अब्दुल्लाह मंसूर
NEET-UG परीक्षा में हुई धांधली और गड़बड़ियों के बाद जब केंद्रीय शिक्षा मंत्रालय में अचानक बड़े प्रशासनिक फेरबदल हुए, तो इसने पूरे देश के सामने एक बड़ा और गंभीर सवाल खड़ा कर दिया। सवाल यह है कि क्या चुनाव में मिली भारी जीत और बड़ा जनादेश किसी सरकारी संस्थान की साख और उसकी ईमानदारी की गारंटी बन सकता है? अगर हम इस पूरे मामले को सियासी और नीतिगत नज़रिए से देखें, तो यह सिर्फ किसी मंत्री के इस्तीफे या दफ्तर के अफसरों को बदलने की मामूली बात नहीं है।
यह मामला इस बात की गहराई से पड़ताल करता है कि आज के दौर में जब पुरानी और पारंपरिक राजनीति का जोर है, तब 'कॉकरोच जनता पार्टी' (CJP) जैसे डिजिटल और प्रतीकात्मक अभियानों ने विरोध जताने का एक बिल्कुल नया तरीका कैसे ईजाद किया है।
यह बहस न केवल भारत की नई पीढ़ी (Gen Z) के गहरे होते पढ़ाई-लिखाई और रोज़गार के संकट को उजागर करती है, बल्कि यह भी साफ करती है कि मुश्किल वक्त में सरकार की सूझबूझ, तेजी से किए गए सुधार और अवाम के साथ सीधा संवाद ही लोकतंत्र में लोगों का यकीन बहाल रख सकते हैं।

युवा आक्रोश से नए दौर के विरोध तक
इस पूरे बवाल की मुख्य वजह प्रवेश परीक्षाओं में हुई तकनीकी खामियाँ, पेपर लीक के आरोप, भारी अनियमितताएँ और उसके बाद परीक्षा के आयोजन पर मंडराता अनिश्चितता का साया रहा। परीक्षा प्रक्रिया के बाधित होने और उससे जुड़े मानसिक तनाव व आघात के कारण कई अभ्यर्थियों द्वारा आत्महत्या किए जाने की घटनाओं ने देश के युवाओं और उनके परिवारों की फिक्र को कई गुना बढ़ा दिया।
भारत के एक बहुत बड़े मध्यम वर्ग के लिए उच्च शिक्षा और मेडिकल या इंजीनियरिंग जैसी पेशेवर परीक्षाएँ ही सामाजिक और आर्थिक तरक्की का सबसे अहम ज़रिया होती हैं। जब 20लाख से ज्यादा छात्र और उनके परिवार अपनी सालों की मेहनत और जमापूंजी लगाकर तैयारी करते हैं और अचानक पूरी व्यवस्था की निष्पक्षता पर सवाल उठने लगते हैं, तो यह सीधे तौर पर नागरिकों के भरोसे पर चोट होती है।
यह मामला तब और संवेदनशील हो गया जब अदालती और प्रशासनिक कार्रवाई के दौरान आई सख्त टिप्पणियों को युवाओं ने अपने आत्म-सम्मान और अपनी पहचान से जोड़ लिया। हालांकि बाद में प्रशासन और आला अफसरों ने यह साफ किया कि उनकी बातें मेहनत करने वाले ईमानदार छात्रों के खिलाफ नहीं थीं, बल्कि वे उन गलत तत्वों के लिए थीं जो सिस्टम का नाजायज फायदा उठाते हैं।
लेकिन तब तक देश के युवाओं ने इस प्रतीकात्मक नाम 'कॉकरोच' को ही अपनी एकजुटता और प्रतिरोध का जरिया बना लिया था। इस डिजिटल अभियान ने देखते ही देखते जंतर-मंतर पर एक लंबे धरने, सोनम वांगचुक जैसी नामचीन हस्तियों के अनशन और देश भर के छात्रों की सक्रिय भागीदारी का रूप ले लिया।
जिस सोशल मीडिया और इंस्टाग्राम को केवल समय बिताने का जरिया मानकर युवाओं का मजाक उड़ाया जाता था, उसी को उन्होंने राजनीति के खिलाफ सबसे बड़ा हथियार बना दिया। युवाओं ने विरोध को मजाकिया बनाया, लेकिन उसकी गंभीरता को कम नहीं होने दिया।
अगर हम इतिहास से इसकी तुलना करें, तो 2011का अन्ना हजारे आंदोलन काफी हद तक पारंपरिक मीडिया, बड़े न्यूज़ चैनलों और स्थापित राजनीतिक दलों के ताने-बाने पर टिका हुआ था। इसके ठीक उलट, Gen Z का यह छात्र आंदोलन बिना किसी बड़े नेता, पारंपरिक मीडिया या राजनीतिक झंडे के पूरी तरह खुद-ब-खुद खड़ा हुआ।
आज की नई पीढ़ी ने इंटरनेट, रील्स, यूट्यूब शॉट्स, मीम्स और व्यंग्य को अपना सबसे बड़ा हथियार बनाया। जब सरकारी तंत्र के बचाव में दिए गए बयानों के जवाब में युवाओं ने तंज़िया गानों और मीम्स का सहारा लिया, तो पुरानी प्रशासनिक रणनीतियाँ नाकाम साबित हुईं।
आमतौर पर ऐसे आंदोलनों पर यह आरोप लगा दिया जाता है कि इन्हें विरोधी सियासी ताकतों द्वारा भड़काया जा रहा है, लेकिन इस बार छात्रों के सहज और अनोखे अंदाज़ ने इन तमाम आरोपों को बेअसर कर दिया। यहाँ तक कि विपक्षी पार्टियाँ भी इस आंदोलन पर अपना कब्ज़ा जमाने में नाकाम रहीं और उन्होंने एक सुरक्षित दूरी बनाकर सिर्फ अपना समर्थन जताया।
इस आंदोलन की सबसे बड़ी खासियत इसका अंदाज़ है यह विरोध के पारंपरिक और भारी-भरकम तरीकों के बजाय हास्य, मीम्स और व्यंग्य को हथियार बनाता है। युवा जानते हैं कि जब सिस्टम अपनी जिम्मेदारियों से भागता है या निरर्थक तर्क देता है, तो उस पर रोने के बजाय तंज़ और मज़ाक के ज़रिए प्रहार करना ज्यादा असरदार होता है।
विरोध को इस चुटीले रूप में पेश करके युवाओं ने मुद्दे की गंभीरता को कम नहीं होने दिया, बल्कि उसे और व्यापक बना दिया। इससे यह साफ होता है कि राजनीति में अपनी बात रखने का तरीका अब किसी मुख्यधारा मीडिया या राजनीतिक मंच का मोहताज नहीं रहा, बल्कि स्मार्टफ़ोन के ज़रिए सीधे जनता से जुड़ रहा है।
Speaking at a public protest, a citizen criticizes the government for taking responsibility only after immense pressure and loss, calling late resignations a mere gesture rather than true accountability. Pointing to broader socioeconomic challenges like taxes, the Agniveer… pic.twitter.com/3sCFYPZK3J
— The CSR Journal (@thecsrjournal) July 25, 2026
संस्थागत साख, डेमोग्राफिक लाभांश और भावी राह
इस पूरे घटनाक्रम से जो सबसे बड़ा नीतिगत सवाल सामने आता है, वह है चुनावी जीत और सरकारी संस्थाओं की साख के बीच संतुलन का। चुनाव में मिलने वाला जनादेश सरकार को नीतियाँ बनाने का कानूनी हक तो देता है, लेकिन संस्थाओं की साख वह नैतिक ताकत होती है जिससे आम नागरिक बिना किसी डर या शक के सरकारी तंत्र में अपना विश्वास बनाए रखते हैं।
NEET परीक्षा के मामले में आई नाकामियों ने यह साफ कर दिया कि पारदर्शी व्यवस्था का स्तर हमेशा ऊँचा और निष्पक्ष होना चाहिए। यह असंतोष सिर्फ छात्रों तक ही सीमित नहीं रहा, बल्कि सत्ताधारी दल के अपने पारंपरिक समर्थकों यानी मध्यम वर्ग के परिवारों में भी देखा गया, जिन्हें लगा कि प्रशासनिक ढिलाई से परीक्षाओं की गरिमा प्रभावित हो रही है।
इसके साथ ही, यह मुद्दा भारत की युवा आबादी (डेमोग्राफिक लाभांश) के सही इस्तेमाल पर भी ध्यान खींचता है। आवधिक श्रम बल सर्वेक्षण (PLFS) और संयुक्त राष्ट्र के आंकड़े बताते हैं कि भारत में 37 करोड़ से ज्यादा युवा आबादी है। लेकिन सिर्फ युवाओं की बड़ी संख्या होना ही खुशहाली की ज़मानत नहीं होता; यह शक्ति तभी देश के काम आ सकती है जब उन्हें अच्छी पढ़ाई के बाद सही और सम्मानजनक रोज़गार मिले।
मौजूदा वक्त में पढ़े-लिखे युवाओं में बेरोज़गारी एक बहुत बड़ी चुनौती बनी हुई है। देश का एक बड़ा वर्ग अपनी ज़िंदगी के सबसे कीमती साल कोचिंग सेंटरों में तैयारी में गुज़ार देता है। जब एक तरफ शिक्षा का स्तर गिर रहा हो और दूसरी तरफ अवसरों की कमी महसूस होने लगे, तो युवाओं का गुस्सा सिर्फ एक परीक्षा रद्द कराने तक सीमित नहीं रहता, बल्कि यह पूरी व्यवस्था से जवाब माँगने लगता है।
बांग्लादेश या नेपाल में हाल के सालों में हुए उग्र और हिंसक बदलावों की तुलना में, भारत का यह छात्र आंदोलन सरकार गिराने या तख्तापलट की माँग करने के बजाय सिर्फ व्यवस्था में सुधार जैसे परीक्षा में पारदर्शिता, सख्त कानून और जवाबदेही तक ही सीमित रहा। यह बात भारतीय लोकतंत्र की परिपक्वता को दर्शाती है।
जब पुलिस द्वारा बल प्रयोग या लाठीचार्ज की घटनाएँ हुईं, तो इससे संस्थागत वैधता को नुकसान पहुँचा और लगा कि शायद यह आवाज़ दब जाएगी। लेकिन इस प्रशासनिक कठोरता के बावजूद छात्रों की निष्पक्षता और न्याय की माँग और अधिक मुखर हो गई। सड़क पर नियंत्रण पाना लेकिन सोशल मीडिया नैरेटिव में पिछड़ जाना यह दिखाता है कि दमन से समस्या का हल नहीं निकलता।
संवाद और सुधारात्मक कदम
टकराव और तनाव के बाद, इस पूरे मसले का सबसे सकारात्मक पहलू यह रहा कि सरकार ने आखिरकार हालात की नज़ाकत को समझा और लचीलापन दिखाया। शिक्षामंत्री के त्यागपत्र और अधिकारियों के फेरबदल के अलावा बड़े नीतिगत और तकनीकी बदलावों की दिशा में कदम बढ़ाए गए।
संसद में कड़े नकल विरोधी कानून से जुड़े प्रावधानों को लाने, दोषियों के लिए सख्त सजा व जुर्माने तय करने और विशेष फास्ट-ट्रैक अदालतों के गठन का भरोसा दिया गया। इसके साथ ही, व्यवस्था को पारदर्शी बनाने के लिए नेशनल टेस्टिंग एजेंसी (NTA) जैसी संस्थाओं का निष्पक्ष ऑडिट, ऑनलाइन सीबीटी (CBT) परीक्षाओं का विस्तार और आधुनिक तकनीकों के ज़रिए पेपर लीक की गुंजाइश को खत्म करने की पहल की गई। सरकार द्वारा नंदन नीलेकणी की अध्यक्षता में गठित हाई पावर्ड टास्क फोर्स इस बात का साफ संकेत है कि हुकूमत परीक्षा प्रणाली में संरचनात्मक सुधार चाहती है।
जिद या जिद्दी रवैया अपनाने के बजाय सरकार द्वारा जनता की भावनाओं का सम्मान करना और शिक्षा मंत्री का इस्तीफा स्वीकार करते हुए सुधारों की प्रतिबद्धता जताना यह दिखाता है कि शासन तंत्र में जनता की आवाज़ सुनने और सुधारात्मक कदम उठाने की काबिलियत मौजूद हैI
इस पूरे घटनाक्रम ने यह साफ संदेश दिया है कि जहाँ एक तरफ देश के युवाओं ने अपने हक और सही प्रक्रियाओं के लिए आवाज़ उठाकर लोकतंत्र को जिंदा रखा, वहीं दूसरी तरफ सरकार ने भी समय रहते समझदारी दिखाकर यह साबित किया कि जमहूरियत की असली ताकत लगातार संवाद और अवाम के भरोसे में ही छिपी है।
चुनौतियों के बीच सुधार का रास्ता चुनना किसी भी सरकार की कमजोरी नहीं, बल्कि उसकी लोकतांत्रिक समझदारी और जनता के प्रति उसकी जवाबदेही की सबसे बड़ी पहचान होती है।
( अब्दुल्लाह मंसूर स्वतंत्र लेखक और शिक्षक हैं। वे सामाजिक मुद्दों और पसमांदा विमर्श पर लगातार लिखते रहे हैं।)