इमान सकीना
इराक की तपन और रेगिस्तानी रास्तों पर हर साल इंसानियत का सबसे बड़ा सैलाब उमड़ता है। करोड़ों लोग नजफ शहर से कर्बला तक पैदल यात्रा करते हैं। यह मौका होता है अरबाईन का। पैगंबर मोहम्मद के नवासे इमाम हुसैन और उनके साथियों की शहादत के चालीसवें दिन यह खास आयोजन होता है। इस विशाल पैदल मार्च में एक दृश्य बार-बार दिल को छू जाता है। वह दृश्य है महिलाओं की अटूट मौजूदगी। वे इस कठिन सफर में केवल यात्री बनकर नहीं चलती हैं। वे रास्ते भर लोगों का सहारा बनती हैं। वे भूखों को खाना खिलाती हैं और कर्बला के पैगाम को आगे बढ़ाती हैं।
यह कोई मामूली धार्मिक अनुष्ठान या औपचारिकता भर नहीं है। यह उस इतिहास का विस्तार है जो तेरह सौ साल पहले कर्बला के मैदान में लिखा गया था। इमाम हुसैन की शहादत के बाद जुल्म का वह दौर खत्म हो सकता था।
कर्बला की आवाज वहीं दबाई जा सकती थी। लेकिन ऐसा नहीं हुआ। इस आवाज को दुनिया के कोने-कोने तक पहुंचाने का काम बीवी ज़ैनब ने किया। आज अरबाईन के रास्ते पर चलने वाली हर महिला उसी ऐतिहासिक विरासत को अपने कंधों पर उठाए हुए है।
बीवी ज़ैनब का अदम्य साहस और इतिहास की रक्षा
कर्बला का युद्ध केवल एक दिन में समाप्त हो गया था। मैदान में सिर्फ तबाही और अपनों को खोने का गम बचा था। हक और सच की खातिर लड़ने वाले योद्धा शहीद हो चुके थे। उस भीषण तबाही के बाद जो लोग जीवित बचे, उनमें सबसे आगे बीवी ज़ैनब थीं। बीवी ज़ैनब पैगंबर मोहम्मद की नातिन थीं। उन्होंने अपनी आंखों के सामने अपने भाइयों, बेटों और पूरे कुनबे को शहीद होते देखा था।
इतने बड़े व्यक्तिगत दुख के बाद भी उनका मनोबल नहीं टूटा। उन्होंने जालिमों के सामने घुटने टेकने से साफ मना कर दिया। कूफा की गलियों से लेकर यजीद के भरे दरबार तक, उन्होंने निर्भीक होकर अपनी बात रखी। उनके दिए गए भाषणों ने उस समय के तानाशाह शासकों की नींव हिला दी। उन्होंने कर्बला के सच को दुनिया के सामने उजागर किया।
बीवी ज़ैनब का जीवन हमें यह सिखाता है कि इतिहास की रक्षा केवल मैदान-ए-जंग में लड़ने वाले नहीं करते। कभी-कभी सबसे कठिन लड़ाई युद्ध समाप्त होने के बाद शुरू होती है। उनका सब्र कोई लाचारी नहीं था। उनकी शांति कोई कमजोरी नहीं थी। उन्होंने पूरे गरिमा के साथ कर्बला की जिम्मेदारी उठाई। वे उन लोगों की मजबूत आवाज बनीं जिनकी आवाज खामोश कर दी गई थी।
अरबाईन पदयात्रा में महिलाओं की अटूट आस्था
आज अरबाईन के मौके पर नजफ से कर्बला के अस्सी किलोमीटर लंबे रास्ते पर वही पुराना जज्बा दिखता है। इस यात्रा में हर उम्र और हर वर्ग की महिलाएं शामिल होती हैं।
सड़क पर लाठी के सहारे धीरे-धीरे चलती बुजुर्ग महिलाएं दिखाई देती हैं। अपनी गोद में दूध पीते बच्चों को लेकर मीलों का सफर तय करती युवा माएं दिखती हैं। दूर-दराज के देशों से आई छात्राएं और पेशेवर महिलाएं भी इस जत्थे का हिस्सा बनती हैं। कई विधवाएं शांत भाव से दुआ मांगते हुए आगे बढ़ती हैं। वहीं कई बेटियां अपने मां-बाप की मन्नत पूरी करने के लिए इस कठिन रास्ते पर निकल पड़ती हैं।
कठिन रास्तों पर चलते हुए पैरों में छाले पड़ जाते हैं। कई रातें बिना सोए बीतती हैं। दिन में चिलचिलाती धूप और रात में थकान हावी होती है। इसके बावजूद किसी के चेहरे पर शिकायत का भाव नहीं दिखता। उनकी लगन और भक्ति को सहूलियत या आराम के पैमाने पर नहीं मापा जा सकता।
कई महिलाओं के लिए यह यात्रा केवल एक कदम बढ़ाना भर नहीं है। यह उनके लिए ईश्वर का शुक्रिया अदा करने का तरीका है। यह अपनी पुरानी गलतियों से तौबा करने और एक नई उम्मीद पाने का माध्यम है।
कुछ महिलाएं बीमारी से निजात पाने की दुआ करती हैं। कुछ अपने परिवार की सलामती मांगती हैं। ज्यादातर महिलाएं सिर्फ पैगंबर के घराने के प्रति अपनी अटूट निष्ठा जाहिर करने आती हैं। उनका हर एक कदम यह ऐलान करता है कि सच्चाई और न्याय का पैगाम आज भी जिंदा है।
मवाकिब और निस्वार्थ सेवा की मिसाल
अरबाईन यात्रा में हर महिला केवल पैदल दूरी तय नहीं करती। हजारों की संख्या में ऐसी महिलाएं भी हैं जो इन यात्रियों की खिदमत में दिन-रात जुटी रहती हैं।पूरे इराक में इस दौरान हर घर एक तरह से सराय बन जाता है। सड़कों के किनारे अस्थायी सेवा केंद्र बनाए जाते हैं जिन्हें स्थानीय भाषा में मवाकिब कहा जाता है। इन केंद्रों के पीछे महिलाओं की अथक मेहनत छिपी होती है।
रसोईघर चौबीसों घंटे चालू रहते हैं। महिलाएं अजनबी यात्रियों के लिए भारी मात्रा में चावल, रोटी, सूप, चाय और पारंपरिक भोजन तैयार करती हैं। वे इसके बदले किसी से एक पैसा नहीं मांगती हैं। न ही उन्हें किसी नाम या तारीफ की भूख होती है।
खाना पकाने से लेकर साफ-सफाई तक का सारा काम बेहद सलीके से होता है। थके हुए यात्रियों के विश्राम के लिए जगह साफ की जाती है। महिलाओं के लिए सुरक्षित रहने की व्यवस्था बनाई जाती है। स्वयंसेवक महिलाएं आने वाली यात्रियों के गंदे कपड़े धोती हैं। वे उन्हें पीने का पानी बांटती हैं। छोटे बच्चों का ध्यान रखती हैं और बुजुर्गों का हाथ पकड़कर उन्हें सही रास्ता दिखाती हैं।
यह काम किसी अखबार या टीवी की सुर्खियों में जगह नहीं पाता। लेकिन सच यह है कि इस सेवा के बिना इतनी बड़ी यात्रा का संचालन संभव ही नहीं है। यह निस्वार्थ सेवा इस बात का जीता-जागता सबूत है कि इंसानियत की भलाई ही ईश्वर की सच्ची इबादत है।सच्ची ताकत हमेशा शोर मचाकर नहीं आती। कभी-कभी टूट चुके दिल के साथ भी मुस्कुराते हुए कर्तव्य निभाना ही सबसे बड़ी ताकत कहलाता है।
आधुनिक जीवन में बीवी ज़ैनब का आदर्श
आज के आधुनिक युग में जब महिलाएं कई तरह की सामाजिक और मानसिक चुनौतियों से जूझ रही हैं, तब बीवी ज़ैनब का जीवन उनके लिए एक बड़ा संबल बनता है। महिलाएं इस यात्रा को केवल शोक प्रकट करने का जरिया नहीं मानतीं। वे इसे बीवी ज़ैनब के गुणों को अपने जीवन में उतारने का अवसर मानती हैं।
बीवी ज़ैनब में अटूट सब्र था, लेकिन उन्होंने कभी अपने उसूलों से समझौता नहीं किया। उनके दिल में हर किसी के लिए दया थी, लेकिन वे कभी लाचार नहीं बनीं। वे गहरे दुख में थीं, फिर भी उन्होंने उम्मीद का दामन नहीं छोड़ा।
आज के दौर में जब महिलाएं अपनी नौकरी संभालती हैं, बच्चों की परवरिश करती हैं, बुजुर्गों की देखभाल करती हैं और पढ़ाई में आगे बढ़ती हैं, तो उन्हें विपरीत परिस्थितियों में हिम्मत से खड़े रहने की प्रेरणा मिलती है। उनका जीवन यह याद दिलाता है कि सच बोलने के लिए और अपने फर्ज को निभाने के लिए किसी बड़े मंच की जरूरत नहीं होती।
अगली पीढ़ी को संस्कार सौंपती माएं
अरबाईन की राह में अनगिनत माएं अपने नन्हे बच्चों को साथ लेकर चलती हैं। शारीरिक रूप से यह बेहद थका देने वाला काम है। फिर भी वे ऐसा करती हैं। वे चाहती हैं कि उनके बच्चे कर्बला के पाठ को केवल किताबों में न पढ़ें, बल्कि उसे अपनी आंखों से अनुभव करें।
बच्चे इस यात्रा के दौरान सेवा और त्याग का ऐसा दृश्य देखते हैं जो दुनिया में कहीं और देखने को नहीं मिलता। वे देखते हैं कि कैसे बिल्कुल अनजान लोग बिना किसी स्वार्थ के उन्हें खाना और पानी दे रहे हैं। वे देखते हैं कि लोग बिना किसी संकोच के दूसरों के रहने की जगह साफ कर रहे हैं। इस माहौल में रहकर बच्चे सीखते हैं कि असली सम्मान दूसरों से सेवा लेने में नहीं, बल्कि दूसरों की सेवा करने में है।
यह सीख जीवन भर उनके साथ रहती है। कर्बला की यह कहानी सदियों से इसलिए जिंदा है क्योंकि इसे हर पीढ़ी ने अगली पीढ़ी तक पूरी ईमानदारी से पहुंचाया है। इस परंपरा को जीवित रखने में महिलाओं की भूमिका सबसे अहम रही है।
Arbaeen is more than a walk—it’s a global movement for justice, unity, and resilience against oppression.
— علمدار🚩 (@Allamdar110) July 30, 2026
Humbled to be in Iraq to witness and document the world’s largest peaceful gathering, where millions walk from Najaf to Karbala for Imam Hussain.
#Arbaeen2026 pic.twitter.com/tXOHVYi16A
निष्कर्ष
अरबाईन का विशाल आयोजन इस बात का गवाह है कि इतिहास केवल उन लोगों को याद नहीं रखता जिन्होंने तलवारें चलाईं। इतिहास उन लोगों को भी नमन करता है जिन्होंने सब्र, गरिमा, करुणा और अटूट विश्वास के साथ लड़ाई लड़ी।
करोड़ों लोगों के कदम भले ही कर्बला की ओर बढ़ते हों, लेकिन इस पूरी यात्रा को जो ऊर्जा और आत्मा मिलती है, वह महिलाओं के त्याग से मिलती है। बीवी ज़ैनब से शुरू हुआ यह सफर आज भी हर उस मां, बहन, बेटी और स्वयंसेवक के रूप में जारी है जो चुपचाप इस महान विरासत को संभाल रही हैं।