असम बाढ़ पीड़ितों के पुनर्वास के लिए आगे आए समाज: मौलाना कासमी

Story by  आवाज़ द वॉयस | Published by  [email protected] | Date 01-08-2026
Society must step forward for the rehabilitation of Assam flood victims: Maulana Qasmi
Society must step forward for the rehabilitation of Assam flood victims: Maulana Qasmi

 

मुन्नी बेगम | गुवाहाटी

असम में आई विनाशकारी बाढ़ का पानी अब कई इलाकों से उतर चुका है, लेकिन लाखों लोगों की मुश्किलें अभी खत्म नहीं हुई हैं। राहत शिविरों से आगे बढ़कर अब सबसे बड़ी चुनौती लोगों को फिर से सामान्य जीवन में लौटाना है। हजारों परिवार अपने घर, खेती, पशुधन और रोजी रोटी का साधन खो चुके हैं। ऐसे समय में प्रसिद्ध इस्लामी विद्वान मौलाना नूरुल अमीन कासमी ने समाज से ऐसी अपील की है, जिसने राहत कार्यों की दिशा को नया संदेश दिया है।

मौलाना कासमी ने कहा कि अब केवल राशन, कपड़े और जरूरी सामान बांटना काफी नहीं है। असली जरूरत लोगों के घर दोबारा बसाने, खेती को फिर से खड़ा करने और टूटे हुए परिवारों को नई उम्मीद देने की है। उन्होंने सक्षम लोगों से श्रमदान करने और अनाथ हुए बच्चों की जिम्मेदारी उठाने का आह्वान किया।

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हाल ही में मौलाना कासमी ने शिवसागर जिले के कई बाढ़ प्रभावित गांवों का दौरा किया। उनके साथ लोकप्रिय यूट्यूबर और वीडियो क्रिएटर भास्कर, स्थानीय पत्रकार और कई सामाजिक कार्यकर्ता भी मौजूद थे। दौरे के दौरान उन्होंने प्रभावित परिवारों से मुलाकात की और हालात का जायजा लिया।

निरीक्षण के बाद उन्होंने कहा कि अनेक इलाकों में राहत सामग्री लोगों तक पहुंच चुकी है। खाने का सामान, पीने का पानी और कपड़ों जैसी तत्काल जरूरतों को काफी हद तक पूरा किया गया है। लेकिन अब असली चुनौती पुनर्वास की है। यदि लोग अपने घरों और रोजगार से दोबारा नहीं जुड़ पाए, तो राहत सामग्री भी लंबे समय तक उनका सहारा नहीं बन सकेगी।

मौलाना कासमी ने कहा कि समाज के हर वर्ग को अब श्रमदान की भावना से आगे आना चाहिए। उन्होंने बताया कि कई घर अब भी कीचड़ और मलबे से भरे पड़े हैं। अनेक मकान पूरी तरह ढह चुके हैं, जबकि कई रहने लायक नहीं बचे। ऐसे परिवारों की मदद करना और उनके घरों की सफाई, मरम्मत तथा पुनर्निर्माण में हाथ बंटाना इस समय सबसे बड़ा सामाजिक दायित्व है।

उन्होंने खेती और आजीविका की बहाली को भी उतना ही जरूरी बताया। उनके अनुसार बाढ़ के कारण हजारों हेक्टेयर कृषि भूमि पर मिट्टी और रेत की मोटी परत जम गई है। तालाबों को भी भारी नुकसान पहुंचा है। ऐसे में जरूरत इस बात की है कि लोगों को फिर से अपने पैरों पर खड़ा होने में मदद मिले। उन्होंने कहा कि सक्षम संस्थाएं और समाजसेवी संगठन किसानों और छोटे कारोबारियों को आर्थिक रूप से आत्मनिर्भर बनाने की दिशा में काम करें।

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मौलाना कासमी ने कहा कि प्राकृतिक आपदाएं केवल संपत्ति का नुकसान नहीं करतीं, बल्कि लोगों के मन पर भी गहरा असर छोड़ती हैं। कई परिवारों ने अपने प्रियजनों को खो दिया है। ऐसे लोगों को केवल आर्थिक सहायता नहीं, बल्कि मानसिक और भावनात्मक सहारा भी चाहिए। उन्होंने कहा कि समाज का दायित्व है कि वह ऐसे परिवारों में फिर से उम्मीद जगाए और उन्हें विश्वास दिलाए कि वे अकेले नहीं हैं।

उनकी अपील का सबसे भावुक हिस्सा उन बच्चों को लेकर था जिन्होंने इस आपदा में अपने माता पिता या अभिभावकों को खो दिया। उन्होंने समाज के सक्षम लोगों से ऐसे बच्चों की शिक्षा, पालन पोषण और सुरक्षित भविष्य की जिम्मेदारी उठाने का आग्रह किया। उनका कहना था कि किसी एक अनाथ बच्चे का जीवन संवारना हजारों राहत पैकेट बांटने से भी अधिक बड़ा सामाजिक कार्य है।

उन्होंने समाजसेवियों, स्वयंसेवी संस्थाओं, व्यापारियों, सोशल मीडिया क्रिएटर्स, शिक्षित युवाओं और आम नागरिकों से एक साथ मिलकर काम करने की अपील की। उन्होंने कहा कि यह केवल संवेदना जताने का समय नहीं है। अब जरूरत है कि लोग बाढ़ प्रभावित गांवों में पहुंचें और पीड़ित परिवारों के साथ मिलकर उनके जीवन को फिर से खड़ा करें।

इस बीच असम में बाढ़ की स्थिति अब भी गंभीर बनी हुई है। आधिकारिक आंकड़ों के अनुसार राज्य में बाढ़ से मरने वालों की संख्या बढ़कर 78 हो गई है। सात जिले अब भी प्रभावित हैं। इनमें शिवसागर, चराइदेव, गोलाघाट, जोरहाट, नगांव और बिश्वनाथ सबसे अधिक प्रभावित माने जा रहे हैं। राज्य के 21 राजस्व सर्किल और 551 गांव बाढ़ की चपेट में हैं। करीब तीन लाख लोग अब भी इस आपदा से प्रभावित हैं। वहीं 21 हजार 523 हेक्टेयर से अधिक कृषि भूमि को नुकसान पहुंचा है।

राज्य सरकार ने केंद्र से विशेष राहत और पुनर्वास पैकेज की मांग की है। मुख्यमंत्री हिमंत बिस्वा सरमा ने अंतर मंत्रालयी केंद्रीय टीम के सामने यह प्रस्ताव रखा है। उन्होंने कहा कि इस वर्ष की बाढ़ सामान्य नहीं थी। इसका प्रभाव बेहद व्यापक रहा है। इसलिए इसे असाधारण और उच्च तीव्रता वाली प्राकृतिक आपदा के रूप में माना जाना चाहिए।

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आपदा प्रभावितों के बीच बांटी जा रही है राहत सामग्री

राज्य सरकार ने केंद्र से राहत, आवास निर्माण, बुनियादी ढांचे की मरम्मत और आजीविका बहाली के लिए विशेष आर्थिक सहायता देने का आग्रह किया है। इसके साथ ही सड़क, पुल, स्कूल, अस्पताल, पेयजल और बिजली व्यवस्था के पुनर्निर्माण के लिए भी अलग सहायता पैकेज की मांग की गई है। सरकार ने महिलाओं, बच्चों, दिव्यांगों और बुजुर्गों के लिए विशेष सहायता की भी सिफारिश की है।

उधर असम जातीय परिषद ने केंद्र सरकार से राज्य में हर साल आने वाली बाढ़ और कटाव को राष्ट्रीय आपदा घोषित करने की मांग की है। पार्टी ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से प्रभावित क्षेत्रों का दौरा करने और स्थिति का प्रत्यक्ष आकलन करने का भी आग्रह किया है। इसके साथ ही आपदा प्रबंधन कानून में आवश्यक संशोधन करने की मांग भी उठाई गई है।

विशेषज्ञों का मानना है कि राहत सामग्री बांटना जरूरी है, लेकिन स्थायी समाधान केवल पुनर्वास से ही संभव है। मौलाना नूरुल अमीन कासमी की अपील भी इसी दिशा में एक महत्वपूर्ण संदेश देती है।

उनका कहना है कि किसी भी आपदा के बाद समाज की असली ताकत सरकारी मशीनरी से नहीं, बल्कि लोगों के आपसी सहयोग, संवेदनशीलता और एकजुटता से दिखाई देती है। असम के लाखों बाढ़ पीड़ित आज उसी सामूहिक सहयोग और मानवीय भावना की प्रतीक्षा कर रहे हैं।

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असम में बाढ़ के बाद सबसे बड़ी चुनौती क्या है?

बाढ़ के बाद सबसे बड़ी चुनौती राहत वितरण नहीं बल्कि पुनर्वास, घरों का पुनर्निर्माण, खेती की बहाली और लोगों की आजीविका को फिर से स्थापित करना है।

मौलाना नूरुल अमीन कासमी ने क्या अपील की?

उन्होंने समाज से श्रमदान करने, बाढ़ पीड़ितों के घर बनाने, खेती बहाल करने और अनाथ बच्चों की शिक्षा व पालन पोषण की जिम्मेदारी लेने की अपील की।

असम बाढ़ में कितने लोग प्रभावित हुए?

ताजा सरकारी आंकड़ों के अनुसार करीब तीन लाख लोग अब भी बाढ़ से प्रभावित हैं और 78 लोगों की मौत हो चुकी है।

असम सरकार ने केंद्र से क्या मांग की?

राज्य सरकार ने विशेष राहत पैकेज, आवास निर्माण, बुनियादी ढांचे की मरम्मत, आजीविका बहाली और बाढ़ प्रभावित जिलों के पुनर्निर्माण के लिए विशेष केंद्रीय सहायता की मांग की है।