन भाषाओं को सीखा।

मांडले जेल में कैद के दौरान ही उनकी पत्नी सत्यभामाबाई का इंतकाल हो गया। फिर भी अपने दिल के दर्द को किनारे रखकर उन्होंने 'गीतारहस्य' नाम की अमर किताब लिखकर पूरी की।बाद में 1925 में नेताजी सुभाष चंद्र बोस ने इसी मांडले जेल का दौरा किया था। वहां की दमघोंटू हवा में तिलक की ज्ञान-साधना के दिनों को याद करके सुभाष बाबू ने जज़्बाती होकर लिखा था:

"दुनिया से दूर एक जेल में, कमज़ोर शरीर के साथ किताबें पढ़ने और लिखने में पूरी तरह डूब जाना, सिर्फ तिलक जैसे ज्ञानयोगी के लिए ही मुमकिन था... यह मेरी ज़िंदगी की सबसे पवित्र यात्रा थी।"

लंदन की ऐतिहासिक सभा, जॉर्ज बर्नार्ड शॉ और लेनिन की दिलचस्पी

1905 के बाद और खास तौर पर रूसी क्रांति के बाद, तिलक समझ गए थे कि मज़दूर वर्ग देश की एक बहुत बड़ी सामाजिक ताकत है। 1919 में तिलक वकालत के एक मामले के सिलसिले में लंदन में थे।

वहां वह ब्रिटिश लेबर पार्टी और वहां की ट्रेड यूनियनों की एक बड़ी सभा में मुख्य वक्ता के तौर पर शामिल हुए। खास बात यह है कि इस सभा में मशहूर विचारक जॉर्ज बर्नार्ड शॉ भी एक वक्ता थे। भारत लौटने के बाद तिलक ने मज़दूर पार्टी को 2000 पाउंड का चंदा भेजकर अंतरराष्ट्रीय मज़दूर आंदोलन से भारत का नाता जोड़ा।

तिलक के इस वामपंथी और मज़दूरों के हक वाले नज़रिए पर रूसी क्रांति के नेता व्लादिमीर लेनिन की पैनी नज़र थी। लेनिन ने सिर्फ यह नहीं पूछा कि 'तिलक कौन हैं?', बल्कि ब्रिटिश कम्युनिस्ट पार्टी के अपने साथियों को लंदन में तिलक से मिलने का निर्देश भी दिया।इसी अंतरराष्ट्रीय भाईचारे की याद के तौर पर, आज भी लंदन में कम्युनिस्ट पार्टी के दफ्तर में लोकमान्य तिलक की तस्वीर बहुत ही इज़्ज़त के साथ लगाई गई है।

लखनऊ समझौते का ऐतिहासिक दस्तावेज़ और बैरिस्टर जिन्ना का साथ

1880 से 1900 के शुरुआती दौर में महाराष्ट्र में तालीम और 'केसरी'-'मराठा' अखबारों के ज़रिए बेदारी लाने वाले तिलक, बाद के दौर में राष्ट्रीय स्तर पर 'तिलक पर्व' के रूप में उभरे। इस दौरान उनका सबसे बड़ा सियासी पहलू हिंदू-मुस्लिम भाईचारे की वकालत करना था।

इतिहासकार डॉ. रिचर्ड कैशमैन ने साफ किया है कि 1890 के दशक में सार्वजनिक गणेशोत्सव शुरू करते वक्त तिलक ने उस दौर के 'मुहर्रम' के जुलूसों, संगठन और ताज़ियों में लोगों की हिस्सेदारी से प्रेरणा ली थी।1893-94 के दंगों के बाद, तिलक ने 'केसरी' के ज़रिए मुसलमानों को दोष देने के बजाय, अंग्रेजों की 'बांटो और राज करो' (नीति की कड़ी आलोचना की थी।1916 के लखनऊ समझौते में तिलक और बैरिस्टर मोहम्मद अली जिन्ना ने बहुत अहम भूमिका निभाई। कांग्रेस के कुछ नेताओं के मुसलमानों के लिए अलग चुनाव क्षेत्र के विरोध के बावजूद, तिलक ने डटकर इसका समर्थन किया। उन्होंने कहा था:

"अगर हमारे मुस्लिम भाइयों को कुछ रियायतें ज़्यादा मिल भी जाएं, तो इसमें कोई बुराई नहीं है। अंग्रेजों के खिलाफ लड़ते हुए हमारा एक साथ रहना सबसे अहम है।"

हसरत मोहानी के 'सियासी गुरु' और बीमार तिलक का खिलाफत आंदोलन

उत्तर भारत में 'इंकलाब ज़िंदाबाद' का नारा देने वाले मौलाना हसरत मोहानी, तिलक को अपना 'सियासी गुरु' मानते थे। 1907 के सूरत अधिवेशन में जब कांग्रेस में दरार पड़ी, तब हसरत मोहानी और उत्तर भारत के मुस्लिम नौजवान तिलक के गरम धड़े (कट्टर गुट) के साथ मज़बूती से खड़े रहे।

अगस्त 1920 में जब तिलक अपनी ज़िंदगी के बिल्कुल आखिरी दिनों में बीमार थे, तब मौलाना शौकत अली पुणे के 'सरदार गृह' में उनसे मिलने आए। खिलाफत आंदोलन के लिए समर्थन मांगते हुए, बीमार तिलक ने शौकत अली को अपने पास बुलाया और बहुत ही पक्के तौर पर कहा:

"मेरा दिमाग और मेरा दिल पूरी तरह से आपके आंदोलन के साथ है। अगर मेरे मुस्लिम भाई अंग्रेजों के ज़ुल्म के खिलाफ सड़कों पर उतर रहे हैं, तो मेरा और मेरी पार्टी का आपको पूरा समर्थन रहेगा।"

जनता के नेता की अवाम की भलाई और सबको साथ लेकर चलने की सोच

24 साल की उम्र में न्यू इंग्लिश स्कूल, फर्ग्यूसन कॉलेज और 'केसरी'-'मराठा' के ज़रिए लोगों को शिक्षित करने का श्रीगणेश करने वाले तिलक ने अपनी ज़िंदगी के 40 साल देश के काम में लगा दिए। इनमें से साढ़े सात साल उन्होंने जेल की बेहद सख्त सज़ा काटते हुए गुज़ारे।

लोकमान्य तिलक सिर्फ नारे लगाने वाले नेता नहीं थे। वे ज्ञान के उपासक थे, मज़दूर आंदोलन के दूरदर्शी समर्थक थे और हिंदू-मुस्लिम एकता की ज़रूरत को पहचानने वाले अंतरराष्ट्रीय स्तर के डिप्लोमेट थे। आज उनकी पुण्यतिथि के मौके पर उनकी इस सबको साथ लेकर चलने वाली विरासत को याद करना ही उन्हें सच्ची श्रद्धांजलि है।

( लेखक आवाज द वाॅयस मराठी के संपादक हैं)